Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

भूदान से जयजगत तक : विनोबा भावे की प्रासंगिक विरासत

कुमार सिद्धार्थ

11 सितंबर को आचार्य विनोबा भावे की 130वीं जयंती पर हम उस महापुरुष को स्मरण करते हैं, जिसने सत्य, अहिंसा और सेवा को जीवन का मूलमंत्र बनाया। “जय जगत” का उनका संदेश विश्वबंधुत्व, न्याय और समता पर आधारित था। भूदान आंदोलन के माध्यम से उन्होंने अहिंसा और सहयोग की शक्ति से सामाजिक परिवर्तन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो आज भी प्रासंगिक है।

आचार्य विनोबा भावे की 130वीं जयंती पर विशेष

11 सितंबर का दिन हमें एक ऐसे महापुरुष की याद दिलाता है जिसने अपना पूरा जीवन सत्य, अहिंसा और सेवा को समर्पित कर दिया। आचार्य विनोबा भावे की 130 वीं जयंती का यह अवसर है। उन्‍हें महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने गांधी की परंपरा को केवल आगे नहीं बढ़ाया बल्कि उसे नए आयाम दिए। उनके जीवन और विचारों का सबसे सशक्त प्रतीक है— “जय जगत।” यह मात्र एक अभिवादन नहीं था, बल्कि पूरी मानवता को जोड़ने वाली सोच थी।

जय जगत के मंत्र में निहित था कि हम बिना किसी भेदभाव के, बिना आक्रामकता के, निर्मल भाव से पूरी दुनिया की भलाई चाहें। यह सोच हमें याद दिलाती है कि वास्तविक भाईचारा वहीं पनप सकता है जहां समता और न्याय हो, शोषण और दमन न हो।

विनोबा भावे का जीवन गांधीवादी मूल्यों का जीता-जागता उदाहरण था। वे साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनके विचार असाधारण थे। भूदान आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब उन्होंने पूरे देश में घूम-घूमकर संपन्न लोगों से जमीन दान में मांगी ताकि भूमिहीन किसानों को जीवन का आधार मिल सके।

1951 में तेलंगाना के पच्चमपल्ली गाँव से शुरू हुआ यह आंदोलन भारत में सामाजिक समता और शांति का अभूतपूर्व प्रयोग था। जब भूमिहीन किसानों ने उनसे जमीन की मांग की, तो उन्होंने किसी सरकार या अदालत का सहारा नहीं लिया, बल्कि सीधे जमींदारों से अपील की। उसी गाँव में जमींदार ने स्वेच्छा से 100 एकड़ भूमि दान में दी और यही भूदान आंदोलन की शुरुआत बनी।

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इसके बाद विनोबा भावे पैदल पूरे देश में निकले। उनका यह पदयात्रा कई वर्षों तक चलती रही। उन्होंने लगभग 13 वर्षों में 58 हजार किलोमीटर की दूरी तय की और गाँव-गाँव जाकर जमीन दान में मांगी। इस अभियान के परिणामस्वरूप लगभग 47 लाख एकड़ भूमि दान में मिली, जो उस समय एक सामाजिक क्रांति से कम नहीं थी। यह आंदोलन केवल भूमि वितरण का प्रयास नहीं था, बल्कि समाज में अहिंसा, विश्वास और सहयोग की शक्ति का प्रमाण भी था। विनोबा ने बताया कि यदि समाज सहयोग की भावना से काम करे तो बिना संघर्ष और हिंसा के भी न्यायपूर्ण बदलाव संभव हैं। उनका सपना था कि समाज अपने भीतर से ही न्यायपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण बने, सरकार या सत्ता के दबाव से नहीं।

“जय जगत” का विचार भी इसी सोच का विस्तार है। यह हमें बताता है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने देश, जाति या धर्म तक सीमित नागरिक नहीं है, बल्कि वह पूरे विश्व का नागरिक है। इस विचार में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है—न रंग का, न नस्ल का, न लिंग का, न धर्म का, न राष्ट्रीयता का। इसमें जीवन के सभी रूपों की रक्षा और भावी पीढ़ियों की सुरक्षा का गहरा भाव निहित है। यह हमें केवल मानव बंधुत्व तक सीमित नहीं करता, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के साथ भी न्याय करने की प्रेरणा देता है।

आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, युद्ध और हिंसा, असमानता, गरीबी और शोषण जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, तब “जय जगत” का संदेश और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। परमाणु हथियारों से लेकर वैश्विक तापमान वृद्धि तक, हर चुनौती हमें यह बताती है कि मानवता के अस्तित्व की रक्षा केवल आपसी सहयोग और भाईचारे से ही संभव है। विनोबा भावे का यह संदेश कि समता, न्याय और अहिंसा के आधार पर ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाया जा सकता है, आज एक गहरी सच्चाई की तरह हमारे सामने खड़ा है।

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विश्व नागरिकता और विश्व बंधुत्व की पहचान को अभी भी बहुत कम महत्व दिया जाता है, जबकि यही सोच हमें संकीर्णताओं से बाहर निकाल सकती है। यदि हम अपने आपको केवल किसी देश या समूह तक सीमित रखेंगे, तो भेदभाव और संघर्ष कभी समाप्त नहीं होंगे। विनोबा भावे की सोच हमें यह अवसर देती है कि हम पूरे विश्व को एक परिवार मानें और उसकी भलाई को अपना उद्देश्य बनाएँ। जब हम इस दृष्टि से सोचेंगे, तब गरीबी, हिंसा और पर्यावरण संकट जैसी समस्याओं का समाधान भी सामूहिक रूप से खोजा जा सकेगा।

विनोबा भावे का यह विचार गांधीवादी आंदोलनों की धारा से गहराई से जुड़ा है। सर्वोदय आंदोलन ने समाज में आत्मनिर्भरता, ग्राम स्वराज और सहयोग की राह दिखाई। यह सोच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और न्याय के कई आंदोलनों से जुड़ सकती है। इसकी अनुकूल भूमिका तैयार करने के लिए विश्व बंधुत्व व नागरिकता global-citizenship पर कई स्तरों पर विमर्श जरूरी है। सर्वोदय आंदोलन की ‘जय जगत’ की सोच इसके बहुत अनुकूल है। विश्व में अमन-शांति के कई आंदोलन व अभियान हैं। ये सब संयुक्‍त रूप से इस दिशा में प्रवृत्‍त होंगे ऐसे में “जय जगत” केवल एक दर्शन नहीं रहेगा, बल्कि धरती को बचाने और उसे बेहतर बनाने की ठोस कार्ययोजना भी बन सकता है।

विनोबा भावे की जयंती हमें याद दिलाती है कि सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर सेवा ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है। उन्होंने कभी सत्ता का मोह नहीं किया, बल्कि जनशक्ति और नैतिक शक्ति पर विश्वास किया। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व किसी राजनीतिक पद से नहीं, बल्कि जनविश्वास और उनके विचारों की गहराई से पहचाना जाता है। आज के दौर में जब समाज अनेक विभाजनों से जूझ रहा है, विनोबा का यह संदेश और भी जरूरी हो जाता है कि असली ताकत भाईचारे, न्याय और समता में है।

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उनकी जयंती पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम संकीर्णताओं से ऊपर उठकर विश्व बंधुत्व और न्यायपूर्ण समाज की ओर कदम बढ़ाएँ। केवल मनुष्यों तक सीमित रहकर नहीं, बल्कि समूचे जीवन और भावी पीढ़ियों की रक्षा के लिए भी जिम्मेदार बनें। “जय जगत” का आह्वान आज भी हमें पुकार रहा है—एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए, जिसमें कोई शोषण न हो, कोई भेदभाव न हो, और हर व्यक्ति व हर जीवन स्वरूप सम्मान और सुरक्षा के साथ जी सके। विनोबा की “जय जगत” की यह अवधारणा न केवल समता और न्याय से जुड़ी है, बल्कि साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध समान अधिकार और साझी मानवता की चेतना से भी गहराई से सम्बद्ध है।

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