किसानों की बेचैनी की वजहें

बेलु जोर्ज

दिल्ली की सीमाओं पर करीब दो महीने से ठंड, बरसात और तरह-तरह की दुर्घटनाओं को झेलते बैठे किसानों ने एन ‘गणतंत्र दिवस’ पर टैक्टर रैली का आयोजन किया था, लेकिन कुछ विघ्न-संतोषी लोगों के चलते इसमें हिंसा, मारपीट और सम्पत्ति का नुकसान हुआ। आखिर किसानों की इस बेचैनी की वजहें क्या हैं? क्या हाल में संसद द्वारा पारित दो नए कानून और एक पुराने कानून में संशोधन इतना कष्टकारी है कि किसानों सरीखी शांत बिरादरी भी सीधे टकराने को उतारू हो गई है?

गणतंत्र दिवस इस बात का उत्सव है कि देश संसद और संविधान से आगे बढ़ेगा और इस ‘तंत्र’ को चलाने में ‘गण’ की पूरी भागीदारी होगी। सरकार ऐसे कानून बनाने के लिए प्रतिबद्ध होगी जो देश को ‘कल्याणकारी राज्य’ (अनुच्छेद-37) की और ले जायें और ऐसी व्यवस्थाएं ईजाद करें जिनसे गैर-बराबरी कम हो सके (अनुच्छेद-38(2))। हाल ही में कृषि क्षेत्र को प्रभावित करने वाले ऐसे कानून लाये गए हैं जो इन संवैधानिक परम्पराओं को दरकिनार कर, खेती-किसानी में लगी देश की 60% जनता से, कल्याणकारी व समाजवादी ढांचे की सुरक्षा का घेरा ही छीन लेते हैं। भौचक्के से जन-प्रतिनिधि भी इस बात की शिकायत कर रहे हैं कि इन नए कानूनों पर संसद में  ठीक-ठाक बहस नहीं हुई।

दिल्ली की सीमा पर दस्तक देते किसानों के हजूम से इस बात का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है कि इन क़ानूनों को लेकर किसानों में किस कदर भय और आशंकाओं का माहौल व्याप्त है। मजबूरन वे सड़कों पर ही, नए सिरे से संसदीय बहस कर रहे हैं। जहाँ सरकार इन कानूनी परिवर्तनों को ‘एक आर्थिक अवसर’ के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं किसान कहते हैं कि इन क़ानूनों के प्रभाव से तो कुछ ही वर्षों में किसान अपनी ही भूमि पर मजदूर बन के रह जायेगा।

पहला कानून ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य‍ (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक – 2020’ है, जो खेती की उपज के विक्रय की पुरानी व्यवस्था में एक बडा परिवर्तन करता है। अभी तक किसान, खरीद-फ़रोख्त की एक पारदर्शी व्यवस्था में फसल बेचते थे जो ‘एपीएमसी’ (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) की मंडियों के सरकारी ढांचे के अंतर्गत काम करती थीं और जिस पर किसान का थोडा-बहुत नियंत्रण भी था।   

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किसानों की लम्बे समय से यह मांग रही है कि इन मंडियों में सुधार हो। इन्हें देश भर में जगह-जगह स्थापित किया जाये और साथ ही फसलों के ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) के लिए एक ठोस कानून बनाया जाये। किसानों की इन मांगों से परे, नए कानून द्वारा, उत्पाद बेचने के लिए एक ऐसी व्यवस्था लायी जा रही है जिसकी धुरी ‘एपीएमसी’ की सार्वजनिक प्रकृति वाली, कृषि विपणन मंडिया नहीं, वरन निजी कम्पनियाँ होंगी। 

सरकार का कहना है कि वह ‘एपीएमसी’ मंडियों को बंद नहीं कर रही है, बल्कि किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था ला रही है जिसमें वह अपना उत्पाद निजी ख़रीदारों को बेच सकें ताकि उसे फसल के बेहतर दाम मिलें।  दरअसल, नया कानून ऐसी व्यवस्था बनाता है जिससे मंडियों में बेचने पर शुल्क लगेगा और मंडियों के बाहर निजी कंपनियों को बेचने में कोई शुल्क नहीं लगेगा। इस बिना शुल्क वाले निजी बाज़ार की ओर किसानों का स्वाभाविक आकर्षण होगा और नतीजतन,  ‘एपीएमसी’ मंडिया औंधे मुँह गिरेंगी। उनकी जगह लेगी पूंजी आधारित निजी कम्पनियाँ, जिसमें कॉर्पोरेट जगत का बोलबाला कायम होगा। स्थानीय व्यापारी और किसान तो गौण ही हो जायेंगे।

