‘आन गांव के सिद्ध’ हैं, ‘घर के जोगी’

पुस्‍तक समीक्षा

कुमार सिद्धार्थ

आशीष दशोत्तर की किताब ‘घर के जोगी’ में जिन 54 कवियों, साहित्यकारों को संजोया गया है वे यूं तो दुनिया-जहान में साहित्‍य क्षेत्र के जाने-पहचाने नामधारी हैं और इस लिहाज से स्थानीय नहीं कहे जा सकते, लेकिन जब कोई करीबी उनकी सुध लेता है तो रंग बदल जाता है। दशोत्तर ने अपने इसी रिश्ते की डोर से अपने समय और इलाके के कवियों को अपनी किताब में बांधा है। विश्‍व कविता दिवस के निमित्‍त ‘घर के जोगी’ पुस्तक पर समीक्षात्‍मक टिप्‍पणी।

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किताबें केवल अध्ययन का साधन भर नहीं होतीं, बल्कि वे समाज, साहित्य और संस्कृति का सजीव दर्पण बनकर भावी पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य संदर्भ ग्रंथ भी होती हैं। आशीष दशोत्तर का हाल में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘घर के जोगी’ मालवा में जन्मे और सक्रिय रहे कवियों तथा साहित्यकारों के आत्‍मीय संस्मरणों और कविताओं के मर्म को इसी तरह प्रस्तुत करता है। यह किताब साहित्य की उस ज़मीन की पड़ताल करती है, जहाँ कविता और संस्कृति का मेल होता है।

आशीष दशोत्तर समकालीन हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित रचनाकारों में से एक हैं, जिनका रचनात्मक अवदान कविता, व्यंग्य, कहानी, संस्मरण और साक्षात्कार लेखन तक फैला है। हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। अपनी बात में आशीष लिखते हैं कि ‘घर के जोगी’ किताब ज़मीन से जुड़े ऐसे घर के जोगियों की है जिन्‍हें स्‍थानीय बोली में ‘जोगड़ा’ कहा जाता है। कहावत है, ‘घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध।’  कवि ने अपनी जमीन की कविता की सुध लेने की कोशिश में अपने ही घर को तलाशा है। इस पड़ताल में कविता की समृद्ध परंपरा से परिचित होने का अवसर मिला, जो हमारे लिए धरोहर भी है और प्रेरणा भी।

इस किताब में लेखक ने कविता की जमीन और जमीन की कविता  के अंतर्गत स्‍पष्‍ट किया है कि किस प्रकार एक शहर, उसकी संस्कृति और उसकी जमीनी वास्तविकताएँ कविता के निर्माण में सहायक होती हैं। कविता केवल शब्दों का मेल नहीं होती, बल्कि उसमें ज़मीन की खुशबू, समाज की धड़कन और जीवन के अनुभव रचे-बसे होते हैं। समकालीन कविता के कई मूर्धन्‍य हस्‍ताक्षरों का उल्लेख करते हुए दशोत्तर बताते हैं कि कैसे साहित्यकार परिवेश से प्रेरणा लेते हुए अपनी रचनाओं को जीवंत बनाते हैं। यह किताब इशारा करती है कि कविता केवल कल्पना से नहीं, बल्कि जीवन की ठोस वास्तविकताओं से जन्म लेती है।

“घर के जोगी” एक बहुआयामी किताब है, जो साहित्य, इतिहास, समाज और संस्कृति के विविध आयामों को समेटे हुए है। रचनाकारों के रचनाकर्म और संस्‍मरणों से गुंथी यह किताब उनके काव्‍य संदर्भों को समग्रता में रखते हुए कविता की जमीन को पुख्‍ता करती है। आशीष दशोत्तर का साक्षात्कार-लेखन साहित्यिक जगत में सराहा गया है। उन्होंने विभिन्न साहित्यकारों से संवाद कर उनके विचारों, लेखन प्रक्रिया और साहित्यिक यात्रा को दस्तावेज़ रूप में संरक्षित किया है, किताब में इसकी झलक भी देखने को मिलती है।

