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‘जेन जी’ के लिए कुछ हिदायतें

‘जेन जी’ के लिए कुछ हिदायतें
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इन दिनों देशभर के युवाओं यानि ‘जेन जी’ ने भारी उथल-पुथल मचा रखी है। कई छोटे-बड़े मसलों पर उन्हें और उनसे आगे की ‘जेन अल्फा’ पीढ़ियों को सफलताएं भी मिली हैं, लेकिन क्या ये सफलताएं कोई ठोस, स्थायी बदलाव ला सकेंगी? पडौसी देश नेपाल में, जहां ‘जेन जी’ के आंदोलन के कारण पिछले साल सत्ता बदली थी, प्रचलित ‘विकास’ में कोई बदलाव नहीं आया। नतीजे में लकीर की फकीर सत्ता धारी ‘जेन जी’ पीढ़ी आज भीषण प्राकृतिक आपदा भुगत रही है। आखिर राजनीतिक, आर्थिक बदलाव के बाद में उनसे देश क्या उम्मीदें बांधे?


पिछले कुछ सालों में युवाओं के कई आंदोलन हुए हैं, विशेषकर ‘जेन ज़ी’ पीढ़ी की अगुआई में, जिन्होंने सरकारों को गिरा दिया या राजनीतिक माहौल को नाटकीय ढ़ंग से बदल दिया। नेपाल, बांग्लादेश, मैडागास्कर, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मोरक्को और दूसरी जगहों पर लगातार विरोध-प्रदर्शनों ने सरकारों को भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया या उन्हें सत्ता से ही हटा दिया, लेकिन क्या इन सभी से न्याय की दिशा में कोई बुनियादी बदलाव आया? इसका एक नया रूप भारत में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) है जिसका अचानक सामने आना उतना ही चौंकाने वाला था, जितना कि ड्रेनपाइप से कॉकरोच का निकलना।

बेशक, युवा आंदोलन सिर्फ ‘जेन ज़ी’ की देन नहीं हैं। हाल के उदाहरणों में वर्ष 2010-11 में अरब क्षेत्र में हुए विद्रोह (जिसे ‘अरब स्प्रिंग’ कहा जाता है) शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप कई जगह सत्ता परिवर्तन हुआ। 1968 में दुनिया भर में विरोध प्रदर्शनों का दौर चला, जिनमें से कई का नेतृत्व युवाओं ने किया। ये विरोध युद्ध, नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों, मज़दूरों के अधिकारों, तानाशाही-विरोधी और अन्य मुद्दों पर थे। मेरा खुद का सफ़र 1980 के दशक की शुरुआत में दिल्ली के शहरी जंगलों को बचाने और ऐसे ‘विकास’ के ख़िलाफ़ स्कूल और कॉलेज के छात्रों के नेतृत्व वाले आंदोलन से शुरू हुआ, जिस ‘विकास’ को हमने प्रकृति के बेरहम विनाश और प्रकृति पर निर्भर समुदायों के विस्थापन के कारण ‘विनाश’ का नाम दिया था।

इनमें से कई आंदोलन अपने तात्कालिक लक्ष्यों को हासिल करने में कुछ हद तक सफल रहे हैं, जैसे किसी जंगल को बचाना या किसी सरकार को गिराना, लेकिन ज़्यादातर मामलों में इनसे व्यवस्था में बुनियादी बदलाव नहीं आया। राजनीतिक सत्ता कुछ ही लोगों के हाथों में केंद्रित रही, उसमें बने रहने के लिए आदर्शों और मूल्यों से समझौता किया जाता रहा और आर्थिक मॉडल औद्योगीकरण और कभी न खत्म होने वाली आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित रहा। यह मॉडल जितने रोज़गार पैदा करता है, उतने ही खत्म भी कर देता है, साथ ही हमें वैश्विक पारिस्थितिकीय पतन की ओर भी धकेलता है।

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1960 और 70 के दशक में बड़े पैमाने पर हुए विद्रोहों से मजदूरों को अधिकार मिलने जैसे कई फ़ायदे हुए, लेकिन इनसे पूंजीवादी व्यवस्था में मज़दूरों के शोषण और देशों के बीच कड़े मुक़ाबले (या युद्ध) के हालात नहीं बदले। नतीजे में इंसानियत के सामने मौजूद सबसे बड़ी समस्याओं – जैसे भयानक गैर-बराबरी, पर्यावरण का विनाश, युद्ध और नरसंहार, तानाशाही और लोकतांत्रिक अधिकारों का कमज़ोर होना आदि – को हल करने के लक्ष्य अभी भी दूर के सपने ही हैं।

