प्रकृति के साथ खड़ा एक जीवन : माधव गाडगिल को नमन

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पश्चिमी घाटों को बचाने की लड़ाई को वैज्ञानिक और नैतिक आधार देने वाले प्रख्यात परिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल ‘धरती पुत्र’ के नाम से पहचाने जाते थे। गाडगिल ने भारतीय विज्ञान संस्थान में पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र की स्थापना की और गाडगिल आयोग के माध्यम से विकास, पर्यावरण और समुदाय के बीच संतुलन का साहसी खाका प्रस्तुत किया। उनके कार्यों ने पर्यावरण नीति को जनपक्षीय दृष्टि दी।


स्‍मृति शेष

पश्चिमी घाटों के संरक्षण और भारत में पारिस्थितिकी चेतना को वैचारिक गहराई देने वाले प्रख्यात परिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल का पुणे में 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके जाने से देश ने न केवल एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोया है, बल्कि ऐसा चिंतक भी विदा हुआ है, जिसने विकास की दौड़ में प्रकृति और समुदाय की अनदेखी पर लगातार सवाल उठाए। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे और बुधवार देर रात पुणे के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।

माधव गाडगिल का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां अध्ययन, अनुशासन और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को विशेष महत्व दिया जाता था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भारत में ही हुई, जहां बचपन से ही उन्हें प्राकृतिक परिवेश को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनके वैज्ञानिक जीवन की बुनियाद बने। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने जीवविज्ञान और पारिस्थितिकी के क्षेत्र को चुना और गहन अध्ययन के माध्यम से इस विषय में विशेषज्ञता हासिल की। उनकी शैक्षणिक यात्रा केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने विज्ञान को समाज और जमीन से जोड़ने का संकल्प उसी दौर में ले लिया था।

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आगे चलकर वे बेंगलुरु स्थित इंडियान इंस्‍टीटयूट आफ साइंस (आईआईएससी) से जुड़े, जहां उन्होंने पारिस्थितिक विज्ञान केंद्र की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। यह केंद्र भारत में आधुनिक पारिस्थितिकी अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना और अनेक शोधकर्ताओं व छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा।

माधव गाडगिल का नाम पश्चिमी घाटों के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ा है। उन्होंने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की अध्यक्षता की, जिसे गाडगिल आयोग के नाम से जाना जाता है। इस आयोग की रिपोर्ट ने पश्चिमी घाटों को संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में विभाजित करते हुए संरक्षण और विकास के बीच संतुलन का वैज्ञानिक और सामाजिक मॉडल प्रस्तुत किया।

गाडगिल का मानना था कि स्थानीय समुदाय प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक होते हैं। इसलिए उन्होंने पर्यावरणीय निर्णयों में ग्राम सभाओं, आदिवासी समाज और स्थानीय लोगों की भागीदारी पर विशेष जोर दिया। उनकी यह सोच उस समय के प्रचलित केंद्रीकृत विकास मॉडल से अलग थी, इसी कारण उनकी रिपोर्ट पर व्यापक बहस और विरोध भी हुआ। बावजूद इसके, यह रिपोर्ट आज भी पर्यावरण नीति के संदर्भ में एक मार्गदर्शक दस्तावेज मानी जाती है।

माधव गाडगिल के योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मान्यता मिली। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2024 में उन्हें पश्चिमी घाटों के संरक्षण में उनके अतुलनीय योगदान के लिए ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ पुरस्कार से सम्मानित किया। यह संयुक्‍त राष्‍ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान है, जो केवल उन्हीं व्यक्तियों को दिया जाता है, जिनका कार्य वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा तय करता है।

इसके अतिरिक्त भी उन्हें अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कारों और अकादमिक सम्मानों से नवाजा गया। ये सम्मान केवल उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए नहीं थे, बल्कि उस नैतिक साहस के लिए भी थे, जिसके साथ उन्होंने सत्ता, बाजार और पर्यावरण के जटिल रिश्तों पर सवाल उठाए। वे पुरस्कारों को व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में देखते थे।

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एक शिक्षक के रूप में माधव गाडगिल ने पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनके विद्यार्थी उन्हें केवल प्रोफेसर नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरक के रूप में याद करते हैं। उन्होंने सरल भाषा में जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझाने की कला विकसित की। उनकी पुस्तकें और लेख आज भी पर्यावरण अध्ययन से जुड़े विद्यार्थियों और कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ हैं।

वे मानते थे कि यदि विज्ञान आम आदमी की भाषा में नहीं उतरेगा, तो उसका सामाजिक प्रभाव सीमित रह जाएगा। इसी सोच के तहत उन्होंने लोकप्रिय लेखन, सार्वजनिक व्याख्यान और नागरिक संवाद को भी उतना ही महत्व दिया जितना अकादमिक शोध को।

धरती पुत्र के रूप में पहचाने जाने वाले माधव गाडगिल का जीवन हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व कोई आदर्शवादी कल्पना नहीं, बल्कि व्यवहारिक आवश्यकता है। आज जब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने वैश्विक संकट पैदा कर दिया है, गाडगिल की सोच और भी प्रासंगिक हो जाती है।

वे भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनका संघर्ष और उनकी वैज्ञानिक ईमानदारी आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी। पश्चिमी घाटों की हरियाली, नदियों की धारा और स्थानीय समुदायों की आवाज़ में उनकी चेतना जीवित रहेगी। धरती के इस सच्चे पुत्र को विनम्र श्रद्धांजलि ! आपकी विरासत हमें प्रकृति के साथ न्यायपूर्ण और संतुलित भविष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती रहेगी।

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