विकास की ‘बकासुरी’ नीतियों से निपटता किसान

राकेश दीवान

पिछले बडे आंदोलनों को देखें तो दिल्‍ली का मौजूदा आंदोलन कई मायनों में भिन्‍न दिखाई देगा। तरह-तरह से उकसावे के बावजूद अपने अहिंसक स्‍वरूप, जाति-धर्म-वर्ग के हमारे अंतर्निहित विभाजन से परे, सामूहिक नेतृत्‍व और युवाओं-बुजुर्गों, महिलाओं-पुरुषों आदि को यथायोग्‍य जिम्‍मेदारी देने की बातें जहां हमें नए तरह के आंदोलन की सीख देती हैं, वहीं किसान आंदोलन को भी एक ऊंचाई प्रदान करती हैं।

महीने भर से कडकती ठंड में दिल्ली को घेरे बैठे किसानों से, और कुछ नहीं तो, चंद ऐसी बातें सीखी जा सकती हैं जिनसे दुनिया-जहान में जारी प्रतिरोध के सर्वथा नए तौर-तरीकों की तस्दीक हो सके। मसलन-अब तक अपढ़, गंवार और ‘अनस्किल्ड’ माने जाने वाले किसानों से सीखा जा सकता है कि किसी भी तरह का जनांदोलन किन तरीकों से, कैसे चलाया जा सकता है। इक्कीसवीं सदी में दुनियाभर में किसी विचारधारा पर आधारित पार्टियों द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलनों के दिन लद गए हैं। अब विचारवान नागरिक पहल आंदोलन के रूप में सामने आ रही हैं। ‘अरब स्प्रिंग’, ‘ऑकुपाई वालस्ट्रीट,’ इराक और अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले के व्यापक विरोध और हाल में ‘मी टू’ और ‘ब्लैक लाइफ मैटर’ जैसे अनेक उदाहरण हैं जहां सिर्फ मामूली सूचना पर नागरिक इकट्ठा हुए और अपना तीखा विरोध दर्ज किया। दिल्ली में डटा मौजूदा किसान आंदोलन एक बार फिर इसी नागरिक पहल का इजहार कर रहा है। किसानों के इस आंदोलन में कई तरह के विचार तो है, लेकिन कोई एक डंडे-झंडे-नेता वाली अनुशासित पार्टी नहीं है।                 

हम सब जानते हैं कि आजादी के सात दशक बीतने के बाद हमारे सामने मौजूदा विकास और उसकी प्रासंगिकता का सवाल मुंह बाए खड़ा है। अपने जिन्‍दा रहने के लिए जरूरी खेती-किसानी, स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, जल-जंगल-जमीन जैसे किसी भी मसले को उठाइए, हम सफलतापूर्वक कहीं पहुंचते दिखाई नहीं दे रहे हैं। देश की करीब तीन चौथाई आबादी के रोजगार के आधार कृषि को ही देखें तो सत्‍तर सालों के बाद भी न तो हम अपनी आम जनता को दो वक्‍त का भरपेट भोजन उपलब्‍ध करवा पा रहे हैं और न ही इस भोजन को पैदा करने वाले किसानों को उनकी मेहनत और लागत का संतोषप्रद मुआवजा ही दे पा रहे हैं। हालात इतने बदहाल हैं कि हर साल किसानों की हाड़तोड मेहनत के बल पर होने वाले उत्‍पादन को रखने के लिए भंडारण तक की उचित व्‍यवस्‍था नहीं हो पाई है और अनाज, फल, सब्जियां थोक में सड़ती हैं। दूसरी तरफ, कुपोषण, भुखमरी पर प्रकाशित होने वाली अनेक देशी-विदेशी अध्‍ययन-रिपोर्टों में दक्षिण अफ्रीकी देशों नाइजीरिया, चाड आदि से की जा रही हमारी तुलना और आए दिन बढ़ती किसानों की आत्‍महत्‍याएं इस बदहाली की तस्‍दीक करती हैं।

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ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर आजादी के बाद हमने ऐसी कैसी नीतियां बनाईं और उन पर अमल किया जो विकास के किसी भी क्षेत्र में अपनी मूलभूत उपयोगिता तक साबित नहीं कर सकीं? ‘विश्‍व आर्थिक फोरम’ के दावोस सम्‍मेलन में जारी होने वाली ‘ऑक्‍सफेम’ की रिपोर्टों से हर साल उजागर होता है कि भारत के कुल एक फीसदी लोग देश की अधिकांश संपत्ति के मालिक हैं। क्‍या यह शर्मनाक गैर-बराबरी सत्‍तर लंबे सालों की हमारी विकास नीतियों का नतीजा नहीं हैं? ऐसे में आजादी के बाद से लागू इन नीतियों को खारिज न भी करें तो भी क्‍या उनकी समीक्षा नहीं की जानी चाहिए? और यदि समीक्षा के बाद ये नीतियां खारिज करने लायक दिखाई दें तो क्‍या उनका कोई विकल्‍प नहीं खोजा जाना चाहिए?

