अंतरराष्ट्रीय वैश्विक पर्यावरण

नेपाल प्राकृतिक आपदा : हिमालय अब जलवायु परिवर्तन का बोझ नहीं उठा सकता

नेपाल प्राकृतिक आपदा : हिमालय अब जलवायु परिवर्तन का बोझ नहीं उठा सकता
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हिमालय में बार-बार सामने आ रही प्राकृतिक आपदाएं अब महज स्थानीय घटनाएं नहीं रह गई हैं। नेपाल की हालिया त्रासदी ने एक बार फिर चेताया है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और बदलता मानसून हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी पर भारी पड़ रहे हैं। तिब्बत में बर्फ का टूटना नेपाल से लेकर भारत तक असर डाल सकता है। प्रकृति की सीमाओं को समझे बिना किया गया विकास अब गंभीर खतरा बनता जा रहा है।


नेपाल एक बार फिर एक बड़ी प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में लगातार आए भूकंपों ने वहां जान-माल को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब एक और त्रासदी विनाशकारी आकस्मिक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के रूप में सामने आई है, जिसने पूरे देश को गहरे सदमे और चिंता में डाल दिया है।

इस घटना को लेकर कई तरह की आशंकाएं सामने आ रही हैं। इनमें एक संभावना यह भी है कि तिब्बत में करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई से लगभग 2,000 वर्ग फीट आकार का एक विशाल बर्फीला हिस्सा टूटकर नीचे आ गिरा। इसका प्रभाव इतना तीव्र था कि वह किसी शक्तिशाली विस्फोट जैसा महसूस हुआ।

कठोर सच्चाई यह है कि यह घटना हिमालय में बदल रही पारिस्थितिक गतिशीलता (ecological dynamics) का परिणाम है, जिसके पीछे मुख्य रूप से वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार हैं। माना जा रहा है कि सुबह करीब 8:15 बजे आए भूकंप ने बर्फ के इस हिस्से के टूटने की प्रक्रिया को शुरू किया। लेकिन अतीत की घटनाओं को देखें तो सामान्य भूकंप आमतौर पर इतनी आसानी से बर्फ के विशाल हिस्सों को अलग नहीं कर देते। इसका सीधा कारण हिमस्खलन (avalanche) या वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियरों में पैदा हुई संरचनात्मक अस्थिरता (structural instability) भी हो सकता है।

इस आपदा ने नेपाल के एक बड़े भूभाग को तबाह कर दिया। करीब 18 छोटे-बड़े जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं। रसुवा से गुजरती बाढ़ ने नुवाकोट, भोटे कोसी और त्रिशूली नदियों में भीषण रूप ले लिया। त्रिशूली जलविद्युत संयंत्र और उसके आसपास का बुनियादी ढांचा—मंदिर और स्कूल भी शामिल हैं—बाढ़ में बह गए।

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महज 25 से 30 मिनट के भीतर पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और पूरा भू-दृश्य बदल गया। स्थानीय नागरिकों के साथ कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए 400 से अधिक तीर्थयात्री भी लापता हो गए, जिनमें 133 भारतीय शामिल हैं। चीन के 265 लोग भी लापता बताए जा रहे हैं।

करीब 22 कंक्रीट पुल और 42 किलोमीटर सड़कें पूरी तरह बह गईं। कई बस्तियां और घर तबाह हो गए। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास स्थित आव्रजन केंद्र (इमिग्रेशन सेंटर) भी देखते-देखते नष्ट हो गया।

इस आपदा से हुई तबाही का पूरा आकलन और इसके पीछे के वास्तविक तकनीकी कारण आने वाले समय में अधिक स्पष्ट होंगे। लेकिन इस घटना ने हिमालय की नाजुकता और वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पहाड़ों में बस्तियां और बुनियादी ढांचा अक्सर नदियों के किनारे विकसित होते हैं। इसलिए जब नदियां अचानक उफान पर आती हैं तो इन बस्तियों को ही सबसे पहले और सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।

हिमालय की भौगोलिक वास्तविकता यह है कि किसी एक चोटी या किसी एक स्थान पर होने वाली आपदा कभी केवल वहीं तक सीमित नहीं रहती। उसका असर नीचे की ओर बसे मानव समुदायों, उनकी आजीविका और बुनियादी ढांचे तक पहुंचता है। केदारनाथ, धारचूला, धरासू और हाल में सिक्किम में सामने आए संकट जैसी पिछली घटनाएं भी इसी तरह की तबाही का उदाहरण हैं।