हमें यह देखने के लिए इंतज़ार करना होगा कि क्या नेपाल का नया राजनीतिक नेतृत्व ऐसे बुनियादी बदलाव ला पाएगा। 36 साल के इंजीनियर-रैपर बालेन्द्र शाह की अगुआई वाली सरकार ने सुधारों का एक बड़ा 100-सूत्रीय एजेंडा जारी किया है। इसमें कल्याणकारी कामों और जवाबदेह व कुशल शासन के कई अच्छे कदम शामिल हैं, लेकिन विकेंद्रीकृत लोकतंत्र के लिए गांव और शहर के समुदायों को मज़बूत करने के बारे में इसमें कुछ नहीं दिखता। नेपाल को पर्यावरण के लिहाज़ से टिकाऊ बनाने की दिशा में भी इसमें बहुत कम बातें दिखीं।

इस एजेंडा के कुछ बिंदु बेहद विनाशकारी भी हो सकते हैं, जैसे ‘ऊर्जा निर्यात से ज़्यादा-से-ज़्यादा कमाई करने और जलविद्युत विकास को तेज़ करने’ की योजना। अगर इनमें पहाड़ी इलाकों की ऐसी बड़ी परियोजनाएं शामिल हों, जिनके गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक नतीजे हो सकते हैं तो बात क्रांति के उलट हो सकती है। खबरों के मुताबिक, नेपाल में राजनीतिक बदलाव लाने वाले ‘जेन ज़ी आंदोलन’ के लोग इस मामले पर सरकार से बातचीत कर रहे हैं। उनमें से कुछ तो सरकार में शामिल हैं और कुछ ज़मीनी लोकतंत्र और पारिस्थितिकीय संतुलन को लेकर बहुत सचेत भी हैं।

क्या उनके पास सत्ता के विकेंद्रीकरण की कोई सोच है, ताकि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार पर नज़र रखी जा सके? अगर बेरोज़गारी और महंगाई विरोध-प्रदर्शनों की मुख्य वजह रही हैं, तो क्या नए नेताओं के पास सम्मानजनक रोज़गार पैदा करने और कीमतों को ऐसे तरीकों से नियंत्रित करने का कोई तरीका है, जो न्यायपूर्ण और पर्यावरण के लिहाज़ से टिकाऊ हों? क्या वे औद्योगीकरण और उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने वाले उन्हीं नाकाम मॉडलों या नव-उदारवादी अर्थशास्त्र के उन तत्वों को ही अपनाएंगे, जो पर्यावरण की सुरक्षा को कोई गंभीर मुद्दा नहीं मानते? 

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इनमें से किसी भी वैकल्पिक रास्ते की कल्पना करना आसान नहीं है, उन्हें लागू करना तो दूर की बात है, लेकिन ये नामुमकिन भी नहीं हैं, जैसा कि दुनिया भर में हज़ारों सफल कोशिशें दिखा रही हैं। समुदायों ने दिखाया है कि पश्चिमी देशों के सतही लोकतंत्र की बजाए असली लोकतंत्र कैसे काम कर सकता है; जहां हर किसी की आवाज़ सुनी जाती है, फ़ैसले लेने की प्रक्रिया ग्रामीण और शहरी समुदायों से शुरू होती है और प्रकृति भी ऐसे फ़ैसलों का हिस्सा होती है। मज़दूरों के समूहों ने दिखाया है कि ज़िम्मेदार उत्पादन कैसे किया जा सकता है, जिससे सभी को फ़ायदा हो। किसानों के समूहों ने खाद्य उत्पादन प्रणालियों की विविधता दिखाई है, जो मिट्टी, पानी और उनमें मौजूद सभी जीवों को नष्ट या ज़हरीला नहीं बनाती।

आंदोलनों को यह तो अच्छी तरह पता होता है कि वे किसके खिलाफ हैं, लेकिन यह कम पता होता है कि वे किसके पक्ष में हैं। बदलाव के लिए उनकी सोच और तरीके अक्सर उसी व्यवस्था के अंदर सुधार तक ही सीमित रहते हैं। मसलन – वे चुनावों में राजनीतिक पार्टियों के असर को कम करने के लिए चुनाव की नियामक संस्थाओं की आज़ादी की मांग तो कर सकते हैं, लेकिन इससे आगे बढ़कर यह नहीं पूछते कि ‘सत्ता का विकेंद्रीकरण कैसे किया जाए, ताकि जनता सभी संस्थाओं पर नज़र रख सके?’ या जीवाश्म ईंधन से हटकर नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की मांग तो कर सकते हैं, लेकिन यह सवाल नहीं पूछते कि किस तरह की नवीकरणीय ऊर्जा सचमुच न्यायपूर्ण और टिकाऊ है?