अपने मुनाफ़े के लिए ये कंपनियाँ आपस में गठजोड बनाएंगी और मनमानी पूर्वक फसल का मूल्य तय करके बाजार पर हावी हो जाएँगी। जब फसल का मूल्य कंपनियों की ताकत से तय होगा और ‘एमएसपी’ का कोई कानून नहीं होगा, तो कोई भी व्यवस्था किसानों को गुलाम बना सकती है। इस शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए किसान अकेला पड जायेगा और उसकी खरीद-फरोख्त संभालने वाली ‘एपीएमसी’ की सरकारी मंडिया दम तोड़ चुकी होंगी। मंडियों के सुरक्षा के दायरे को कमज़ोर कर, किसानों को बाज़ार की ताक़तों के भरोसे छोड़ने का सीधा मतलब है शोषण की गुंजाइशें बढ़ाना।  

इस बात को बिहार की ‘एपीएमसी’ मंडियों से समझा जा सकता है, जहाँ 14 साल पहले, 2005 में नितीश कुमार सरकार ने खरीद-फरोख्त की आज़ादी का हवाला देकर ‘एपीएमसी’ मंडिया समाप्त कर दी थीं। इससे किसानों की हालत में तो कोई सुधार हुआ नहीं, उलटे अब बिहार के किसान, ‘व्यापार मंडियों’ में 1000 रुपए प्रति क्क्विंटल तक पर धान बेच रहे है, जबकि केद्र ने 1868 रुपए क्विंटल की ‘एमएसपी’ घोषित की है। दूसरी ओर नवी मुंबई की ‘एपीएमसी’ मंडियां हैं जो कृषि में आधुनिकीकरण का सफल प्रमाण हैं। वे इस बात को रेखांकित करती हैं कि सार्वजनिक रूप से नियोजित मंडिया भी प्रभावी रूप से नियोजित बाज़ार साबित हो सकती हैं।

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दूसरा कानून ‘कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत, आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक – 2020’ है जो ‘कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग’ यानि अनुबंध खेती को एक कानूनी जामा पहनाकर उसके विस्तार की गुंजाइशों का निर्माण करता है। ‘कॉन्ट्रैक्ट-खेती’ के तहत एक अनुबंध के द्वारा, किसान अपनी जमीन पर किसी कंपनी या कॉन्ट्रैक्टर के लिए खेती करता है जिसमें कॉन्ट्रैक्टर ही किसान को खेती के तरीके बताता है। ऐसी खेती में लगने वाले खाद-बीज, सिंचाई और मजदूरी के सारे खर्च कॉन्ट्रैक्टर देता है। 

‘कांट्रैक्ट-खेती’ से सीधे-सादे, निर्धन और गैर-शिक्षित कृषक, जो अधिकांश: सीमांत हैं, के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि उनका जीवन आपसी विश्वास और समाजिक-नियोजन से चलता है। वे मौखिक और कागज़ी घोड़ों को हांकने की चतुराई से लैस नहीं होते हैं और उन्हें कंपनियों से अनुबंध करने का कोई अनुभव नहीं होता। मौखिक अनुबंध की पैरवी करते इस कानून ने, अनुबंध के स्वरूप, सील-हस्ताक्षर जैसी महत्वपूर्ण बातों पर चुप्पी साध ली है।  परिणामस्वरुप ‘कॉन्ट्रैक्ट-खेती’ की शर्तों पर बड़े ही गडमड ढंग से करार होगा और मामला एकतरफ़ा कंपनियों के पक्ष में जायेगा। ज्यादातर मामलों में तो किसान कंपनी के एजेंट के पीछे भागते नज़र आयेंगे।

होशंगाबाद के किसान बताते हैं कि जब फसल तैयार हो गयी और रेट पर विवाद हुआ तो कंपनी के फ़ोन ही बंद हो गए। ‘अनुबंध-खेती’ के कुछ मामलों में फसल की खरीदी के बाद दिये गये बिल पक्के नहीं हैं, जिन पर न तो बिल नंबर है और न ही विक्रेता/क्रेता की पहचान। कुछ अनुबंध खेती में तो कंपनी ने मनमानी करते हुए, ‘हैक्सा’ (एक किस्म का कीटनाशक) की मात्रा आ जाने की बात कहकर, धान उठाने से साफ़ इंकार कर दिया और जांच की लैब रिपोर्ट मांगने पर भी नहीं दी।

