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मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर जबलपुर में क्षेत्रीय जन संवाद सम्‍पन्‍न

मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर जबलपुर में क्षेत्रीय जन संवाद सम्‍पन्‍न

जबलपुर, 17 अक्‍टूबर। मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर एक क्षेत्रीय जन संवाद विभिन्न समुदायों के साथ काम कर रही संस्थाओं और संगठनों के साथ यूथ होस्टल, जबलपुर में संपन्न हुआ। जिसमें दलित आदिवासी, आदिवासी किसान, वन अधिकार, घुमंतू समुदाय,...

जबलपुर, 17 अक्‍टूबर। मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर एक क्षेत्रीय जन संवाद विभिन्न समुदायों के साथ काम कर रही संस्थाओं और संगठनों के साथ यूथ होस्टल, जबलपुर में संपन्न हुआ। जिसमें दलित आदिवासी, आदिवासी किसान, वन अधिकार, घुमंतू समुदाय, कोयला व पत्थर खनन, विस्थापन, ऊर्जा क्षेत्र, शहरीय गरीबी, किसानों के अधिकारों नदियों के स्वास्थ्य, पारंपरिक खेती, महिला, बीज बैंक, युवा, स्वास्थ्य, असंगठित मजदूरों के अधिकार, स्मार्ट विलेज पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों से जुडे 30 प्रतिनिधियों ने सतना रीवा, मण्डला सिवनी, बालाघाट, उमरिया, अनूपपुर, डिडोंरी, दमोह, मैहर, जबलपुर और भोपाल से इस जन संवाद में भागीदारी की।

कार्यक्रम के उद्देश्य पर अपना आधार वक्तव्य देते हुए राज कुमार सिन्हा ने कहा कि कॉरपोरेट पूंजीवादी व्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर हमारे सामने दो बेहद गंभीर समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। इनमें से पहली है पर्यावरण क्षरण की समस्या, जो जलवायु परिवर्तन के रूप में हमारे सामने है। ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव जलवायु परिवर्तन, प्रदूषित वायु, घटते और प्रदूषित जल संसाधन, मिट्टी का क्षरण और उत्पादकता में कमी, खाद्य गुणवत्ता में गिरावट, वनों की आग, बाढ़ और सूखा, समुद्री अम्लीकरण, समुद्री तूफानों की तीव्रता और प्रचंडता में वृद्धि, निरंतर वनों की कटाई, बढ़ता मरुस्थलीकरण, जैव विविधता का ह्रास आदि के रूप में हम देख रहे हैं।

उप मुख्य अभियंता जबलपुर के पद से सेवानिवृत्त राजेन्द्र आग्रवाल योजना के ऊर्जा और नवीनीकरण ऊर्जा क्षेत्र पर आपना विश्लेषण में कहा कि मध्यप्रदेश जलवायु परिर्वतन कार्ययोजना योजना में बिजली क्षेत्र के तहत नया कुछ नहीं लिखा गया। जो आंकडों का आधार लिया गया वह बहुत पुराने, जो वर्तमान यह बहुत ही कमजोर कार्ययोजना है जिसमें हम एक तरफ जलवायु परिर्वतन से हो रहे असर का समाधान खोज रहे है और दूसरी ओर नये कोयला आधारित योजना का निमार्ण भी कर रहे है। जबकि मध्यप्रदेश में बिजली उत्पादन उसकी उपभोग से अधिक है। वहीं महेश्वर में नवीनीकरण ऊर्जा के नाम पर बहते हुए पानी पर सोलर पेनल बिछा दिये जिसने तीन हजार से भी अधिक मछुआरों का जीवनयापन को खत्म कर दिया। लेकिन ऐसे कई प्रभावित समुदायों के मुद्दों संबोधित करने की कोई स्पष्ट रणनीति इस कार्ययोजना में नहीं हैं।

