धर्म और पहचान की राजनीति के बीच भारत के सामने आज सबसे बड़ा सवाल केवल विकास या आर्थिक प्रगति का नहीं, बल्कि उस सामाजिक ताने-बाने को बचाए रखने का भी है, जिसने विविधताओं के बावजूद देश को एक साथ रखा है। गांधी का भारत इसी साझा विरासत, सह-अस्तित्व और परस्पर विश्वास पर खड़ा था। आज उसकी जरूरत पहले से अधिक है।
हाल ही मैं अपने घर की दो महिलाओं के साथ घूमने के लिए मलेशिया गई थी। एक दिन निकले कहीं तो टैक्सी वाले ने सहजता से पूछा: किस मुल्क से आए हैं आप लोग? ’
जैसे ही हमने कहा, इंडिया, वह खिल उठा : ‘अच्छा, तो आप एसआरके के देश से आए हैं! इसके बाद तो उसने मुस्कुराते हुए अपनी बेबाक टिप्पणियों से ऐसे शब्द-बाण चलाए कि हममें से कोई उसका प्रतिकार नहीं कर सका। उसने बताया कि ‘ट्वेल्थ फेल’ उसकी पसंदीदा फिल्म है और उसने एक चुभता हुआ सवाल भी दागा : ‘क्या भारत में आज भी जातिवाद है? हिंदी फ़िल्मों में इसे देखकर दिल बैठ जाता है।’
टैक्सी में बैठी ‘जेन-जी’ बेटी ने थोड़ा बचाव करते हुए कहा : जातिवाद है तो सही, पर शहरों में अब यह तेजी से खत्म हो रहा है। हम बड़े चुप ही रहे। ड्राइवर यहीं नहीं रुका, उसने भारत में महिला सुरक्षा और बलात्कार की घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि यह बेहद दुखद और शर्मनाक है क्योंकि महिलाओं का तो सम्मान होना चाहिए। हम उसकी बात से इनकार नहीं कर सकीं, पर बेटी फिर बचाव में उतरी : लेकिन मुंबई बेहद सुरक्षित है! हमारे टैक्सी से उतरते-उतरते उसने कुछ ऐसा कहा कि हमने उसके सारे तीखे बोल भुला दिए, और हमारा दिल जीत लिया। उसने बेहद हैरान होकर कहा : लेकिन ‘भारत का असली चमत्कार तो यह है कि इतनी भिन्नताओं, विविधताओं और अलग-अलग मजहबों के बावजूद वहां कभी कोई गृह युद्ध नहीं होता! एक विदेशी हमारे देश की ऐसी विशेषता को पहचानता भी है और इतनी समझदारी से बताता भी है, यह सुनकर हम सभी विस्मित भी रह गए और भारतीय होने के गर्व से भर भी गए।
उस सामान्य-से टैक्सीवाले की यह कोई सामान्य-सी टिप्पणी नहीं है। हम भारतीय भी इसे गहराई से समझते नहीं हैं। यह हमारे देश की अद्भुत सामाजिक संरचना है कि जहां परस्पर विरोधी विचारधाराएं भी सह-अस्तित्व में रहती हैं। कई लोग इसे ‘अनेकांतवाद’ भी कहते हैं लेकिन मुझको लगता है यह वाद से कहीं आगे की मनोभूमिका है। वाद तो सिद्धांत को दर्ज करते हैं, समाज जब उनको व्यवहार में उतारता है तब वह बहुत नया व गहरा बन जाता है।
सत्य, अहिंसा और करुणा की त्रिवेणी से सुजला-सुफला की इस भूमि पर सद्भाव की अविरल धारा बहती रही है। विदेशी आक्रांता अपने साथ अपनी धार्मिक रूढ़ियां लेकर आए ज़रूर मगर हमारे समाज ने उन्हें भी अपने में समो लिया। वे भी हमारी साझा संस्कृति के हिस्से बन गए। उनका भारतीय संस्करण कुछ अलग ही तर्ज़ से तैयार हो गया। इतिहास में कई बार इस ताने-बाने पर खतरे मंडराए, लेकिन अनेकांतवाद के अदृश्य कवच ने भारत को हमेशा सुरक्षित रखा।
इस्लाम और ईसाई धर्म के प्रवेश के साथ एक-दूसरे तरह की वैचारिक व व्यावहारिक चुनौती सामने आई। ये दोनों ही संगठित और एकेश्वरवादी धर्म थे। इनका मानना था कि केवल उनका ईश्वर और उनकी पद्धति ही सत्य है और उन्हें इस सत्य से सारी दुनिया को सहमत करवाना है। ऐसी कट्टरता से हमारा सामना पहली बार ही हुआ। लेकिन हमने देखा कि उनकी धार्मिक कट्टरता भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा के सामने तरल होती गई और वक्त के साथ-साथ उनका भी भारतीयकरण होता गया। इन धर्मों का आक्रामक कट्टरपंथ धीमा पड़ता गया। गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक नई लहर फैलती गई। इतिहास ने देखा कि भारत की मिट्टी में नफरत को मोहब्बत में बदलने का एक अनूठा रसायन सक्रिय रहता है।
