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रामध्वज का प्रतीक वृक्ष : कोविदार या कचनार?

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राम मंदिर पर स्थापित केसरिया ध्वज ने कोविदार वृक्ष के प्रतीक और उसकी प्राचीन परंपरा को फिर केंद्र में ला दिया है। रघुकुल के ध्वज से जुड़े इस वृक्ष को लेकर कचनार-कोविदार की पहचान, आयुर्वेदिक मतभेद और वैज्ञानिक अध्ययनों ने एक बार फिर रामायणकालीन प्रतीकों की ऐतिहासिक सच्चाई पर प्रश्न खड़े किए हैं।


हाल ही में 25 नवम्बर 2025 को अयोध्या के राम मंदिर पर ध्वज स्थापना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आर.एस.एस. प्रमुख डॉ. मोहन भागवत तथा योगी आदित्यनाथ ने की । केसरिया ध्वज पर सूर्य ऊँ एवं कोविदार पेड़ की आकृति है। इस अवसर पर डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में अन्य बातों के साथ यह भी कहा कि धर्म ध्वज पर रघुकुल का प्रतीक कोविदार पेड़ कचनार लगता है। यह मदार एवं पारिजात पेड़ का संकर (हायब्रिड) है, जिसे ऋषि कश्‍यप ने बनाया था।

प्रत्येक देश द्वारा अपना एक विशिष्ट ध्वज झंड़ा या पताका रखने की परम्परा काफी पुरानी है। क्षत्रिय राजाओं को कोविदार पेड़ से विशेष लगाव बताया गया है। भगवान राम भी क्षत्रिय समाज से थे अतः अयोध्या साम्राज्य के ध्वज पर भी कोविदार पेड़ अंकित बताया गया है।

उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के अयोध्या – शोध संस्थान के शोधार्थी श्री ललित मिश्र ने वाल्मिकी रामायण में बने चित्रों तथा श्लोकों के भावार्थ से इस बात की पुष्टी की है एवं अयोध्याकांड में इसका जिक्र बताया गया है। त्रेता युग के प्रसिद्ध ऋषि कश्यप का संदर्भ देकर कहीं यह भी बताया गया है कि अयोध्या के ध्वज पर सूर्य भी अंकित है क्योंकि भगवान राम का संबंध सूर्यवंशी कुल से रहा है। दशरथ पुत्रों की पताका को कोविदार ध्वज भी कहा गया है। चित्रकूट में वनवास के समय जब भरत राम से मिलने आये थे तब निशाद राज घोड़ों के दौड़ने से उड़ती धूल देखकर पहले यह समझे कि कोई शत्रु सेना आ रही है, परंतु थोड़ा पास आने पर कोविदार ध्वज देखकर वे समझ गये कि कोई लोग अयोध्या राज्य से आ रहे हैं।

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कोविदार एवं कचनार एक ही पेड़ के दो अलग नाम है या अलग-अलग पेड़ हैं ? इस पर मतभेद अभी भी है। आयुर्वेद तथा भावप्रकाश निघंटू में  इन्हें अलग पेड़ बताये गये हैं । संस्कृत साहित्य में दोनों के लिए कांचनार तथा कोविदार शब्दों का उपयोग किया गया है। प्रसिद्ध लेखक प्रतिभा आर्य की पुस्तक ‘‘महागाथा वृक्षों की’’ (राधाकृष्ण प्रकाशन 1997) में कचनार का वर्णन कोविदार शीर्षक देकर किया गया है।

वनस्पति वैज्ञानिकों ने भी कोविदार तथा कचनार को लेकर कुछ अध्ययन किये हैं जिनके परिणाम समस्या को सुलझाने में कुछ कारगर साबित हुए है। कचनार मूलतः भारतीय महाद्वीप का मध्यम आकार का पतझड़ी पेड़ है। यह हिमालय की तराई वाले क्षेत्रों में काफी पाया जाता है। इसकी सुंदरता का कारण बड़े आकर्षक, सुगंधित एवं रंगीन (सफेद, गुलाबी, बैंगनी) फूल होते है । इसे वनस्पति शास्त्र में बोहेनिया कहा गया है, जिसकी दो प्रजातियां बोवेरीगेटा तथा बो. परप्युरिया प्रमुख है। बोवेरीगेटा के लगभग गोलपत्तियों के दो भाग (खंड) तिहाई या चौथाई दूरी तक अलग रहते हैं तथा इन पर शिराएं 13-15 होती है। फूल मंद खुशबू लिए सफेद गुलाबी या नीले रंग के होते हैं।

बोपरप्युरिया की पत्तियों के दो खंड ज़्यादा अलग रहते हैं तथा शिराएं 9 – 10 होती है। नीले अथवा बैंगनी रंग के फूल अधिकता से होते है। इसकी जड़ें गहरी तथा कुछ विषैली बतायी गयी है। कुछ स्थानों पर कोविदार का मतलब धरती को चीरने वाला भी बताया गया है। बैंगनी या नीले फूलों की अधिकता तथा धरती को चीरकर गहराई तक जाने वाली जड़ों के कारण बो-परप्युरिया कोविदार है तथा बो. वेरिगेटा – कचनार। दोनों पेड़ बोहेनिया की अलग-अलग पेड़ प्रजातियाँ है। एक सम्भावना यह भी बतायी गयी है कि दोनों पेड़ की प्रजातियाँ एक होकर किस्में (वेरायटी) भिन्न हो सकती है। रामायण काल के त्रेता युग से अभी तक पृथ्वी में कई परिवर्तन हो चुके है। इन परिवर्तनों के कारण उस समय वर्णित पेड़-पौधों की जानकारी वर्तमान में भी वैसी ही हो, यह सम्भव नहीं है। (सप्रेस)

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