हरियाली बढ़ती दिखाई देना और जंगल का पुनर्जीवित होना एक ही बात नहीं है। दिल्ली रिज में चल रही गतिविधियों को लेकर रेस्टोरेशन विशेषज्ञ और लेखक प्रदीप कृष्ण ने ‘कॉस्मेटिक ग्रीनिंग’ की अवधारणा पर सवाल उठाए हैं। हृदयेश जोशी से बातचीत में उन्होंने कहा कि जंगल बहाली में पेड़ों की संख्या के बजाय पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत को कसौटी बनाया जाना चाहिए।
रेस्टोरेशन विशेषज्ञ और मशहूर लेखक प्रदीप कृष्ण से पत्रकार हृदयेश जोशी की ख़ास बातचीत
दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल दिल्ली रिज में चल रहे वृक्षारोपण और सौंदर्यीकरण अभियानों के तौर-तरीकों को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञ और लेखक प्रदीप कृष्ण ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने दिल्ली रिज़ में चल रहे ‘कॉस्मेटिक ग्रीनिंग’ और सरकारी दावों की पोल खोली है।
Eco N Energy Talk के लिए वरिष्ठ पर्यावरण पत्रकार हृदयेश जोशी के साथ विशेष बातचीत में प्रदीप कृष्ण ने कहा कि “पार्क बनाना जंगल लगाना नहीं है, जिसे आप नेटिव पेड़ कह रहे हैं वो दिल्ली का पेड़ नहीं है।” रिज की स्थानीय पारिस्थितिकी, मिट्टी और प्राकृतिक वनस्पतियों की प्रकृति को समझे बिना बड़े पैमाने पर पौधरोपण करना जंगल बहाली के उद्देश्य के विपरीत जा सकता है।
हृदयेश जोशी के सवालों के जवाब में प्रदीप कृष्ण ने दिल्ली रिज की भौगोलिक और पारिस्थितिक प्रकृति से लेकर पौधरोपण में इस्तेमाल की जा रही प्रजातियों, दीमक नियंत्रण के लिए रसायनों के इस्तेमाल और देश में चल रहे बड़े पैमाने के वृक्षारोपण अभियानों के आंकड़ों तक कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए।
रिज की प्रकृति को समझे बिना पौधरोपण?
प्रदीप कृष्ण के मुताबिक दिल्ली की भूमि और पारिस्थितिकी को ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में समझा जाता रहा है। दिल्ली रिज अरावली पर्वतमाला का हिस्सा है और इसकी मिट्टी अपेक्षाकृत पतली तथा पथरीली है।
हृदयेश जोशी से बातचीत में प्रदीप कृष्ण ने रिज में प्रति हेक्टेयर करीब 2,500 पौधे लगाने की योजना पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि रिज जैसे शुष्क और पथरीले क्षेत्र में इतनी सघनता से पौधरोपण करने से पहले स्थानीय पारिस्थितिकी और प्राकृतिक वनस्पति तंत्र को ध्यान में रखना जरूरी है।
उनके अनुसार, जंगल बहाली का अर्थ केवल बड़ी संख्या में पौधे लगा देना नहीं है। इसके लिए मिट्टी, पानी की उपलब्धता, स्थानीय प्रजातियों और उस क्षेत्र के प्राकृतिक वनस्पति समुदाय को समझना जरूरी है।
‘आम, जामुन और अर्जुन जैसी प्रजातियों के चुनाव पर सवाल’
बातचीत में प्रदीप कृष्ण ने रिज क्षेत्र में लगाए जा रहे पेड़ों की प्रजातियों पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि आम, जामुन और अर्जुन जैसी प्रजातियों की पानी की जरूरत रिज की प्राकृतिक परिस्थितियों से अलग हो सकती है और इनमें से कुछ प्रजातियां नदी-तटीय या अधिक नमी वाले क्षेत्रों से जुड़ी हैं।
प्रदीप कृष्ण के मुताबिक रिज की पारिस्थितिकी के अनुरूप स्थानीय प्रजातियों और प्राकृतिक पुनरुत्पादन को प्राथमिकता देना चाहिए, न कि केवल अधिक संख्या में पौधे लगाकर हरित क्षेत्र बढ़ाने पर जोर देना चाहिए।
दीमक के खिलाफ रसायनों के इस्तेमाल पर चिंता
