स्वराज नहीं है, अंग्रेजी राज की समाप्ति

प्रो. कश्‍मीर उप्‍पल

अगस्‍त ’47 में मिली आजादी ने क्‍या सचमुच हमें आजाद कर दिया था? क्‍या हम अपनी जरूरतों, संसाधनों और क्षमताओं के हिसाब से अपना विकास कर पाने के लिए स्‍वतंत्र हुए थे? और यदि यह हुआ था तो फिर हमारी बहुसंख्‍य आबादी साल-दर-साल बदहाली की चपेट में क्‍यों आती जा रही है? हम विकास का ऐसा कोई मॉडल क्‍यों विकसित नहीं कर पाए जिसको क्रियान्वित करने से सभी को सचमुच की आजादी का अहसास हो पाता?

‘जब औपनिवेशिक मनुष्य ने सोचना छोड़ दिया था और उसका समर्थ होने का अहसास लुप्त हो चुका था, गांधी ने उसे सोचना सिखाया और उसके सामर्थ्‍य के अहसास को पुनरुज्जीवित किया।’ नेल्सन मंडेला द्वारा किया गया महात्मा गांधी का यह सर्वश्रेष्ठ मूल्यांकन औद्योगिक – युग के मनुष्य के सम्मुख आज भी रोशनी के एक स्तंभ की तरह खड़ा नजर आता है।

महात्मा गांधी के चिंतन के केन्द्र में सदैव मनुष्य रहा है, क्योंकि गांधी देख पा रहे थे कि औद्योगिक-युग ने चिन्तन के केन्द्र में वस्तुओं को लाकर खड़ा कर दिया है। गांधी के चिन्तन को आगे बढ़ाने वाले लेखक ईएफ शुमाकर ने अपनी विश्व-प्रसिद्ध पुस्तक ‘स्मॉल इज ब्यूटीफुल’ में गांधी के विचार को आगे बढ़ाते हुए लिखा है -‘‘जब हम विकास की बात करते हैं तो हमारा मतलब क्‍या होता है? वस्तुओं का विकास अथवा मनुष्यों का? और अगर हम मनुष्यों के विकास की बात करते हैं तो कौन से मनुष्य? वे कहां हैं? मनुष्य में दिलचस्पी लेने से ऐसे असंख्य सवाल उठेंगे।’’

यूरोप में हुई औद्योगिक-क्रान्ति (1750-1850) के बाद बड़े पैमाने पर वस्तु-उत्पादन ने दुनिया को पहले बाजार की तलाश में उपनिवेशवाद और बाद में शक्ति-प्रदर्शन के लिए दो विश्वयुद्धों की ओर धकेल दिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनिवेशवाद से आजाद हुए देशों के सम्मुख विकास के सबसे ताकतवर दो मॉडल थे। पहला पूंजीवादी अमरीका का मॉडल और दूसरा साम्यवादी सोवियत संघ का मॉडल। आजाद भारत ने इन दोनों विश्व-शक्तियों को मिलाकर ‘मिश्रित-अर्थव्यवस्था’ का मॉडल अपनाया।

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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया में आई आधुनिकता की लहर 1980 के दशक में उत्तर-आधुनिकता में बदल गई। वैश्विक विचारधारा और अर्थव्यवस्था के स्तर पर यह माना जाने लगा कि ‘‘पूंजीवाद और समाजवाद की पद्धतियां बहुत अलग नहीं हैं, दोनों उद्योगवाद के ही दो पहलू हैं। इनके मूल आधार वहीं हैं, उनमें सिर्फ मालिकाना रिश्तों को कुछ बदलने की चेष्टा भर की गई है। इससे नया शक्तिशाली वर्ग पैदा हो रहा है, वह भी कुछ पहले जैसा ही है।’’ (गिरधर राठी ‘सोच-विचार’ उत्तर-आधुनिकता के दायरे)

भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था का तराजू 1980 के दशक से निजी-क्षेत्र के पक्ष में झुकता हुआ आखिरकार 1991 में ‘‘वैश्वीकरण’’ के हाथों में चला गया। उस समय एबीबी (स्विस-स्वीडिश व्यावसायिक समूह) ग्रुप के अध्यक्ष पर्सी बार्नविक की वैश्वीकरण की अवधारणा आज हमारे देश में साकार रुप ले रही है।

पर्सी बार्नविक के अनुसार- ‘‘मेरे हिसाब से ‘वैश्वीकरण’ का मतलब है कि मेरी कम्पनी को जहां चाहे वहां, जब तक चाहे तब तक, जो चाहे वो पैदा करने, जहां से चाहे कच्चा माल मंगाने और जहां चाहे तैयार माल बेचने की पूरी आजादी मिले और श्रम कानूनों व सामूहिक समझौतों के नाम पर उसके सामने रुकावटें न हों।’’

वैश्वीकरण का एक ही मूल सिद्धांत है – ‘बिग इज पावरफुल।’ यह विशाल पूंजीनिवेश, उत्पादन, वितरण और लाभ के पैरों पर चलता हुआ ‘स्माल इज ब्यूटीफुल’ के सिद्धांत को रौंद कर आगे बढ़ता जा रहा है। सीटी कुरियन के शब्दों में ‘‘विकास एक ऐसी सामाजिक-प्रक्रिया है जो एक समय पर कुछ लोगों के लिए दौलत और अन्य लोगों के लिए गरीबी पैदा करती है।’’ हमारा देश अत्यंत कम आमदनी वाले लोगों का एक ऐसा सागर बन गया है जिसके बीच समृद्धि के कुछ टापू उभर आए हैं।  

