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केंद्र सरकार से किसानों का विश्वास टूटा, व्यापार समझौते और नए विधेयक किसान विरोधी — भाकियू

नई दिल्ली, 11 फ़रवरी। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) ने भारत सरकार द्वारा अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ किए गए हालिया व्यापार समझौतों और कृषि क्षेत्र से जुड़े प्रस्तावित विधेयकों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि इन कदमों से किसानों की आजीविका, बीज संप्रभुता और कृषि अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रतिकूल असर पड़ेगा। संगठन ने आरोप लगाया कि सरकार ने किसान संगठनों से व्यापक परामर्श किए बिना समझौते आगे बढ़ाए हैं और अब तक इनके पूरे दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

भाकियू के अनुसार, 27 जनवरी 2026 को भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता अंतिम रूप से संपन्न किया गया, जबकि अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की घोषणा जनवरी के प्रारंभ में की गई थी, जिसकी पुष्टि 7 फरवरी को जारी संयुक्त वक्तव्य से हुई। संगठन का कहना है कि समझौतों के वास्तविक प्रावधानों को गोपनीय रखा जाना पारदर्शिता के विपरीत है और इससे किसानों में अविश्वास बढ़ा है।

भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ. राकेश टिकैत ने कहा कि विकसित देश अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं और अधिशेष कृषि उत्पादों को विकासशील देशों के बाजारों में उतारते रहे हैं। ऐसे में यदि भारतीय बाजार बड़े पैमाने पर आयात के लिए खोला गया तो घरेलू किसानों को असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा और फसलों के दामों में गिरावट आ सकती है।

संगठन ने विशेष रूप से अमेरिका के साथ हुए समझौते को लेकर चिंता जताई है। उसके अनुसार, इस व्यवस्था से DDGs, सोयाबीन तेल, ट्री नट्स, फल एवं अन्य कृषि-खाद्य उत्पादों का आयात बढ़ेगा। भाकियू का दावा है कि DDGs जैसे उत्पादों के आयात से मक्का, ज्वार और सोयाबीन जैसी फसलों की घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ेगा। संगठन ने कहा कि सोयाबीन उत्पादक राज्य पहले ही मूल्य संकट से जूझ रहे हैं और सस्ते आयात से स्थिति और गंभीर हो सकती है।

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गैर-शुल्क बाधाओं को हटाने पर सहमति को भी भाकियू ने गंभीर विषय बताया है। संगठन का कहना है कि इससे आनुवंशिक रूप से परिवर्तित (GM) उत्पादों और जीन-संपादित फसलों के आयात का रास्ता खुल सकता है, जबकि इनके दीर्घकालिक प्रभावों पर पर्याप्त सार्वजनिक अध्ययन और बहस नहीं हुई है।

भारत–यूरोपीय संघ FTA पर भाकियू का मत है कि टैरिफ कटौती के दावों के बावजूद भारतीय कृषि उत्पादों को यूरोपीय बाजार में सख्त तकनीकी और स्वास्थ्य मानकों के कारण वास्तविक लाभ मिलना मुश्किल होगा। इसके विपरीत, यूरोपीय संघ के सब्सिडी प्राप्त कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश कर स्थानीय किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकते हैं। संगठन ने पौध किस्म अधिकारों और बौद्धिक संपदा प्रावधानों को लेकर भी आशंका जताई है और कहा है कि यदि अंतरराष्ट्रीय मानकों को ज्यों का त्यों स्वीकार किया गया तो किसानों के बीज बचाने और साझा करने के अधिकार कमजोर होंगे।

प्रस्तावित बीज विधेयक 2025 को लेकर भाकियू ने कहा कि यह बीज क्षेत्र में कॉरपोरेट नियंत्रण बढ़ाने वाला है और इसमें बीज कीमतों के प्रभावी नियंत्रण तथा बीज विफलता पर किसानों को पर्याप्त मुआवजा देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखता। संगठन का मानना है कि इससे पारंपरिक बीज प्रणालियां और सार्वजनिक संस्थान हाशिए पर चले जाएंगे तथा राज्यों की भूमिका सीमित होगी।

कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025 पर भी भाकियू ने आपत्ति दर्ज की है। संगठन के अनुसार विधेयक में मूल्य नियंत्रण, जवाबदेही और शिकायत निवारण की मजबूत व्यवस्था का अभाव है और राज्यों को हानिकारक कीटनाशकों पर दीर्घकालिक प्रतिबंध लगाने के पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए हैं। इसे उद्योग-उन्मुख बताते हुए संगठन ने कहा कि किसानों और उपभोक्ताओं की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।

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विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025 को लेकर भाकियू का कहना है कि यह बिजली क्षेत्र के निजीकरण और केंद्रीकरण को बढ़ावा देगा। संगठन के मुताबिक इससे कृषि बिजली व्यवस्था महंगी और अस्थिर हो सकती है, जबकि प्रीपेड स्मार्ट मीटर जैसी व्यवस्थाएं छोटे किसानों के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं, विशेषकर सिंचाई के चरम समय में।

इन सभी मुद्दों पर भाकियू ने सरकार से आग्रह किया है कि व्यापार समझौतों के कृषि संबंधी प्रावधानों को वापस लिया जाए या सार्वजनिक कर व्यापक चर्चा कराई जाए। संगठन चाहता है कि बीज और कीटनाशक संबंधी विधेयकों में किसान अधिकारों की स्पष्ट सुरक्षा, मूल्य नियंत्रण और जवाबदेही प्रावधान जोड़े जाएं, पौध किस्म और बीज अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव स्वीकार न किया जाए तथा विद्युत संशोधन विधेयक को वापस लिया जाए। भाकियू ने यह भी कहा कि कृषि से जुड़े किसी भी बड़े नीतिगत फैसले से पहले किसान संगठनों से संस्थागत परामर्श की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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