हृदयेश जोशी के साथ बातचीत का एक अहम मुद्दा दीमक नियंत्रण के लिए रसायनों के इस्तेमाल से जुड़ा रहा। प्रदीप कृष्ण ने दावा किया कि रिज में पौधों को दीमक से बचाने के लिए ठेकेदारों द्वारा रसायनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
उनके मुताबिक, शुष्क जंगलों में दीमक केवल पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाला जीव नहीं है। वह मृत पत्तियों, लकड़ी और अन्य जैविक पदार्थों को तोड़ने तथा पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रदीप कृष्ण ने आशंका जताई कि व्यापक स्तर पर रसायनों के इस्तेमाल का असर मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों और फंगल मायसीलियम पर पड़ सकता है। उनके अनुसार जंगल का स्वास्थ्य केवल पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि मिट्टी के भीतर मौजूद पूरे जैविक तंत्र से भी तय होता है।
‘पौधे लगाने के आंकड़ों के साथ सर्वाइवल ऑडिट भी जरूरी’
बातचीत के दौरान प्रदीप कृष्ण ने देशभर में चलाए जा रहे बड़े वृक्षारोपण अभियानों और उनके आंकड़ों पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि सरकारें लाखों-करोड़ों पौधे लगाए जाने के आंकड़े जारी करती हैं, लेकिन कितने पौधे वास्तव में जीवित रहे और कितने विकसित होकर स्थायी वनस्पति का हिस्सा बने, इसका पारदर्शी और स्वतंत्र सर्वाइवल ऑडिट भी सार्वजनिक होना चाहिए।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि सड़क किनारे पौधरोपण या सामान्य लैंडस्केपिंग जैसी गतिविधियों को किस सीमा तक ‘फॉरेस्ट रिस्टोरेशन’ के आंकड़ों में शामिल किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, प्राकृतिक जंगल को बहाल करना और किसी स्थान को सजावटी पौधों से हरा-भरा करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
प्राकृतिक जंगल या ‘थीम पार्क’?
हृदयेश जोशी के साथ साक्षात्कार में प्रदीप कृष्ण ने दिल्ली रिज में किए जा रहे सौंदर्यीकरण के मॉडल पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि प्राकृतिक जंगल को उसकी मूल पारिस्थितिकी के साथ बहाल करने के बजाय कुछ परियोजनाएं उसे ‘थीम पार्क’ या म्युनिसिपल पार्क जैसा स्वरूप देने की दिशा में जाती दिखाई देती हैं।
उन्होंने सजावटी और गैर-स्थानीय पौधों के इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई। कृष्ण के मुताबिक जंगल बहाली में स्थानीय प्रजातियों तथा प्राकृतिक वनस्पति समुदाय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों और जनता से संवाद की मांग
साक्षात्कार में प्रदीप कृष्ण ने रिज जैसे संवेदनशील क्षेत्र से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता और सार्वजनिक संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया।
उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अथवा सौंदर्यीकरण की योजनाओं से पहले स्वतंत्र पर्यावरण विशेषज्ञों, वनस्पति वैज्ञानिकों, पारिस्थितिकीविदों और स्थानीय नागरिकों के साथ चर्चा होनी चाहिए।
हृदयेश जोशी के साथ बातचीत में प्रदीप कृष्ण की चिंता का केंद्रीय बिंदु यह रहा कि जंगल बहाली का उद्देश्य केवल पेड़ों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना होना चाहिए, जिसमें मिट्टी, सूक्ष्मजीव, कीट, स्थानीय वनस्पतियां और प्राकृतिक पुनरुत्पादन सभी शामिल हैं।
इस पूरे साक्षात्कार को आप इस लिंक में माध्यम से देख/सुन सकते है ; https://t.co/3KG1Gtnfdt