देश के कुछ चुनिंदा ‘जैविक’ समझ रखने वालों में से एक अनुपम मिश्र अक्‍सर इन सवालों से दो-चार होने पर पौराणिक ग्रंथ महाभारत के एक राक्षस बकासुर की कहानी सुनाते थे। कहानी के अनुसार बकासुर हर दिन गांव के किसी एक आदमी को अपना भोजन बनाता था। इस पर ग्रामीणों ने सोचा कि रोज, हरेक परिवार पर मौत का साया मंडराने से अच्‍छा है कि इसे थोड़ा व्‍यवस्थित कर लिया जाए। तो ग्रामीणों ने मिल-जुलकर बकासुर से कहा कि अबसे आपको आदमी की तलाश में रोज गांव तक आने का कष्‍ट नहीं उठाना होगा, हम रोज एक आदमी और उसके साथ भरपूर पानी आपको भेज दिया करेंगे। इससे हमें भी रोज-रोज के तनाव से मुक्ति मिलेगी और आपका भी कष्‍ट कम हो जाएगा। अनुपम के मुताबिक मौजूदा विकास भी कुछ इसी लहजे का है। कथित विकास के लिए बकासुर-नुमा विनाशकारी योजनाएं बनाकर संकट खड़ा करना और फिर अपने आसपास के समाज को अनदेखा करते हुए उन्‍हीं ‘बकासुरी’ योजनाकारों की अगुआई में विकल्‍प खोजना हमारी फितरत में शुमार हो गया है।

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‘बकासुरी’ विकास की बानगी कथित कृषि सुधार के लिए लाए गए वे तीन कानून भी हैं जिनको खारिज करने की मांग लेकर किसान बैठे हैं। खेती की बदहाली को मेटने के लिए जिस बुनियादी परिवर्तन की जरूरत है, उसे पीठ दिखाते हुए फिर उसी पद्धति को पुष्‍ट करने वाले कानून बनाना, जिसने मौजूदा बदहाली को पाला-पोसा और फैलाया है, विचित्र है। साठ के दशक की ‘हरित क्रांति’ और उसके ‘भारी लागत से अधिक उत्‍पादन’ के सूत्र ने एक तरफ जहां साल-दर-साल सड़ाकर फैंकने लायक उत्‍पादन का पहाड खड़ा किया है तो दूसरी तरफ उसे खरीद पाने में अक्षम भुखमरी फैलाई है। क्‍या मौजूदा कृषि नीति और उसके तहत लाए गए ताजा कानून इस परिस्थिति को आमूल-चूल नहीं तो कम-से-कम सतही तौर पर ही बदल सकेगी? यानि क्‍या इन कानूनों से जरूरत-भर अनाज और उसे खरीद पाने वाले ‘पेट’ दोनों संतुष्‍ट हो पाएंगे? क्‍या तरह-तरह के ‘बकासुरी उपाय’ करने के बावजूद समाप्‍त न हो पाने वाली किसान आत्‍महत्‍याएं रोकने में इन कानूनों से मदद मिल पाएगी? दिल्‍ली में डटा किसान आंदोलन तीनों कानूनों को खारिज करते हुए इस परिस्थिति में बुनियादी बदलाव की ओर एक कदम उठाता दिखाई दे रहा है।

पिछले बड़े आंदोलनों को देखें तो दिल्‍ली का मौजूदा आंदोलन कई मायनों में भिन्‍न दिखाई देगा। तरह-तरह से उकसावे के बावजूद अपने अहिंसक स्‍वरूप, जाति-धर्म-वर्ग के हमारे अंतर्निहित विभाजन से परे, सामूहिक नेतृत्‍व और युवाओं-बुजुर्गों, महिलाओं-पुरुषों आदि को यथायोग्‍य जिम्‍मेदारी देने की बातें जहां हमें नए तरह के आंदोलन की सीख देती हैं, वहीं किसान आंदोलन को भी एक ऊंचाई प्रदान करती हैं। सवाल है कि क्‍या वे अपने भीतर बैठे विकास-रूपी ‘बकासुर’ को पहचानकर उसे खारिज कर पाएंगे? यह हो सका तो मौजूदा विकास की वैतरणी से पार पाया जा सकेगा। (सप्रेस)

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