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उन्नति संस्था भोपाल से राजेश कुमार ने योजना का संक्षिप्त विश्लेषण को रखते हुए कहा कि मध्य प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना को बनाने की प्रक्रिया में बहु-स्तरीय समुदाय व हितधारक संवाद को महत्व कम दिया गया। इसका परिणाम यह है कि प्रभावित व हाशिये के समुदाय (दलित, आदिवासी और घुमंतु), नागरिक समाज संगठन, निर्माण श्रमिक संगठन, आनलाइन मंचों पर खाने व सामान पहुंचाने वाले मजदूर संगंठन, रैली पटरी पर सामान बेचने वाले संगठन, मछुआरा समुदाय, किसान, स्वच्छता कार्यकर्ता संगठना, ऑटो यूनियन और युवाओं के मुददों को राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना की रणनीति में स्पष्टता सें संबोधित नहीं किया गया है। इसलिए यह योजना राज्य में विविध दृष्टिकोण और प्रभावित स्थानीय समुदायों की आवाज का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं करती।

आगे बोलते हुए कुमार ने कहा कि इस योजना मे बजटीय आवंटन में स्पष्ट असंगतियाँ देखने को मिलती हैं, जो उनकी व्यवहार्यता पर सवाल उठाती हैं। एक तरफ प्रस्तावित बजट का 88 प्रतिशत केवल वन व जैव विवधता मे किया गया है, शेष 12 प्रतिशत अन्य 12 क्षेत्रों में प्रस्तावित किया है। ऐसी असंगतियां इस बात का संकेत देते हैं कि राज्य लागत की गणना करने के लिए अत्यधिक भिन्न विधियों का उपयोग कर रहे हैं या यह कि उन्हें जलवायु कार्रवाई की संरचना को लेकर बहुत अलग समझ है। किसी भी स्थिति में, ये असंगतियाँ योजना के भीतर वित्तीय योजना की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं।

विवेक पवार, जो आदिवासी समुदाय के साथ वन अधिकार अधिनियम और अंसगठित मजदूरों के साथ मण्डला और बालाघाट जिले में काम रहे है, ने वक्तव्य में कहा कि यह योजना वन अधिकार अधिनियम 2006 या पंचायतीराज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम 1996 के साथ संरेखित नहीं करती जो आदिवासी समुदायों के वन संसाधनों पर अधिकारों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह एक महत्वपूर्ण अंतराल है, क्योंकि आदिवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए काफी हद तक वनों पर निर्भर हैं, और बिना संरेखण के उनके अधिकारों का उल्लंघन होने का जोखिम है। वन अधिकार अधिनियम 2006 और पंचायतीराज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम 1996 का स्पष्ट उल्लेख न होने का अर्थ है कि योजना वन-संबंधी परियोजनाओं के लिए आदिवासी सहमति सुनिश्चित नहीं कर सकती, जिससे असमानताएँ और बढ़ सकती हैं।

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अंत में सभी संस्था और संगठनों से आये प्रतिनिधियों ने अपने मुद्दे और सुझाव रखे और इस मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना योजना में जोडा सके ताकि इसमें विविध दृष्टिकोण और सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।

इसमें 20 अधिक नागरिक समाज संस्था और संगठनों, जिसमें जन संघर्ष मोर्चा, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ, अन्याय प्रतिकार संगठन, नागरिक अधिकार मंच, मंजल मैहर, रेवांचल दलित आदिवासी सेवा संस्थान, भारतीय किसान युनियन अनुपपुर, बुन्देलखण्ड मजदूर किसान शक्ति संगठन, जल जंगल जमीन संगठन, बसनिया बांध विरोधी संर्घष समिति मंडला व अलग अलग विषय विशेषज्ञों सहित कई साथियों ने भागीदारी की। इस जन संवाद का आयोजन उन्नति इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट भोपाल द्वारा किया।

जन संवाद के समापन करते हुए राजेश कुमार ने सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया और कहा कि प्रतिनिधियों द्वारा साझा किये गये सुझावों का एक मांग पत्र तैयार कर राज्य सरकार की जलवायु परिर्वतन पर नोडल ऐजेसी को सौंपा जायेगा, ताकि इन सुझावों को जोडा जायें।

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