बीसवीं सदी में इसके समानांतर एक बार फिर हिंदू कट्टरपंथ उभरा, जिसका एकमात्र लक्ष्य ‘हिंदू राष्ट्र’ की स्थापना था। स्वतंत्रता के समय जब त्रावणकोर को भारत से अलग संप्रभु राष्ट्र बनाने की आवाज उठी, तो आरएसएस और हिंदू महासभा ने इस मांग का समर्थन किया। हिंदुत्व की विचारधारा की ऐसी संकीर्ण व्याख्या ने हमारे भीतर नया विभेद पैदा कर दिया। यहां से जो ज़हर बना व फैला वही देश को विभाजन तक पहुंचा गया। विभाजन का विनाशकारी परिणाम और अमानवीय हिंसा इसी अतिवादी सोच की संतान थे। विखंडन वाला वही वैचारिक कुनबा आज ‘अखंड भारत’ का खोखला नारा देकर जनता को भ्रमित करना चाहता है। अखंड भारत जैसी कल्पना का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।
राजाओं ने अपने साम्राज्यों का विस्तार जहां तक किया हो, क्या उनसे कोई राष्ट्र निर्मित होता है ? फिर तो कोई हिटलर उन सबको अखंड जर्मनी घोषित कर देगा जिसे उसने युद्ध के मैदान में हराया था। यह सब इतिहास को देखने की बीमार दृष्टि है जो शक भी पैदा करती है और विग्रह भी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत यही सब लेकर अभी-अभी विदेशी मंचों पर पहुंचे थे और बुरी तरह अस्वीकृत हो कर लौटे हैं।
यह हम सबके सोचने व समझने की बात है कि भारतीय समाज के आंतरिक विभाजन को चौड़ा करने की तमाम साम्राज्यवादी कोशिशों और विषवमन के बावजूद 1947 में केवल दो हिस्सों में क्यों बंटा? मांग तो सिखों की भी थी, दक्षिण की भी थी, पूर्वोत्तर के राज्यों की भी थी। वैसी सारी प्रवृत्तियों को समझा कर, मना कर देश की राजनीतिक-भौगोलिक एकता को एकजुट करना कैसे संभव हुआ था? इसका पूरा श्रेय महात्मा गांधी और कांग्रेस के नेतृत्व को जाता है।
गांधीजी ने आजादी की लड़ाई की रचना ऐसे की कि जाति, धर्म, भाषा, लिंग और आयु की दीवारें ढहती गईं और एक हिंदुस्तानी मन उभर कर सामने आने लगा। हर हिंदुस्तानी स्वतंत्रता संग्राम का सिपाही बनने लगा। उन्होंने पूरे देश को एक साथ मिलकर अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ना और एक बहुसांस्कृतिक समाज में आपसी सद्भाव के साथ जीना सिखलाया. ऐसी ही कोशिश में उनका बलिदान भी हुआ। लेकिन जवाहरलाल, पटेल, मौलाना आज़ाद, राजेंद्र बाबू आदि के सम्मिलित नेतृत्व ने गांधी की उस दिशा से देश को भटकने नहीं दिया।
जो कभी स्वातंत्र्य संग्राम के सिपाही नहीं रहे, जिन्होंने ऐसे भारत की कल्पना में कभी साझेदारी नहीं की, जिन्होंने विभाजन और नफ़रत की राजनीति को अपना हथियार बनाया। उन सबको यह भारत कभी समझ में नहीं आया।
आज भी दुनिया में मजहबी युद्ध जारी हैं। जैसा नरसंहार पूंजीवादी अमरीका, साम्यवादी कहा जाने वाला रूस व चीन तथा इस्राइल, अरब, अफ़ग़ान आज चला रहे हैं, वह तो गांधी की उसी बात को सही साबित कर रहा है कि ‘आंख के बदले आंख’ का रास्ता सारी दुनिया को अंधा बना कर छोड़ेगा। धर्म के नाम पर राष्ट्र निर्माण की वकालत करने वाली जिन्ना और आरएसएस की ‘टू-नेशन थ्योरी’ पूरी तरह खोखली साबित हो गई है। एक ही धर्म को मानने वाले पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान टूट गए, यूरोप के कितने ही देश विभाजित हो गए फिर भी इनकी तोतारंटत बनी हुई है।
महात्मा गांधी ने एक रास्ता दिखलाया। आधुनिक विश्व की समस्याएं भी नई हैं जिन्हें आधुनिक नजरिये से हल किया जा सकता है। वह सब कुछ आधुनिक है जो मनुष्य को, देशों को निकट लाता है, उनमें परस्पर विश्वास बढ़ाता है। जैसे बिजली या फोन की खोज किसी एक कालखंड में, किसी एक वैज्ञानिक या एक देश ने की, लेकिन समय के साथ-साथ वह सारी मानव जाति की थाती बन गया ठीक वैसे ही अलग-अलग मानवीय मूल्यों पर आधारित संसार के सभी धर्म किसी एक समुदाय की बपौती नहीं, समूची मनुष्यता की साझी विरासत हैं।
इस शाश्वत सत्य को गांधीजी ने दुनिया के सामने पूरी प्रखरता से रखा था। यही वे सार्वभौमिक मूल्य हैं जिन्हें आज न सिर्फ इस हिंसक होती दुनिया को अपनाने की जरूरत है, बल्कि खुद भारत को भी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दोबारा अपनाने की सख्त जरूरत है। अब आप सोचिए कि उस टैक्सीवाले की बात से कितनी ही बातें निकल आईं ! इसे ही कहते हैं एक-दूसरे से सीखना और एक-दूसरे को अपना बनाना। (सप्रेस)