किताब में जिन सशक्‍त हस्‍ताक्षरों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है, उनमें चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, सुदीप बैनर्जी, गोपालसिंह नेपाली, प्राणवल्लभ गुप्ता, पवन कुमार मिश्र, प्रो. गणेशदत्त त्रिपाठी, प्रो. हरिहर गोस्वामी, प्रो. रमेश गुप्ता, प्रो. रामकुमार चतुर्वेदी चंचल, डॉ. जयकुमार जलज, प्रो. अजहर हाशमी, प्रो. रतन चौहान, डॉ. देवव्रत जोशी, डॉ. हरीश पाठक, अशोक डागोर, सत्यनारायण सत्तन, प्रभाशंकर उपाध्याय, गोपालदास ‘नीरज’, बालकवि बैरागी जैसे प्रतिष्ठित रचनाकार उल्‍लेखनीय हैं। इन साहित्यकारों ने अपने काव्य, गीत और लेखों के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया है। इसके माध्यम से हमें इन लेखकों के समाज और समय को देखने-परखने की दृष्टि और दर्शन की झलक भी मिलती है।

हिंदी कविता का इतिहास इस बात का साक्षी है कि सत्ता के निरंकुश चेहरे के सामने वह प्रतिरोध की आवाज बनकर उभरी है। कविता व्यापक सत्य को अपनी परिधि में समेटती है। यह सहज मानवीय अनुभूतियों – जैसे दुख, पीड़ा, अभाव, संघर्ष, हर्ष, शोषण आदि को समाहित कर अपनी जमीन तैयार करती है। यह माना जाता है कि कवि कल्पना के सहारे केवल भविष्य के सुनहरे ताने-बाने बुनने में रुचि रखता है, लेकिन सच्चाई यह है कि साहित्‍यकारों ने अपने समय के सामाजिक परिवेश और भोगे हुए यथार्थ को गहरे अहसास के साथ रचना कर्म में प्रकट किया है।

“घर के जोगी” किताब की विशेषता इसकी प्रमाणिकता और शोधपरकता है। लेखक ने विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों/संदर्भों को खंगालकर समाज, संस्कृति और साहित्‍य का सम्यक विवेचन किया है। यह किताब केवल तथ्यात्मक जानकारी का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि समकालीन परिस्थितियों के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों का भी विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक आशीष दशोत्तर का साहित्यिक सफर भी बहुआयामी रहा है। उनकी कविताएँ समाज के जटिल यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन प्रश्नों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करती है। दशोत्तर की व्यंग्य लेखन क्षमता भी उल्लेखनीय है। उनके लेखन में हास्य और व्यंग्य के माध्यम से समाज की विसंगतियों को उजागर करने की विशेष कला दिखाई देती है। कहानी साहित्य में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

“घर के जोगी” किताब की भाषा सहज, प्रवाहमयी और संवादात्मक है। इसमें साहित्यिक सौंदर्य और तथ्यपरकता का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। यह केवल एक किताब नहीं है, बल्कि हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करती है। यह किताब कविता की उस अंतर्निहित शक्ति को सामने लाती है, जो समाज को जागरूक करने, विचारों को प्रेरित करने और साहित्य को सशक्त करने का कार्य करती है। यह किताब उन पाठकों के लिए एक धरोहर है, जो साहित्‍य को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि उसे गहराई से अनुभव करना चाहते हैं।

किताब दर्शाती है कि किस प्रकार कविता और साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज के भीतर गहरे बदलाव का माध्यम होते हैं। इसमें सम्मिलित साहित्यकारों के योगदान से स्पष्ट होता है कि कविता केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह समाज के संघर्षों, आशाओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति भी होती है। जो पाठक साहित्य, समाज और संस्कृति में गहरी रुचि रखते हैं, उनके लिए यह किताब महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज है। किताब पाठकों को अपने साहित्यिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती है और विचारों, दृष्टिकोण और संवेदनाओं को भी पाठकों तक पहुँचाती है। यह किताब प्रमाणित करती है कि कविता की ज़मीन हमेशा समाज की ज़मीन से जुड़ी रहती है। (सप्रेस)

साहित्यकारों के फोटो-कोलाज से बने आकर्षक कवर वाली आशीष दशोत्तर की यह पुस्तक मालवा की मिट्टी में जन्मे और रचे-बसे साहित्यकारों की रचनाओं का संकलन है। 372 पेज की इस किताब को ‘बोधि प्रकाशन, जयपुर’ ने प्रकाशित किया गया है। किताब साहित्य जगत की शख्सियतों से परिचय कराती है, जिन्होंने अपनी कल्पनाओं को महज स्वप्नलोक तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने समय की घटनाओं के मर्म को शब्दों में ढाला है। पुस्‍तक का मूल्‍य 499 रखा गया है।

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