इन नए कानूनों ने किसानों से अदालती कार्यवाही के लिए कोर्ट जाने का हक़ भी छीन लिया है। विवाद की स्थिति में किसान को एसडीएम के निर्णय को अंतिम निर्णय मानकर संतुष्ट होना होगा। विवाद होने पर निजी कंपनियों की दादागिरी का अंदाज़ा गुजरात में ‘पेप्सिको’ कंपनी के दुस्साहसी दावे से लगाया जा सकता है जिसमें उसने प्रत्येक किसान पर डेढ-डेढ करोड रुपयों के मुक़दमे ठोक दिए थे। यह प्रकरण गुजरात के डीसा, साबरकांठा, बनासकांठा और अरावली जिले के 11 किसानों के खिलाफ आलू की ‘एफसी-5’ किस्म के पेटेंट के उल्लंघन पर दर्ज किया गया था। अहमदाबाद के ‘कमर्शियल कोर्ट’ ने किसानों के खिलाफ एकतरफ़ा ‘एक्स-पार्टी इन्जंक्शन’ जारी भी कर दिया था। भारत में जहाँ खेती एक व्यवसाय न होकर, जीविका का साधन है, कृषि को सार्वजनिक रूप से संचालित होना चाहिये, न कि कंपनियों के हाथों में।

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इन दो नए कानूनों के अलावा ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम – 1955’ में संशोधन भी किया गया है जिसके द्वारा इसमें अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेलों, प्‍याज और आलू के नियंत्रण को सरकारी सुरक्षा कवच के दायरे से बाहर कर दिया गया है। अब इनके उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को ‘व्यापार में लचीलापन’ बनाए रखने के नाम पर, निजी कम्पनियों के लिए खोल दिया गया है। इससे ‘कृषि-इन्फ्रास्ट्रक्टर,’ जैसे – कोल्ड-स्टोरेज, सप्‍लाई-चेन के आधुनिकीकरण आदि को बढ़ावा मिलेगा और कंपनियों को छूट दी जा सकेगी।  

इस तरह खाद्य-सुरक्षा से अभिन्न रूप से जुड़े मामले से सरकारी पकड़ को ढीला कर, कंपनियों को आगे लाने के निर्णय के सहारे बड़ी कंपनियां को इस बात की छूट मिल जाएगी और वे बड़े पैमाने पर उपभोक्ता सामग्री को रोक (होल्ड) लेंगी। इससे आने वाले दिनों में महँगाई बढ़ेगी। ‘भारतीय किसान यूनियन’ के महा-सचिव धर्मेंद्र मलिक कहते हैं कि इससे सरकार के हाथ में खाद्यान नियंत्रण नहीं रहेगा, क्योंकि निजी हाथों में खाद्यान्न जमा करने की इजाज़त दे दी गई है। जहाँ ‘भारतीय खाद्य निगम’ (एफसीआई) के कम्प्यूटरीकृत स्टॉक प्रबंधन प्रणाली के माध्यम  सरकार को हमेशा यह पता होता है कि किस जगह, कितना स्टॉक पड़ा है वहीं इस कानून के बाद प्राइवेट सेक्टर में रखे खाद्यान्नों के स्टॉक के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं रहेगी। जहां खाद्य सुरक्षा की स्थिति इतनी विकट है कि 40 से 50 प्रतिशत ग़रीबों को सस्ते गल्ले का लाभ नहीं मिलता, वहीँ ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा’ के संवेदनशील मामले में निजी कंपनियों की उपस्थिति का जोखिम उठाना दुसाहस भरा कदम है।

देश  की कृषि-नीति खेतिहर किसान के स्वाबलंबन पर केंद्रित होना चाहिए, न कि कृषि-उत्पादन पर। किसान पर और किसानी बाज़ार पर किसान का नियंत्रण हो, यह ज़रूरी है। 72 वें ‘गणतंत्र  दिवस’ पर यही बात समझाने और संविधान के मौलिक ढांचे को बचाने के लिए देश का किसान दिल्ली में बैठा है। (सप्रेस)

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