हिमालय में होने वाली हलचलों को केवल अलग-अलग या स्थानीय घटनाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता। तिब्बत में बर्फ का कोई बड़ा हिस्सा टूटकर गिरता है तो उसका सीधा असर नेपाल और भारत पर पड़ सकता है। सीमाएं देशों की होती हैं, प्रकृति की नहीं।

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हिमालय से दो अरब से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलता है। इसलिए वे हिमालय में होने वाले किसी भी बड़े बदलाव के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं। यह संकट व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी खतरा है। तिब्बत हरित आवरण और पर्यावरणीय नीतियों को प्राथमिकता देने के लिए जाना जाता है। इसके बावजूद ऐसी घटना का वहां से शुरू होना यह साबित करता है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के दुष्परिणामों से कोई भी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

हिमालयी राज्यों में बुनियादी ढांचे की योजना और नेतृत्व पर अक्सर सवाल उठते हैं—और ऐसा होना उचित भी है। लेकिन ये इस पूरी समस्या के अकेले कारण नहीं हैं। मूल कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि है, जिसका सबसे पहला और सबसे तीखा असर हिमालय को झेलना पड़ रहा है।

आज पहाड़ों में रहने वाले लोग मानसून से डरने लगे हैं। उन्हें आशंका रहती है कि अचानक आने वाली आपदा उनके घर, खेत और आजीविका को तबाह कर सकती है। ग्रामीण गांव लगातार इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतते हैं।

समुद्र के बढ़ते तापमान से वायुदाब में बदलाव आता है और मानसून का स्वरूप भी बदलता है। इसके परिणामस्वरूप कहीं गंभीर सूखे की स्थिति पैदा होती है तो कहीं बादल फटने या अचानक बाढ़ आने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

नेपाल की यह त्रासदी 2013 की केदारनाथ आपदा से भी स्पष्ट समानता रखती है, जब ग्लेशियरों के पिघलने और झीलों के टूटने से आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। कैलगरी विश्वविद्यालय की एक उपग्रह-आधारित रिपोर्ट ने भी इस घटना के पीछे तिब्बत में बर्फ के एक बड़े हिस्से के टूटकर अलग होने की संभावना बताई है।

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इन घटनाओं के मूल में आखिरकार ऊर्जा का अंधाधुंध इस्तेमाल और अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन है। हिमालय में रहने वाले लोगों की वैश्विक तापमान वृद्धि में बहुत कम, बल्कि लगभग कोई जिम्मेदारी नहीं है। इसकी वास्तविक जिम्मेदारी औद्योगिक और विकसित देशों की है।

हाल के वर्षों में यूरोप भी जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना करने लगा है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र अब भी उन इलाकों में शामिल है जहां इसके प्रभाव सबसे अधिक तीव्रता के साथ दिखाई दे रहे हैं।

हिमालयी देशों को इस चुनौती का सामना अत्यंत गंभीरता और तत्परता के साथ करना होगा। केवल प्रशासनिक दर्जा बढ़ाना, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करना या भौतिक बुनियादी ढांचे का निर्माण करना पर्याप्त नहीं होगा। मानवीय गतिविधियों को पारिस्थितिकी के साथ सामंजस्य स्थापित करना होगा।

तिब्बत में हुई इस घटना ने नेपाल को प्रभावित किया और आगे भारत में कोसी नदी के बेसिन तक बाढ़ का खतरा पैदा कर दिया। यह एक बार फिर साबित करता है कि प्रकृति की दुनिया आपस में कितनी गहराई से जुड़ी हुई है।

बार-बार आने वाली आकस्मिक बाढ़ों का तत्काल कारण यह है कि मानसून की प्रणालियां और वायुमंडलीय दबाव अब प्राकृतिक सीमाओं को पार कर रहे हैं। लेकिन मानव अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए हिमालय के प्रति समाज की सोच और उसके साथ हमारा व्यवहार, दोनों में बुनियादी बदलाव लाना होगा।

हिमालय की पारिस्थितिक जीवंतता को बनाए रखना अब कोई विकल्प नहीं है। यह हमारी अनिवार्यता है।

अनिल प्रकाश जोशी प्रख्यात पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे हिमालय और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से सक्रिय हैं। वे पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित हैं तथा देहरादून स्थित हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन (HESCO) के संस्थापक हैं। उनका लेखन विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत को रेखांकित करता है।

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