वैश्वीकरण और स्वतंत्र व्यापार की नीति के फलस्वरुप आज हमारी शहरी और ग्रामीण दोनों आर्थिक-सामाजिक व्यवस्थाएं प्रश्नों के घेरे में खड़ी हो गई हैं। युद्धों में देशों की ‘इमारतें’ धाराशाही होती हैं, आज के इस कोरोनो-संकट में ‘मनुष्य’ धाराशाही हो रहा है। इस प्राकृतिक और आर्थिक-सामाजिक संकट में मनुष्य की मृत्यु और उसके अंतिम संस्कार के दृश्य युद्धों की विभीषिका के दृश्यों से अधिक भयावह और अमानवीय हैं।

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भारत ही नहीं यूरोप और अमरीका के अनेक महानगरों में आधुनिक सभ्यता की प्रतीक मानी जाने वाली ‘कार’ का आवागमन नगरीय क्षेत्रों में प्रतिबंधित हो रहा है। यह अपने आप में औद्योगिक-सभ्यता पर एक कठोर टिप्पणी है। महानगरों की बहुमंजिला इमारतें, जो आधुनिक सभ्यता की प्रतीक हैं, भय के संदेश दे रही हैं। इन इमारतों को किसी ने ठीक ही ‘वर्टिकल-झुग्गी-झोपड़ी’ कहा है।

फ्रांस के बौद्धिक जागरण से विश्व को लोकतांत्रिक-सभ्यता का संदेश मिला है। आज फ्रांस में अपने महानगरों को ग्रामीण क्षेत्रों में विकेन्द्रित रुप देने की योजनाओं पर चिन्तन हो रहा है। ऐसे में कोरोना-संकट जैसे अनेक संकट भविष्य के गर्भ में छिपे हैं।

इस विश्‍वव्‍यापी संकट में पुनः एक बार गांधी के चिन्तन को नये परिवेश में समझना जरुरी है। गांधी की अनेक उक्तियां हमारे ऊपर मंडरा रही हैं। उनकी बातें विश्व को उसके नये संदर्भ में देखने की ताकत देती हैं। कभी दिवास्वप्न सी लगने वाली उनकी सलाहें धरती पर डोल रही हैं। उन्होंने कहा था -‘‘शताब्दी-दो शताब्दी बाद आज की ये विशाल नगरीय व्यवस्थाएं ऊर्जा, पर्यावरण और विशाल आवासीय संकट से ध्वस्त और मृत हो जाएंगी। ये चीन की दीवार और मिस्र के पिरामिड की तरह खंडहर बनकर नुमाइश की चीजों में तब्‍दील हो जाएंगी।’’

सन् 1945 में द्वितीय विश्‍वयुद्ध समाप्त हो जाने के बाद, गांधी देख पा रहे थे कि कुछ समय बाद भारत में अंग्रेजी शासन भी खत्म हो जायेगा। उनके अनुसार ‘अंग्रेजी शासन का अन्त ही भारत का स्वराज नहीं था।’ गांधी समय-समय पर भारत के विकास की अवधारणा सामने रखते थे। उन्होंने सन् 1936 में अपने अखबार ‘हरिजन’ में लिखा था – ‘‘मेरा विश्वास है और मैंने इस बात को असंख्य बार दोहराया है कि भारत अपने चंद शहरों में नहीं, बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है, लेकिन हम शहरवासियों का खयाल है कि भारत शहरों में ही है और गांव का निर्माण शहरों की जरुरतें पूरी करने के लिए ही हुआ है।’’  

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गांधी के चिन्तन के केन्द्र में मनुष्य है। वे मानते हैं कि मनुष्य का अपना नितान्त निजी जीवन भी है जो परिवार, ग्राम और राष्ट्र के सदस्य के रुप में प्रजातंत्र का सबसे सजीव अंग बनाता है। मनुष्य की ताकत से प्रजातंत्र ताकतवर बनता है और मनुष्य की कमजोरी से प्रजातंत्र और देश भी कमजोर होता है। हम कोरोना के इस संकट-काल में दुनिया के कई देशों को कमजोर होता देख रहे हैं।

गिरधर राठी अपनी पुस्तक ‘कल आज और कल’ में कहते हैं – ‘‘गांधी और मार्क्स में जो भी फर्क हो, एक फर्क इनमें सबसे बड़ा है – मार्क्स को व्यवहार में उतारने की पुरजोर विश्वव्यापी कोशिशें पचासों बार हो चुकी हैं। गांधी को अमली जामा पहनाने की कोशिश किसी गली-मोहल्ले तक में नहीं हुई है, जबकि मार्क्सवाद की तरह गांधीवाद भी ‘आचरण का दर्शन’ ही है। कोरी लफ्फाजी नहीं है।

वर्तमान में हमारा देश ‘बिग इज पावरफुल’ के मोहजाल में फंस गया है। हमारा नेतृत्व सबसे ऊँचा बांध, सबसे बड़ी मूर्ति और सबसे अधिक तेज रेल को देश की ताकत समझने-समझाने लगा है। इसके साथ ही सबसे अधिक करोड़पति और विश्व की सबसे बड़ी कंपनी वाले ‘इंडिया’ से सबसे अधिक आबादी वाला ‘भारत’ पिछड़ता जा रहा है। गणतंत्र-दिवस, 26 जनवरी पर निकलने वाली ‘समृद्ध-भारत’ की झांकियों की तरह इस कोरोना-काल में निकली ‘भारत की दरिद्रता’ की झांकियों ने देश में चहुंओर फैली गरीबी का सत्यापन ही किया है।

महात्मा गांधी ने आजादी के बाद अपने एक प्रार्थना-प्रवचन में कहा था – ‘‘मैं तो कहता-कहता चला जाऊँगा, लेकिन किसी दिन मैं याद आऊँगा कि एक मिस्कीन आदमी जो कहता था, वही ठीक था।’’ (सप्रेस) 

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