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पर्यावरण को सहेजने में भारतीय ज्ञान परंपरा सक्षम : कुलपति प्रो. रेणु जैन

पर्यावरण के क्षेत्र में उत्‍कृष्‍ट सेवाएं देने वाले वरिष्‍ठजनों का सम्‍मान

इंदौर 23 फरवरी । आज पर्यावरण संरक्षण के लिए पूरी दुनिया में अनेक उपाय किए जा रहे हैं। विकास की अवधारणा को फिर से परिभाषित किया जा रहा है। भारत अपनी प्राचीन संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण को तलाश रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा पर्यावरण को सहेजने में पूरी तरह सक्षम है।

उक्त विचार देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की कुलपति प्रो. रेणु जैन ने पर्यावरण संरक्षण अनुसंधान एवं विकास केंद्र (सीईपीआरडी) और महाराजा रणजीत सिंह कॉलेज ऑफ प्रोफेशनल साइंसेस द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित पर्यावरण जागरूकता और सम्मान समारोह में व्यक्त किए। कुलपति प्रो. रेणु जैन ने कहा कि भारतीय जीवन शैली की ओर दुनिया आशा से देख रही है।  

वरिष्ठ समाज सेवी सीईपीआरडी के अध्यक्ष एवं वरिष्‍ठ अभिभाषक श्री आनंद मोहन माथुर और महाराजा रणजीतसिंह कॉलेज के चेयरमेन डॉ. राम श्रीवास्तव को सम्मानित किया गया। उनके अलावा पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए चमेलीदेवी इंस्टीट्यूट, महाराजा रणजीत सिंह कॉलेज, मां उमिया कॉलेज राऊ, भेरुलाल पाटीदार कॉलेज महू, केके कॉलेज, श्री जैन दिवाकर कॉलेज, इंदौर लॉ कालेज, आइडिलिक कॉलेज को भी सम्मानित किया गया।

समारोह में पर्यावरण के क्षेत्र में उत्‍कृष्‍ट कार्य करने हेतु समाजसेवी एवं जैविक सेतु से जुडे श्री अंबरीश कैला, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार कुमार सिध्दार्थ (संपादक, पर्यावरण विकास), राजू सैनी, प्रो. माखन कुंभकर, पर्यावरण जानकार एवं वैज्ञानिक डॉ. दिलीप वाघेला, पेड़ों का संरक्षण करने वाले राजेन्द्र सिंह, प्रो. एस. के. शर्मा और उद्योगपति एवं पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्‍यक्ष डॉ. गौतम कोठरी को सम्‍मान पत्र एवं प्रतीक चिन्‍ह भेंट कर सम्मानित किया गया।

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प्रारंभ में डॉ. सागर चौकसे ने पर्यावरण संरक्षण और जीवन शैली पर विचार रखते हुए कहा पौधारोपण के बाद उसकी देखभाल करना जरूरी है। गृहणियां बहुत छोटे कदम से पानी बचाने का बडा काम कर सकती हैं।

देवी अहिल्‍या विश्‍वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विभाग की विभागाध्‍यक्ष एवं महात्‍मा गांधी शोधपीठ की सचिव डॉ. रेखा आचार्य ने पर्यावरण और आर्थिक चुनौती पर अपने विचार रखे। उन्‍होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा बचपन से ही देना चाहिए। अपने घरों के आसपास लगे पौधों की देखभाल से, सप्ताह में एक दिन वाहन न चलाने से हम काफी सुधार कर सकते हैं। वाहनों को धोने में पानी बर्बाद करने वालों को दण्डित करना चाहिए।

डॉ. राजेश व्यास ने भारतीय सिनेमा और पर्यावरण की चर्चा करते हुए कहा कि गीतकारों ने गीतों में प्रकृति के सुंदर चित्र उकेरे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि खण्डवा रोड पर स्थित समस्त शैक्षणिक संस्थाओं को सडक के दोनों ओर आम के पौधे लगाने का संकल्प लेना चाहिए।

डॉ. पुष्पेन्द्र दुबे ने साहित्य और पर्यावरण के संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत में प्रकृति मनुष्य की सहचर है। कवि मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा आदि ने अपनी रचनाओं में प्रकृति का चित्रण किया है।

उद्योगपति, समाज सेवी एवं सीईपीआरडी के उपाध्‍यक्ष डॉ. अनिल भंडारी ने पर्यावरण के क्षेत्र में व्याप्त चुनौतियों पर प्रकाश डाला।  उन्‍होंने कहा कि शहर में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए चौराहों पर वाहन के इंजन बंद करने का प्रयोग सफल रहा। इससे वातावरण शुध्द हुआ। महाराजा रणजीतसिंह कॉलेज आफ प्रोफेशनल साइंसेस के प्राचार्य डॉ. आनंद निघोजकर ने शहर की जैव विविधता को संरक्षित करने के प्रयासों की जानकारी दी।

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कालेज के चेयरमेन डॉ. राम श्रीवास्तव ने कहा कि वातावरण में व्याप्त कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन को कम करने में भारत अवश्य कामयाब होगा।

सीईपीआरडी की शैक्षणिक विभाग की प्रमुख डा संगीता भारुका ने समारोह की भूमिका प्रस्तुत की। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आनंद निघोजकर और सीईपीआरडी के ट्रस्टी एवं सेक्रेटरी डॉ. रमेश मंगल ने अतिथि परिचय और स्वागत उद्बोधन दिया। अतिथियों का स्वागत डॉ. रमेश मंगल, डॉ. इरा बापना, डॉ. संगीता भारूका ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के डॉ. दीपक शर्मा , डॉ. शीतल भसीन, डॉ. मनोज जोशी, प्रो. महिमा जैन, डॉ. प्रदीप पुरे, प्रो. प्रवीण शर्मा, डॉ. सुप्रिया बंडी सहित अनेक कालेजों के प्राचार्य और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रो. दीपांशु पाण्डेय ने किया। आभार डॉ. मुकेश पाटीदार ने माना।

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