इसके अलावा, वित्तीय भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है जिससे काफी गुस्सा और निराशा पैदा होती है। इस बुराई के कारण कई आंदोलन शुरू हुए हैं। भ्रष्टाचार वित्तीय गड़बड़ियों से कहीं बड़ी चीज़ है। सोच-विचार में भी भ्रष्टाचार होता है, जिससे बेतहाशा मुनाफा कमाने की होड़ और सत्ता पर कब्ज़ा बनाए रखने की बेईमान राजनीति को बढ़ावा मिलता है। ऐसी व्यवस्था जिसमें कोई वित्तीय भ्रष्टाचार न हो, उसमें भी भारी गैर-बराबरी और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह स्थितियां पैदा हो सकती हैं। ‘सीजेपी’ के घोषणापत्र की कुछ मांगें (जैसे मीडिया को कॉरपोरेट नियंत्रण से मुक्त करना) इसी दिशा में इशारा करती हैं, जो उत्साहजनक हैं।  

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बेरोज़गारी आंदोलनों की एक बड़ी वजह है, लेकिन आम तौर पर ये ‘विकास’ के उस मौजूदा मॉडल को चुनौती नहीं देते, जो लगातार आर्थिक विकास और तकनीक की ऐसी बेलगाम दौड़ पर आधारित है, जिसमें मशीनें इंसानी मेहनत और काम करने की क्षमता की जगह ले लेती हैं। उन्हें इस मॉडल को बदलकर ऐसे तरीके अपनाने की ज़रूरत है, जो प्रकृति और तकनीक के साथ मिलकर काम करने वाले सम्मानजनक रोज़गार को बढ़ावा दें। भारत जैसे देश में इसका मतलब है – हाथ से बनी चीज़ों, विकेंद्रीकृत और छोटे स्तर के उत्पादन को प्राथमिकता देना; लाखों हेक्टेयर ज़मीन को फिर से उपजाऊ बनाना; विकेंद्रीकृत सेवाएं और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देना वगैरह।

शिक्षा के मामले में भी यही बात लागू होती है। हमें शिक्षा के ऐसे नज़रिए की ज़रूरत है, जहां युवा रचनात्मक और मज़ेदार तरीके से सीख सकें; एक-दूसरे और प्रकृति के प्रति ज़िम्मेदार बनें; अपनी पसंद के हुनर और क्षमता को निखार सकें; अपने समुदायों के साथ-साथ दूसरों से भी सीख सकें; दूसरों की संस्कृति और भाषाएं सीखते हुए अपनी पारिवारिक संस्कृति और भाषाओं पर गर्व कर सकें; ऐसे रोज़गार के विकल्प तलाश सकें जो उन्हें सम्मान और आज़ादी दें; गैर-बराबरी को चुनौती दे सकें; और जलवायु व अन्य संकटों का सामना करने के लिए मज़बूत बन सकें।

आज के युवा इन चीज़ों को समझें और उनसे सीखें, इसके लिए अलग-अलग पीढ़ियों के बीच बातचीत और सीखने-सिखाने का माहौल होना चाहिए। ‘जेन ज़ी’ (और अब ‘जेन ए’ और उसके बाद जो भी अक्षर आएं!) के पास बेहतर दुनिया के लिए क्रांति का नेतृत्व करने की खातिर ऊर्जा, नई सोच और रचनात्मकता है, लेकिन इसके लिए, विरोध-प्रदर्शन के साथ-साथ उन बुनियादी बदलावों की झलक भी दिखनी चाहिए, जिनकी पृथ्वी को ज़रूरत है। उम्मीद है कि दुनिया भर में युवा जिन क्रांतियों में शामिल हैं, वे पहले से ही ऐसे नज़रिए पर विचार कर रहे होंगे या करेंगे और सभी उम्र के नागरिक आंदोलन उनके समर्थन और एकजुटता में खड़े होंगे। (सप्रेस) (बाबा मायाराम द्वारा अनुवादित)

लेखक का परिचय

आशीष कोठारी

आशीष कोठारी कल्‍पवृक्ष संस्‍था से जुड़े हुए है। पर्यावरण के मुददों पर नियमित लिखते रहते है।

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