कानून कृषि संसार समाचार

जीनोम एडिटेड धान पर वैज्ञानिकों और नागरिकों की आपत्ति, केंद्रीय कृषि मंत्री को भेजा पत्र

जीनोम एडिटेड धान पर वैज्ञानिकों और नागरिकों की आपत्ति, केंद्रीय कृषि मंत्री को भेजा पत्र

जी.एम. मुक्त भारत गठबंधन की ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठी पारदर्शी नियमन और जैव सुरक्षा की मांग नई दिल्ली, 26 जून। देशभर के सैकड़ों वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों और नागरिकों ने दो जीनोम एडिटेड धान किस्मों की जल्दबाज़ी में स्वीकृति को...

जी.एम. मुक्त भारत गठबंधन की ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठी पारदर्शी नियमन और जैव सुरक्षा की मांग

नई दिल्ली, 26 जून। देशभर के सैकड़ों वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों और नागरिकों ने दो जीनोम एडिटेड धान किस्मों की जल्दबाज़ी में स्वीकृति को लेकर गहरी आपत्ति जताई है। इस संबंध में जी.एम. मुक्त भारत के लिए गठबंधन ने केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को एक पत्र भेजा, जिसे आज आयोजित ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सार्वजनिक किया गया।

गठबंधन की ओर से कविता कुरुगंटी, राजेश कृष्णन, डॉ. सौमिक बनर्जी और डॉ. कृतिका येग्ना ने एक प्रेस काफ्रेंस को संबोधित किया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत IARI और IIRR द्वारा विकसित जीनोम एडिटेड धान किस्में वैज्ञानिक, नैतिक और सामाजिक स्तर पर कई गंभीर चिंताओं को जन्म देती हैं।

वक्ताओं ने बताया कि इन धान किस्मों को पारंपरिक उत्परिवर्तन प्रजनन (mutation breeding) की तरह सुरक्षित बताना ग़लत है, क्योंकि जीनोम एडिटिंग एक अधिक गहराई से हस्तक्षेप करने वाली और अस्थिर तकनीक है। वैज्ञानिकों ने यह भी रेखांकित किया कि कई अन्य देशों ने इस तकनीक के प्रयोग में सावधानी बरती है और भारत को भी इसी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा गया कि विनियमन की जिम्मेदारी केवल संस्थागत जैव सुरक्षा समितियों (IBSC) को सौंपना, हितों के टकराव की स्थिति पैदा करता है और जैव सुरक्षा की निगरानी को कमजोर करता है। यह प्रणाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों और शोध संस्थानों के बीच के व्यावसायिक संबंधों के कारण पारदर्शिता से दूर हो सकती है।

See also  सावधान! आपकी थाली के शाकाहार में छुपा हो सकता है मांसाहार

एक और महत्वपूर्ण चिंता का विषय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) भी रहा। वक्ताओं ने बताया कि जीनोम एडिटिंग से जुड़ी तकनीकों के अधिकांश पेटेंट पहले से ही कॉर्टेवा (पूर्व में डॉव ड्यूपॉन्ट), बायर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हैं। ऐसे में भले ही सरकार किसानों की ओर से लाइसेंसिंग की बातचीत कर रही हो, अधिकारों का नियंत्रण बाज़ार में अंततः इन्हीं कंपनियों के पास रहेगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद न केवल वैज्ञानिक साक्ष्यों के ज़रिए इन चिंताओं को उजागर करना था, बल्कि सरकार और समाज के बीच एक जिम्मेदार और पारदर्शी बहस की ज़मीन तैयार करना भी था।

गठबंधन ने सरकार से अपील की कि वह इन धान किस्मों के रिलीज़ को तत्काल रोके और देशभर में खुली, लोकतांत्रिक चर्चा की प्रक्रिया शुरू करे, जिससे किसानों, वैज्ञानिकों और आम नागरिकों की आवाज़ सुनी जा सके।

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

नवीन आलेख