जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने सभी आवश्यक दवाओं के लिए व्यापक मूल्य नियंत्रण और दवा वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता के लिए की मांग
नई दिल्ली। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा 27 अक्टूबर 2026 को जारी कैंसर-रोधी दवाओं की संशोधित अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) सूची ने दवाओं की कीमतों के निर्धारण और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSA India) ने दवाओं की कीमतों में भारी कटौती का हवाला देते हुए सभी आवश्यक दवाओं के लिए व्यापक मूल्य नियंत्रण लागू करने और दवा वितरण व्यवस्था में व्यापारिक मार्जिन पर प्रभावी सीमाएं तय करने की मांग की है।
अभियान के अनुसार, पाल्बोसिक्लिब (Palbociclib) के एक ब्रांड की कथित अधिकतम खुदरा कीमत लगभग 40,421 रुपये प्रति पैक से घटकर 2,720 रुपये रह गई। इसी तरह, थायोटेपा (Thiotepa) की कीमत लगभग 80,072 रुपये प्रति शीशी से घटकर 7,150 रुपये हो गई। कीमतों में इस भारी कटौती से दवा कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीतियों पर सवाल उठते हैं।
प्रेस नोट में कहा गया है कि कैंसर की जेनेरिक दवाओं के प्रमुख भारतीय निर्माता भी इस स्थिति में शामिल हैं। कथित तौर पर व्यापारियों को भारी मार्जिन दिए जाने के बावजूद मरीजों को लंबे समय तक इन दवाओं के लिए अत्यधिक कीमतें चुकानी पड़ीं, जिन्हें वहन करना उनके लिए संभव नहीं था।
पेटेंट-संरक्षित दवाएं अब भी महंगी
जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने कहा कि कई पेटेंट-संरक्षित कैंसर की दवाएं अब भी बेहद महंगी हैं। व्यापार मार्जिन युक्तिकरण (Trade Margin Rationalisation—TMR) नीति दवाओं को किफायती बनाने में विफल रही है। इसके अलावा, रोगी सहायता कार्यक्रमों (Patient Assistance Programmes) के तहत मुफ्त उपलब्ध कराई जाने वाली दवाओं को मूल्य निर्धारण की गणना से बाहर रखने के कारण इस नीति का मरीजों को राहत पहुंचाने का संभावित प्रभाव और सीमित हो गया है।
अभियान के अमूल्य निधि और चंद्रकांत यादव ने कहा कि इस नीति में अपनाए गए मूल्य निर्धारण के फार्मूले में भी गंभीर खामियां हैं। स्टॉकिस्ट को बिक्री मूल्य (Price to Stockist—PTS) पर 42.8 प्रतिशत तक अतिरिक्त मार्जिन देने की अनुमति अत्यधिक मुनाफे को वैधता प्रदान करती है।
उन्होंने कहा कि यह विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि दवाओं की आपूर्ति शृंखला में अक्सर केवल एक या दो बिचौलिए होते हैं या दवाएं सीधे अस्पतालों को बेची जाती हैं। यदि इसके बजाय काफी कम मार्जिन निर्धारित किया जाता, जो औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) के तहत अनुसूचित दवा फॉर्मूलेशन पर लागू 16 प्रतिशत मार्जिन के अनुरूप होता, तो मरीजों को कहीं अधिक राहत मिल सकती थी।
केवल एक बार कीमत घटाना पर्याप्त नहीं
अभियान के साथी अमिताभ गुह और संजीव सिन्हा ने कहा कि दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत में केवल एक बार कटौती करना पर्याप्त नहीं है। जब तक व्यापारिक मार्जिन पर स्थायी और प्रभावी रूप से लागू की जा सकने वाली सीमाएं निर्धारित नहीं की जातीं तथा राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण द्वारा नियमित निगरानी और सत्यापन नहीं किया जाता, तब तक दवाओं की अत्यधिक कीमतें जारी रह सकती हैं या दोबारा बढ़ सकती हैं।
प्रेस नोट में यह भी कहा गया है कि NPPA को दवा आपूर्ति शृंखला और वितरण के विभिन्न माध्यमों में कीमतों से संबंधित आंकड़ों के संग्रह और रखरखाव की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। कंपनियों को संशोधित अधिकतम खुदरा मूल्य की गणना करने और उसकी स्वयं रिपोर्टिंग करने की छूट पर्याप्त स्वतंत्र सत्यापन के बिना नहीं दी जानी चाहिए।
अभियान ने रखीं पांच प्रमुख मांगें
जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने कैंसर की दवाओं सहित सभी आवश्यक दवाओं के लिए व्यापक और लागत-आधारित मूल्य विनियमन लागू करने की मांग की है। अभियान की प्रमुख मांगें हैं—
व्यापक मूल्य नियंत्रण: कैंसर की दवाओं सहित सभी आवश्यक दवाओं के लिए लागत-आधारित मूल्य विनियमन लागू किया जाए।
व्यापारिक मार्जिन पर सीमा: दवा वितरण के सभी माध्यमों में व्यापारिक मार्जिन पर स्थायी और प्रभावी सीमाएं निर्धारित की जाएं। NPPA द्वारा सख्त निगरानी सुनिश्चित की जाए और निर्धारित कीमतों से अधिक वसूली करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
कीमतों और मार्जिन में पारदर्शिता: दवाओं की कीमतों और आपूर्ति शृंखला के विभिन्न स्तरों पर मिलने वाले मार्जिन से संबंधित आंकड़ों को पारदर्शी बनाया जाए। अधिकतम खुदरा कीमत और आपूर्ति शृंखला के मार्जिन का स्वतंत्र सत्यापन सुनिश्चित किया जाए।
रोगी सहायता कार्यक्रमों की जांच: रोगी सहायता कार्यक्रमों, मुफ्त दवा वितरण और छूट की व्यवस्थाओं की पूरी जांच की जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मूल्य निर्धारण नीतियों का वास्तविक लाभ मरीजों तक पहुंचे।
सार्वजनिक कैंसर उपचार सेवाओं को मजबूती: सार्वजनिक कैंसर उपचार सेवाओं को मजबूत किया जाए। इसमें सस्ती जांच सुविधाएं और किफायती इलाज सुनिश्चित करना शामिल है।
लागत-आधारित मूल्य नियंत्रण पर जोर
जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने कहा है कि लागत-आधारित मूल्य नियंत्रण से दवाओं की कीमतों में और कमी लाई जा सकती है तथा अत्यधिक मुनाफाखोरी पर अंकुश लगाया जा सकता है। अभियान के मुताबिक, केवल व्यापारिक मार्जिन को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं है।
प्रेस नोट में कहा गया है कि जीवनरक्षक कैंसर उपचार हर मरीज की पहुंच में होना चाहिए। इलाज की किफायत मरीज की भुगतान करने की क्षमता के बजाय उसकी चिकित्सा संबंधी जरूरतों के आधार पर सुनिश्चित की जानी चाहिए।