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सिर्फ पेड़ लगाने से नहीं बढ़ेगी हरियाली, क्षेत्र की तासीर समझना जरूरी : प्रो श्यामसुंदर ज्वाणी

अभ्यास मंडल ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला

इंदौर, 20 मई। राजस्थान के प्रसिद्ध पर्यावरण प्रो. श्यामसुंदर ज्वाणी ने कहा है कि हमें हवा, मिट्टी और पानी की चिंता करना होगी। जब यह चिंता हम करेंगे तो पर्यावरण का संरक्षण स्वमेव हो जाएगा। केवल पेड़ लगा लेने से ग्रीन कवरेज नहीं होगा। हमें क्षेत्र की तासीर को भी समझना होगा।

वे आज यहां अभ्यास मंडल की ग्रीष्मकालीन व्याख्यान माला में जाल सभागृह में संबोधित कर रहे थे। उनका विषय था- पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक भागीदारी। उन्होंने अब तक 50 लाख वृक्ष लगाए हैं और 200 वन तैयार किए हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थान पर कोई सा भी पौधा नहीं लगाया जाता है। हमें जमीन की तासीर को समझाना पड़ेगा। हर प्रदेश का नहीं बल्कि हर जिले का मिट्टी का एक अलग स्वभाव होता है। जब हम उस स्वभाव को समझेंगे और उसके हिसाब से पौधा लगाएंगे तो वह पौधा पनपेगा।

कई बार हम देखते हैं कि हमने पौधा लगाया लेकिन वह पौधा नहीं पनपा तो उसके पीछे कारण जमीन का स्वभाव होता है। हरियाली को हम केवल इस रूप में नहीं ले सकते कि हमें पर्याप्त ऑक्सीजन मिल जाएं। हमें इसे जीवित तंत्र के रूप में समझना होगा। हमें सोशल इकोलॉजी को समझना चाहिए। क्या कारण है कि हमारे देश में हर प्रदेश का खान-पान अलग है क्योंकि हर प्रदेश में मौसम अलग तरह का होता है और वहां पर शरीर की आवश्यकता भी बदल जाती है।

उन्होंने कहा कि हम ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर को भूल गए हैं यही कारण है कि आज देश के अलग-अलग हिस्से में गर्मी के कारण हीट वेव चल रही है। हमारे देश में हम हर साल करोड़ों पौधे लगाते हैं लेकिन यह ध्यान नहीं देते हैं कि उनमें से कितने पौधे पनप कर पेड़ बन पा रहे हैं। हम क्षेत्र की डिमांड को नजरअंदाज करते हुए अपने काम को करते हैं।

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उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मध्य प्रदेश में घना जंगल होता है यहां पर एक दूसरे के पास में पेड़ लग जाते हैं और पनप जाते हैं लेकिन राजस्थान के रेगिस्तान वाले इलाके में पेड़ों को एक दूसरे से एक निश्चित दूरी बनाकर लगाना पड़ता है। इसके लिए स्थानीय जरूरत को भी समझने की आवश्यकता है। जैव विविधता पर आने वाले नकारात्मक प्रभाव को रोकना भी हमारी जिम्मेदारी है। हमें हवा मिट्टी और पानी की चिंता करना होगी। जब हम यह चिंता करने लगेंगे तो पर्यावरण का संरक्षण होने लगेगा। यह काम किसी एक व्यक्ति के करने से नहीं होगा बल्कि हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में हमें करना होगा।

अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि क्लाइमेट चेंज को हमें समझना चाहिए और उसके लिए लगातार काम करना चाहिए। आज हम लोगों की जीवन शैली बदल गई है। हमारे यहां 40% भूमि मरुस्थल के रूप में बदल गई है। अब यह भूमि उपजाऊ नहीं रही। पहले 1 किलो यूरिया डाला जाता था तो उससे 12 किलो धान तैयार होता था, आज 1 किलो यूरिया डालने पर 5 किलो धान भी तैयार नहीं होता है। अब हमारे भोजन में गुणवत्ता नहीं है। हम भोजन करते हैं और उससे पेट भर जाता है। उसके माध्यम से शरीर का पोषण नहीं होता है। हमने विकास की पश्चिमी समझ को अपना लिया है। कृषि की संस्कृति को हम भूल गए हैं और हमारी संस्कृति से विविधता खत्म हो गई है। जब एक लोकगीत मरता है तो उसके साथ में कृषि की कई विधि भी मर जाती है।

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उन्होंने कहा कि पहले राजस्थान में गर्मी के मौसम में गर्मी की लपट से अपने आपको बचाने के लिए राबड़ी पी जाती थी। इसके साथ में नींबू पानी और कैरी का पना पीया जाता था। आज नई पीढ़ी इन सब चीजों को भूल गई है और उसके कारण गर्मी से बचाव के लिए वे लोग कोल्ड ड्रिंक पीते हैं। नई पीढ़ी को इस पुरानी परंपरा से जोड़कर रखने के लिए राजस्थान में हम अब राबड़ी दिवस मनाते हैं। यह संयोग है कि आज जिस दिन में इंदौर में यह व्याख्यान देने के लिए आया हूं वह दिन राबड़ी दिवस का दिन है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि का स्वागत सेवानिवृत आईएएस अधिकारी आनंद शर्मा, शफी शेख, द्वारका मालवीय, सुनील साहू ने किया, कार्यक्रम का संचालन स्वप्निल व्यास ने किया। अतिथि परिचय वैशाली खरे ने दिया। स्मृति चिन्ह डॉ ओ पी जोशी और डॉ दिलीप वाघेला ने भेंट किया। अंत में आभार डॉॉ. शंकर लाल गर्ग ने माना।

कान्हा नदी के लिए इंदौर के 40 लाख लोग आगे क्यों नहीं आते

 अपने भाषण के दौरान ज्याणी ने कहा कि अभ्यास मंडल के सदस्य कान्ह और सरस्वती नदी के शुद्धिकरण के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो मेरा सवाल यह है कि केवल अभ्यास मंडल के 200 लोग ही यह संघर्ष क्यों करें? इंदौर शहर के 40 लाख लोग इस कार्य में सहभागी क्यों नहीं बन रहे हैं। हम सभी को प्रकृति को सही करने की और सजग रहना होगा और प्रकृति का संरक्षण करना होगा।

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