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जीडीपी के साथ जीईपी भी बने विकास का पैमाना, 17 अक्टूबर को पटना पहुँचेगी पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी की राष्ट्रीय साइकिल यात्रा

जीडीपी के साथ जीईपी भी बने विकास का पैमाना, 17 अक्टूबर को पटना पहुँचेगी पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी की राष्ट्रीय साइकिल यात्रा
पंकज मालवीय

विकास को केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों से नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और जैव-विविधता की स्थिति से भी आँका जाना चाहिए। इसी संदेश के साथ पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के नेतृत्व में दो अक्टूबर को नेपाल के जनकपुर से शुरू हुई राष्ट्रीय साइकिल यात्रा 17 अक्टूबर को पटना पहुँचेगी। करीब तीन हजार किलोमीटर की इस यात्रा का उद्देश्य जल संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन और सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) की अवधारणा को जनचर्चा का हिस्सा बनाना है।


पंकज मालवीय

पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के नेतृत्व में माँ जानकी की जन्मस्थली जनकपुर, नेपाल से प्रारंभ राष्ट्रीय साइकिल यात्रा बिहार और झारखंड के बड़े हिस्से से गुजरते हुए 17 अक्‍टूबर को पटना पहुँच रही है। गांधी जयंती, 2 अक्टूबर को जनकपुर, नेपाल से प्रारंभ हुई यह यात्रा देवघर (झारखंड), पटना (बिहार), लखनऊ (उत्तर प्रदेश), दिल्ली और देहरादून (उत्तराखंड) तक लगभग 3000 किलोमीटर की दूरी तय करने की परिकल्पना के साथ आगे बढ़ रही है।

डॉ. अनिल प्रकाश जोशी देश के प्रख्यात पर्यावरणविद्, प्रकृति एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में लंबे समय से कार्यरत चिंतक तथा हिमालयन एनवायरनमेंट स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन (HESCO) के संस्थापक हैं। पर्यावरणीय संतुलन, हिमालय संरक्षण, जल एवं प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को लेकर उनका दीर्घकालीन कार्य देशभर में जाना जाता है।

२ अक्टूबर को जनकपुर से शुरू हुई यह यात्रा बिहार और झारखंड के बड़े हिस्सों से गुजर रही है। जनकपुर को माता जानकी की जन्मस्थली माना जाता है। गांधी जयंती के दिन यहाँ से यात्रा शुरू करने के पीछे प्रकृति, जनभागीदारी और जीवन से जुड़े सवालों को लोगों के बीच ले जाने का व्यापक उद्देश्य है। पटना पहुँचने के बाद साइकिल यात्रियों का दल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और दिल्ली होते हुए उत्तराखंड के देहरादून तक जाएगा। पूरी यात्रा में लगभग तीन हजार किलोमीटर की दूरी तय करने का लक्ष्य है। इसमें 17 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की आयु के लोग शामिल हैं। अलग-अलग आयु वर्गों के लोगों की भागीदारी इस अभियान को केवल पर्यावरण विशेषज्ञों तक सीमित न रखकर आम नागरिकों, युवाओं और समुदायों से जोड़ने का प्रयास है।

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यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने यात्रियों का स्वागत किया तथा प्रकृति संरक्षण की इस पहल की सराहना की। यात्रा के समन्वयक एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार कार्यरत पत्रकार पंकज मालवीय ने विशेष बातचीत में डॉ. जोशी के अभियान, उनके विचारों और यात्रा के उद्देश्यों की जानकारी दी।

श्री मालवीय ने बताया कि डॉ डॉ. जोशी के अभियान का केंद्रीय विचार है कि विकास को केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आँकड़ों से नहीं आँका जाना चाहिए। इसके साथ सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) को भी महत्व दिया जाना चाहिए, ताकि आर्थिक प्रगति के साथ प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी की स्थिति का आकलन हो सके। जीडीपी किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन तथा आर्थिक गतिविधियों का हिसाब देता है। लेकिन उत्पादन और आय में वृद्धि अपने आप यह नहीं बताती कि उस दौरान नदियों और तालाबों की स्थिति कैसी रही, भूजल कितना बचा, जंगलों और मिट्टी पर क्या असर पड़ा या जैव विविधता को कितना नुकसान पहुँचा।

GDP जहाँ देश की आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन की तस्वीर प्रस्तुत करता है, वहीं GEP की अवधारणा वन, जल, मिट्टी, जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं के योगदान को समझने पर जोर देती है।

