Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

जाने माने चित्रकार, लेखक दिलीप चिंचालकर का देहांत

जाने माने चित्रकार, लेखक दिलीप चिंचालकर का 13 नवंबर की शाम 7.56 बजे इंदौर में देहांत हो गया है। वे पिछले कुछ वर्षों से कठिन बीमारी से जूझ रहे थे। वे पिछले कुछ दिनों से अस्‍पताल में भर्ती थे। होनहार चित्रकार, सुलेखनकार, शिक्षक, पर्यावरण की गहरी समझ रखने वाले, अपनी ही तरह के एकमेव, दिलीप की हम सबसे जुदाई, एक बेहतरीन कला कर्म की कमी का अहसास कराती रहेगी।

वे पिछले 30 से अधिक वर्षों तक अखबारों व पत्रिकाओं के साथ साजसज्‍जा और चित्रकारी में संलन रहे। इसके अलावा कई किताबों के लिए भी उन्‍होंने चित्रांकन किया, जो सराहा गया। उत्तराखंड में चिपको आंदोलन के दौरान अनुपम मिश्र के साथ मिलकर पर्यावरण पुस्तिका के लिए उन्‍होंने पुस्‍तक का आवरण तैयार किया था। यह अनुपम के साथ उनके आजीवन जुड़ाव की शुरुआत थी, जिसके बाद दिलीप अनुपम मिश्र के साथ जुड कर अनेक पुस्‍तकों जिनमें देश का पर्यावरण, हमारा पर्यावरण, आज भी खरे है तालाब, राजस्‍थान की रजत बूंदें आदि किताबों का चित्रांकन खूबसूरती के साथ किया।

सन् 1951 में जन्‍में दिलीप ने 1974 में कृषि विज्ञान में डिग्री लेने के बाद उन्‍होंने बायोकेमेस्ट्री में मास्टर के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान दिल्ली में प्रवेश लिया। इसके बाद उन्‍होंने एडिलेड (ऑस्ट्रेलिया) में प्रोफेसर डीजेडी निकोलस के साथ नाइट्रोजन फिक्सिंग एंजाइमों पर काम करके डॉक्टरल फेलोशिप भी की। ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप पर मोटरसाइकिल, ट्रक और हिच-हाइकिंग द्वारा यात्राएं भी की। लेकिन कुछ समय बाद उनका मन बदल गया। वे आस्ट्रेलिया से आधुनिक खेती की उच्च शिक्षा को अपने देश के लिए एकदम निरर्थक मानकर डिग्री वहीं छोड़ वे वापस लौट आए और कला तथा लेखन कर्म में रम गए।

1980 से 82 तक भरतपुर में पक्षी वैज्ञानिक सालिम अली के साथ समय बिताया। 1980 के दशक में अखबार डिजाइन करना एक चुनौती के रूप में सामने आया। इसे स्वीकार करना उनका एक अच्छा अनुभव रहा। जनसत्‍ता, नईदुनिया जैसे  अखबारेां और पत्रिकाओं से जुडकर कला और चित्रांकन में संलग्‍न रहे । उन्‍होंने खेती, कला और नफासत पर कई आलेख भी लिखे। उनकी अब तक पांच सौ से अधिक लेखन और कला आलोचना हिंदी, मराठी और अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई।

वे पूर्व न्यासी, भारत भवन, भोपाल, ट्रस्टी, प्रभाष परम्परा न्यास, दिल्ली, पूर्व ज्यूरी सदस्य शिखर सम्मान, सानंद वार्षिक नाटक प्रतियोगिताओं में जूरी सदस्य के तौर भी जुडे रहे। दिलीप का मानना था कि जीवन एक मनोरंजन पार्क के समान है और जन्म ही एक प्रवेश टिकट है। जीवन के प्रति रोमांचित व्यक्ति के लिए यथासंभव अधिक से अधिक अनुभव सामान्य है।

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