कला और संस्‍कृति

इतिहास की खोई हुई समझ और समाज का भ्रमित रुख

करीब सवा तीन सौ साल पहले रुखसत हुए औरंगजेब की कब्र उखाड़ने से लगाकर बरसों पुराने गैर-हिन्दू उपासना-गृहों को खोदकर उन्हें हिन्दू साबित करने की मौजूदा हुलफुलाहट ने, एक समाज की हैसियत से हमें बेहद अज्ञानी और इतिहास-विमुख साबित कर…

Baisakhi 2025 : भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना का पर्व है बैसाखी

कृषि प्रधान भारत में बैसाखी न केवल फसल कटाई का उल्लास है, बल्कि सिख नववर्ष, सामाजिक चेतना और ऐतिहासिक संघर्षों की गूंज भी है। पंजाब की धरती पर गूंजते ढोल-नगाड़ों और गिद्दा-भांगड़ा की थाप के साथ यह पर्व जहां समृद्धि…

‘सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी’ : एक बेहतरीन विरासत

सामंती समाज की लाख बुराइयों के बावजूद कतिपय राजे-महाराजे पढ़ने-लिखने के भारी शौकीन हुआ करते थे। कई रजवाडों की लाइब्रेरियां असंख्य बेशकीमती,अनूठी किताबों से भरी रहती थीं। आज की जोधपुर की ‘सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी’ इन्हीं में से एक है। अशोक…

फ़िल्म इन गलियों में: हाशिए की ज़मीन से उठता एक सिनेमाई प्रार्थना-गीत

नई फिल्म ‘इन गलियों में’ एक ऐसी कहानी है जो भारत की विविधता का प्रतिनिधित्व करती है। यह फिल्म अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखने वाले आर्थिक रूप से पिछड़े एक युवा जोड़े की प्रेम कहानी है। अवंतिका दसानी और विवान…

वरिष्ठ पत्रकार, कला समीक्षक शकील अख्‍तर ‘राष्ट्रीय अभिनव कला समीक्षक सम्मान’ से सम्‍मानित

सम्‍मान के बाद शकील अख़्तर ने कहा ‘कला समीक्षक से ज़्यादा प्रोत्साहक की भूमिका निभाई’ इंदौर, 29 मार्च। ‘रंगमंच के एक कलाकार के रूप में मैंने इंदौर से अपनी कला का सफ़र शुरू किया था। आज मुझे कला समीक्षक का…

भाषा विमर्श : आखिर कैसे अलग है, हिंदी से उर्दू ?

संवाद के लिए बनी भाषा आजकल फिरकापरस्ती की दुनाली बनती जा रही है। सत्ता पर विराजी भाजपा अपनी एक-आयामी नजर से खुद को छोड़कर बाकी सबको खारिज करने में लगी है। उर्दू को एक धर्म-विशेष की भाषा करार देना इसी…

बाजार की ताकतों ने कला को उत्पाद बना दिया, कलाकारों को फ़िल्म उद्योग का कच्चा माल नहीं बनना चाहिए

विश्व रंगमंच दिवस पर इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना ने कहा इंदौर, 27 मार्च। प्राणी जगत में इंसान ही एकमात्र ऐसा जीव है, जो कई भूमिकाओं में रहता है। समय पर व्यक्ति को अपनी अभिनय की भूमिका से…

Theatre : रंगमंच और शांति की संस्कृति

रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और संवेदना का जीवंत प्रतिबिंब है। विश्व रंगमंच दिवस (27 मार्च), जिसे 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट ने स्थापित किया, रंगमंच की गरिमा, प्रभाव और उसकी वैश्विक भूमिका को रेखांकित करने…

आज कला-साहित्य समाज का वास्तविक प्रतिपक्ष है: अशोक वाजपेयी

भोपाल में दीपेंद्र बघेल स्मृति व्याख्यान भोपाल,23 मार्च। चिंतक व लेखक दीपेंद्र बघेल की स्मृति में आयोजित व्याख्यान में प्रख्यात कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि हिंदी समाज कला व साहित्य से विमुख समाज में बदलता जा रहा…

‘आन गांव के सिद्ध’ हैं, ‘घर के जोगी’

पुस्‍तक समीक्षा आशीष दशोत्तर की किताब ‘घर के जोगी’ में जिन 54 कवियों, साहित्यकारों को संजोया गया है वे यूं तो दुनिया-जहान में साहित्‍य क्षेत्र के जाने-पहचाने नामधारी हैं और इस लिहाज से स्थानीय नहीं कहे जा सकते, लेकिन जब…