समाज

घरेलू हिंसा का बढ़ता साया : घर की चुप्पी में दम तोड़ती आधी आबादी

भारत में घरेलू महिला हिंसा की ताज़ा तस्वीर गहरी चिंता पैदा करती है। WHO और NCRB के आँकड़े बताते हैं कि हर तीसरी महिला अपने ही साथी की हिंसा का शिकार होती है, लेकिन दर्ज मामले वास्तविक पीड़ा का छोटा…

डिजिटल शोहरत के पीछे छिपी त्रासदी : बच्चों की सुरक्षा बनाम मुनाफ़ा

राज्यसभा में सुधा मूर्ति की आवाज़ ने उस सच्चाई को उजागर कर दिया, जिसे समाज लंबे समय से टालता आ रहा था—डिजिटल दुनिया बच्चों के बचपन को निगल रही है। किडफ्लुएंसर संस्कृति की चमक के पीछे शोषण, दबाव, ट्रोलिंग और…

बोधि दिवस : आत्मज्ञान, जागृति और मानवीय उत्कृष्टता का उत्सव

8 दिसंबर मानव इतिहास की उस अद्वितीय जागृति का उत्सव है, जिसने सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया और पूरी मानवता को करुणा, विवेक और आत्मज्ञान का मार्ग दिया। बोधि दिवस हमें यह समझाता है कि सदियों बाद भी शांति और सत्य…

लोकतांत्रिक आत्मा का जीवंत घोषणापत्र है संविधान

26 नवम्बर भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का वह ऐतिहासिक क्षण है, जब देश ने समानता, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित अपने भविष्य की दिशा तय की। संविधान दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उस आधुनिक चेतना का सम्मान है,…

लेबर कोड 2025 : श्रमिक गरिमा और सामाजिक न्याय की दिशा में एक निर्णायक मोड़

लेबर कोड 2025 केवल कानून में बदलाव नहीं, बल्कि भारत के श्रम परिदृश्य में संरचनात्मक सुधार की शुरुआत है। न्यूनतम वेतन की एकरूपता, स्वास्थ्य सुरक्षा, सामाजिक संरक्षण और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के लिए नई गारंटियाँ—इन सबके बावजूद असली…

सच्चिदानन्द सिन्हा : समाजवादी विचारधारा के जीवंत मशाल

समाजवादी चिंतक और लेखक सच्चिदानन्द सिन्हा का बुधवार को निधन एक युगांतकारी क्षति है। 98 वर्ष की आयु में विदा हुए सच्चिदानन्द बाबू ने अपनी गहन वैचारिक दृष्टि, सादगीपूर्ण जीवन और दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के माध्यम से भारतीय…

मछुआरा महिलाओं का संघर्ष : सवाल जो अब भी अनसुने हैं

विश्व मछुआरा महिला दिवस पर सवाल यही है कि मछुआरा महिलाओं का नेतृत्व, उनकी आवाज़ और उनके संघर्ष आज भी मुख्यधारा के महिला आंदोलनों में जगह क्यों नहीं पाते? समुद्र किनारे खड़ी ये महिलाएं सिर्फ आजीविका नहीं, जाति, श्रम और…

दीपावली : रोशनी का नहीं, रिश्तों और जिम्मेदारी का पर्व

दीपावली केवल रोशनी और उत्सव का नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, पारिवारिक बंधन और मानवीय संवेदनाओं का पर्व है। यह त्योहार न केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, बल्कि समाज में सद्भाव, समानता और सहयोग की भावना को…

दीपावली : रोशनी घर में नहीं, दिलों में भी फैलाएं

दिवाली रोशनी का नहीं, संवेदनाओं का भी त्योहार है — वह जो भीतर के अंधकार को मिटा सके। आज जब कृत्रिम उजालों में रिश्तों की ऊष्मा खोती जा रही है, जरूरत है कि हम अपने भीतर करुणा, प्रेम और अपनापन…

कृषि : खेतों में महिलाओं का अदृश्य श्रम और मान्यता की लड़ाई

National Women Farmers Day इस तथ्य की याद दिलाता है कि खेतों में बीज से लेकर फसल तक का अधिकांश कार्य महिलाएं करती हैं, परंतु पहचान और नीति में वे अब भी हाशिए पर हैं। झाबुआ जैसे इलाकों में उनके…