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राष्‍ट्रवाद और आत्‍मनिर्भरता पर क्‍या कहते थे, ‘गुरुदेव?’

‘गुरुदेव’ रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की बात करें तो राष्‍ट्रवाद और आत्‍मनिर्भरता का उल्‍लेख आ ही जाता है, लेकिन क्‍या उनके हवाले से ये दोनों मूल्‍य ठीक उसी तरह जाने-पहचाने जा सकते हैं जिस तरह आजकल इन्‍हें उपयोग किया जा रहा है?…

संभव है, नए कृषि‍ कानूनों की वापसी

कडकती सर्दी में धरना देते किसानों को महीना भर से ऊपर हो गया है, लेकिन उनके संघर्ष का कोई हल निकलता दिखाई नहीं देता। किसानों की मांग है कि नए कृषि कानूनों को खारिज किया जाए और सरकार इसके लिए…

कोरोना की वैक्सीन ही नहीं,लोकतंत्र का टीका भी ज़रूरी है !

किसानों ने जिस लड़ाई की शुरुआत कर दी है वह इसलिए लम्बी चल सकती है कि उसने व्यवस्था के प्रति आम आदमी के उस डर को ख़त्म कर दिया है जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान दिलों में घर कर…

भारी पड़ेगी , भूजल की अनदेखी

कृषि और औद्योगिक उत्‍पादन में बढौतरी ने हमारे जल-संसाधनों पर भारी संकट खड़ा कर दिया है। नतीजे में धीरे-धीरे हजारों साल में बना भूगर्भीय जल भंडार सूखता जा रहा है। इससे कैसे निपटा जाए? जब से हमारे देश में कुंओं, बावडियों…

महेंद्र भाई : कहाँ गए वे लोग, सही के प्रति आग्रह ही जिनका धर्म रहा है

सप्रेस के संस्‍थापक संपादक : महेंद्र कुमार 18 वां पुण्‍य स्‍मरण सप्रेस संस्थापक संपादक, वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक, सर्वोदयी सिद्धान्त के पोषक, वैकल्पिक विकास के एवं कार्यकर्ताओं के हितैषी, जन आन्दोलनों के समर्थक, रचनात्मक पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर महेंद्रकुमार जी ने…

समाचार

समाज का अभिक्रम जगाने से ही सरकारों पर लगाम कसेगी – सर्वोदय विचारक अमरनाथ भाई

उमरिया । आज हमने सरकार को ही सब कुछ मान लिया है । सब कुछ सरकार के रहमों – करम पर छोड़ दिया है इसीलिए देश चौतरफा समस्याओं की गिरफ्त में है। अर्थव्‍यवस्‍था रसातल में जा रही है और अन्नदाता…

आने वाली परिषद नकारात्मक सोच के बजाय सकारात्मक सोच के साथ अपनी शुरुआत करें।

इंदौर नगर निगम चुनाव – 2021 को लेकर कैसी हो परिषद हमारी? विषय पर परिचर्चा में बोले वक्ता संस्था सेवा सुरभि और इंदौर प्रेस क्लब का संयुक्‍त आयोजन इंदौर। 27 दिसंबर।  इंदौर शहर हमेशा से एक अच्छा उदाहरण प्रस्‍तुत करते…

‘मैं नेहरू का साया था’

पुस्‍तक समीक्षा भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को लेकर तरह-तरह के मनगढंत किस्‍से-कहानियां प्रचलित हैं और इतिहास को पीठ दिखाने की राजनीति के इस दौर में ये कहानियां और भी चटखारे लेकर सुनी-कही जा रही हैं। ऐसे में…

खेती को मुख्‍यधारा में लाता आंदोलन

दिल्‍ली की चौहद्दी पर पिछले करीब 21-22 दिनों से जारी किसान आंदोलन ने खेती-किसानी को कम-से-कम बहस के लायक तो बना ही दिया है। इस लिहाज से देखें तो पिछले तीन-साढे तीन सप्‍ताह देशभर के लिए कृषि-प्रशिक्षण का बेहतरीन मौका…

विकास की ‘बकासुरी’ नीतियों से निपटता किसान

पिछले बडे आंदोलनों को देखें तो दिल्‍ली का मौजूदा आंदोलन कई मायनों में भिन्‍न दिखाई देगा। तरह-तरह से उकसावे के बावजूद अपने अहिंसक स्‍वरूप, जाति-धर्म-वर्ग के हमारे अंतर्निहित विभाजन से परे, सामूहिक नेतृत्‍व और युवाओं-बुजुर्गों, महिलाओं-पुरुषों आदि को यथायोग्‍य जिम्‍मेदारी…