जीईपी की अवधारणा इसी कमी की ओर ध्यान दिलाती है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी से मिलने वाले लाभों को विकास के आकलन में शामिल करना है। जल, वन, मिट्टी, जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी जीवन तथा अर्थव्यवस्था को अनेक तरह से सहारा देते हैं। इन संसाधनों की स्थिति बिगड़ने पर उसका असर खेती, आजीविका, स्वास्थ्य और स्थानीय समुदायों के भविष्य पर पड़ सकता है। इसलिए आर्थिक गतिविधियों का विस्तार ही विकास की पूरी तस्वीर नहीं है; यह देखना भी जरूरी है कि उस विस्तार के दौरान प्रकृति की स्थिति सुधरी है या बिगड़ी है।

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उन्होंने कहा कि यदि किसी क्षेत्र की आर्थिक प्रगति तो बढ़े, लेकिन उसके जंगल, नदियाँ, तालाब, मिट्टी और प्राकृतिक संसाधन लगातार क्षतिग्रस्त हों, तो विकास की तस्वीर अधूरी रह जाती है। वास्तविक समृद्धि वही है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ प्राकृतिक पूँजी का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। GDP अर्थव्यवस्था की प्रगति बताए और GEP प्रकृति की सेहत का आकलन करने में मदद करे, यही संतुलित एवं टिकाऊ विकास की दिशा है। इसी व्यापक सोच को जन-अभियान का स्वरूप देने के उद्देश्य से “जल जीवन जन-जागरण” के संदेश के साथ यह राष्ट्रीय साइकिल यात्रा आयोजित की जा रही है।

श्री मालवीय ने बताया कि इस यात्रा का महत्व केवल इसके भौगोलिक विस्तार में नहीं, बल्कि इसके संदेश और जनभागीदारी की भावना में निहित है। साइकिल को माध्यम बनाकर यह अभियान जलस्रोतों एवं नदियों के संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन, स्वस्थ जीवनशैली, युवाओं की भागीदारी, ग्रामीण विकास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे विषयों को आम नागरिकों के बीच ले जाने का प्रयास कर रहा है। इसके साथ ही विकास की नीतियों और स्थानीय योजनाओं में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर भी जन-जागरूकता पैदा की जा रही है।

बिहार के लिए यात्रा का विशेष महत्व

बिहार के लिए इस यात्रा का विशेष महत्व है। राज्य की पहचान उसकी नदियों, जल-संस्कृति, कृषि, ग्रामीण जीवन, लोक परंपराओं और समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है। दूसरी ओर, बिहार के अनेक क्षेत्रों को बाढ़, जलजमाव, भूजल प्रबंधन, जलस्रोतों के क्षरण और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में GDP के साथ GEP की अवधारणा को जन-चर्चा का हिस्सा बनाना विशेष रूप से प्रासंगिक है। यदि विकास योजनाओं में सड़कों, भवनों, उत्पादन और आय के साथ तालाबों के पुनर्जीवन, नदियों के संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, हरित क्षेत्र के विस्तार और जैव-विविधता की स्थिति का भी आकलन किया जाए, तो विकास अधिक समावेशी और टिकाऊ बन सकता है।

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पंचायतों और स्थानीय निकायों के स्तर पर पर्यावरणीय संकेतकों का नियमित आकलन इस दिशा में उपयोगी पहल हो सकती है। श्री मालवीय के अनुसार, बिहार में जल और प्रकृति संरक्षण का संदेश गाँवों, कस्बों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, युवाओं और सामाजिक संगठनों तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है। यह यात्रा लोगों को प्रकृति संरक्षण को केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी न मानकर सामूहिक सामाजिक दायित्व के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के विचारों का मूल संदेश यह है कि प्रकृति और स्थानीय संसाधनों को सुरक्षित रखे बिना विकास को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। GDP और GEP के बीच संतुलन की चर्चा इसी सोच को व्यापक सामाजिक एवं नीतिगत विमर्श से जोड़ती है। राष्ट्रीय साइकिल यात्रा इसी संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है कि जल, जंगल, जमीन और जैव-विविधता का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। आर्थिक विकास की उपलब्धियों के साथ प्रकृति की स्थिति को भी महत्व देकर ही एक स्वस्थ, समृद्ध और टिकाऊ भारत का निर्माण संभव है।

लेखक का परिचय

पंकज मालवीय

पंकज मालवीय वरिष्‍ठ पत्रकार है।

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