निजीकरण नहीं, जनस्वास्थ्य को सशक्त बनाने की जरूरत: स्वास्थ्य एवं जन संगठनों की संयुक्त मांग
भोपाल, 6 जुलाई । मध्य प्रदेश सरकार द्वारा रीवा, देवास एवं गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने की प्रस्तावित प्रक्रिया का एक्शन अगेंस्ट प्राइवेटाइजेशन ऑफ हेल्थ सर्विसेज, मध्य प्रदेश ने कड़ा विरोध किया है। अभियान से जुड़े विभिन्न स्वास्थ्य एवं जन संगठनों ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को ज्ञापन भेजकर इस निर्णय को तत्काल निरस्त करने तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है।
अभियान का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा कमियों को दूर करने के बजाय सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों का निजीकरण राज्य की संवैधानिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों से पीछे हटने जैसा है। स्वास्थ्य सेवा राज्य का दायित्व है और इसे निजी लाभ के उद्देश्य से संचालित संस्थाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
ज्ञापन में हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख संगठन हैं, चिकित्सा शिक्षा महासंघ, मध्य प्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन (एमपीएमटीए), शासकीय स्वायत्त चिकित्सा महासंघ, मध्य प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन (एमपीएमओए), ईएसआई, मध्य प्रदेश जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन, मध्य प्रदेश नर्सिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन, मध्य प्रदेश संविदा चिकित्सक संघ, मध्य प्रदेश आशा सहयोगिनी श्रमिक संघ तथा जन स्वास्थ्य अभियान मध्य प्रदेश और जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया शामिल है।
ज्ञापन में कहा गया है कि मध्य प्रदेश में पूर्व में भी सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के निजीकरण के प्रयास विफल रहे हैं। वर्ष 2015 में अलीराजपुर जिला अस्पताल एवं जोबट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के निजी संचालन का मॉडल सफल नहीं हो सका और सरकार को इसे वापस लेना पड़ा। वर्ष 2020-21 में नीति आयोग द्वारा जिला अस्पतालों के निजीकरण का प्रस्ताव भी देशव्यापी विरोध के बाद आगे नहीं बढ़ सका। वर्ष 2024-25 में भी मध्य प्रदेश में जिला अस्पतालों के निजीकरण के प्रयासों का चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों एवं जन संगठनों ने व्यापक विरोध किया था।
अभियान ने कहा कि प्रदेश की वास्तविक समस्या निजीकरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में निवेश की कमी, स्वास्थ्य संस्थानों की अपर्याप्त संख्या तथा चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य कर्मियों के हजारों रिक्त पद हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2021-22 के अनुसार प्रदेश में 4,134 उप-स्वास्थ्य केंद्र, 1,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है।
मध्य प्रदेश लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की वार्षिक प्रतिवेदन 2025–26 के अनुसार राज्य में केवल 55 जिला अस्पताल, 51 ट्रॉमा सेंटर, 158 सिविल अस्पताल, 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 1,442 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 10,256 उप-स्वास्थ्य केंद्र तथा मात्र 5 पॉलीक्लिनिक संचालित हैं। स्वास्थ्य मानव संसाधन की स्थिति भी गंभीर है। 5,543 स्वीकृत विशेषज्ञ चिकित्सकों के पदों में से 3,698, 6,513 चिकित्सा अधिकारियों के पदों में से 2,689 तथा 728 दंत चिकित्सा अधिकारियों के पदों में से 481 पद रिक्त हैं। स्वास्थ्य संस्थानों और चिकित्सकों की यह भारी कमी प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है।
इसके बावजूद सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के बजाय निजीकरण का रास्ता अपना रही है। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है तथा मातृ एवं शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव शामिल है। ऐसे समय में सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों का निजीकरण जनहित के विरुद्ध है।
अभियान ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वास्थ्य का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है तथा अनुच्छेद 47 राज्य को जनस्वास्थ्य में सुधार की जिम्मेदारी सौंपता है। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना सरकार का दायित्व है, न कि उनका निजीकरण करना है। अभियान ने सरकार से मांग की है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण की प्रस्तावित प्रक्रिया तत्काल निरस्त की जाए, स्वास्थ्य विभाग एवं शासकीय मेडिकल कॉलेजों के सभी रिक्त पदों पर नियमित नियुक्तियां की जाएं, स्वास्थ्य संस्थानों को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) के अनुरूप विकसित किया जाए, स्वास्थ्य बजट में पर्याप्त वृद्धि की जाए तथा स्वास्थ्य नीति से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय स्वास्थ्य विशेषज्ञों, चिकित्सक संगठनों, स्वास्थ्यकर्मियों और जन संगठनों से व्यापक परामर्श के बाद ही लिए जाएं।


