अंतरराष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी समसामयिक

‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ उर्फ ‘एआई’ : मुकाबले में इंसानी अक्ल

‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ उर्फ ‘एआई’ : मुकाबले में इंसानी अक्ल

कम्प्यूटर, इंटरनेट के बाद अब हमारे संसार में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ यानि ‘एआई’ का अवतार हुआ है। कहा जा रहा है कि इंसानी वजूद की तमाम-ओ-तमाम हरकतें ‘एआई’ की मार्फत आसानी से हल कर ली जाएंगी। यहां तक कि सोचने-विचारने की...

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कम्प्यूटर, इंटरनेट के बाद अब हमारे संसार में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ यानि ‘एआई’ का अवतार हुआ है। कहा जा रहा है कि इंसानी वजूद की तमाम-ओ-तमाम हरकतें ‘एआई’ की मार्फत आसानी से हल कर ली जाएंगी। यहां तक कि सोचने-विचारने की अनूठी इंसानी फितरतें भी ‘एआई’ के जरिए होने लगेंगी। हाल में दिल्ली में हुआ ‘एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ इसी नवाचार के व्यापार को जमाने की कोशिश था। क्या हुआ था, उस ‘समिट’ में?


पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित ‘एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ का समापन ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग के लिए उसके प्रभाव पर ऐतिहासिक ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को स्वीकार किए जाने के साथ समाप्त हुआ। करीब 91 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस घोषणापत्र से सहमति जाहिर की। घोषणापत्र जोर देता है कि ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ में निहित सिद्धान्त की तर्ज पर ‘एआई’ के लाभों को मानवता के बीच समान रूप से साझा किया जाना चाहिए। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ से प्रेरित यह घोषणा ‘एआई’ संसाधनों तक न्यायसंगत पहुंच पर बल देती है, ताकि सभी देश सार्वजनिक लाभ के लिये उसे विकसित कर सकें।

इस शिखर सम्मेलन से दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ावा मिलने और ‘एआई’ को आर्थिक विकास के एक प्रमुख चालक के रूप में स्थापित करने की उम्मीद है। आयोजकों का कहना है कि शिखर सम्मेलन से दीर्घकालिक साझेदारियों को मजबूती मिलने और देशों को साझा सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में बदलने के लिए प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं और उभरते बाजारों दोनों की भागीदारी के साथ, ‘नई दिल्ली घोषणा’ ‘एआई’ विकास पर आम सहमति बनाने और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक वैश्विक प्रयास का प्रतीक है।

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तेजी से बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में दुनिया भर में अभी सबसे ज्यादा जोर आधुनिक तकनीकों के विकास और नवाचार के प्रयोग पर दिया जा रहा है। सभी देश अपनी विकास नीतियों में अद्यतन तकनीकों को अपना रहे हैं और पारंपरिक तरीके से होने वाले बहुत सारे कामों का स्वरूप बदल रहा है। खासतौर पर ‘एआई’ के फैलते दायरे ने वैश्विक स्तर पर कामकाज के तौर-तरीकों और उसमें इंसानी भूमिका पर व्यापक असर डाला है। जानकारों का कहना है कि ‘एआई’ आज केवल तकनीक का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति और मानव जीवन के हर पहलू को प्रभावित करने वाली शक्ति बन चुकी है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, उद्योग, संचार, सुरक्षा और शासन-हर क्षेत्र में ‘एआई’ के उपयोग ने नई संभावनाएं खोली हैं, वहीं कई गहरी और जटिल चुनौतियां भी हमारे सामने खड़ी कर दी हैं।

‘एआई’ को अक्सर चौथी औद्योगिक क्रांति का केंद्र माना जाता है। मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स और स्वचालन ने उत्पादन की गति बढ़ाई है और निर्णय प्रक्रिया को तेज किया है। अस्पतालों में रोगों की पहचान, किसानों के लिए मौसम और फसल की सलाह तथा प्रशासन में सेवाओं का डिजिटलीकरण ‘एआई’ की सकारात्मक उपलब्धियां हैं, लेकिन यह तकनीकी बदलाव केवल औजारों का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं का भी पुनर्गठन कर रहा है। ‘एआई’ आधारित स्वचालन से कई पारंपरिक नौकरियां समाप्त होने की आशंका है। खासकर निम्न और मध्यम कौशल वाले काम सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, उच्च तकनीकी कौशल वाली नौकरियों की मांग बढ़ रही है। इससे सामाजिक असमानता गहराने का खतरा है। यदि पुनः कौशल (रिस्किलिंग) और शिक्षा पर गंभीर निवेश नहीं हुआ, तो तकनीक लाभ के बजाय विभाजन का कारण बन सकती है।

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‘एआई’ का आधार ‘डेटा’ है और यही सबसे बड़ा जोखिम भी है। नागरिकों के व्यक्तिगत ‘डेटा’ का अंधाधुंध संग्रह, उसका व्यावसायिक उपयोग और राज्य द्वारा निगरानी, निजता के अधिकार को कमजोर कर रहे हैं। ‘फेस रिकग्नीशन’ जैसी तकनीकें सुरक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के लिए खतरा बन सकती हैं। सवाल यह है कि तकनीक का नियंत्रण किसके हाथ में होगा—जनता के या सत्ता और कॉरपोरेट के? ‘एआई’ ‘तटस्थ’ नहीं होता, वह उसी ‘डेटा’ और सोच को दोहराता है जिस पर उसे प्रशिक्षित किया गया है। यदि ‘डेटा’ में जाति, लिंग, वर्ग या नस्ल का पक्षपात है, तो ‘एआई’ के फैसले भी भेदभावपूर्ण होंगे। न्याय व्यवस्था, भर्ती प्रक्रियाओं और ऋण वितरण जैसे क्षेत्रों में इसका असर गंभीर हो सकता है। इसलिए ‘एआई’ की नैतिकता और जवाबदेही अत्यंत महत्वपूर्ण है।

‘एआई’ तकनीक पर फिलहाल कुछ गिने-चुने देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। इससे एक नया डिजिटल उपनिवेशवाद उभरने का खतरा है, जहां विकासशील देश केवल उपभोक्ता बनकर रह जाएंगे। भारत जैसे देशों के लिए यह जरूरी है कि वे ‘एआई’ को केवल बाजार नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित के औजार के रूप में विकसित करें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को न तो अंधी प्रशंसा की जरूरत है और न ही भयभीत होकर खारिज करने की। आवश्यकता है, लोकतांत्रिक नियंत्रण, मजबूत कानूनी ढांचा, नैतिक मानक और जनहित केंद्रित नीति की। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के लिए ‘एआई’ का उपयोग तभी सार्थक होगा, जब मानव गरिमा, समानता और अधिकारों को प्राथमिकता दी जाए। अंततः सवाल तकनीक का नहीं, हमारे सामाजिक दृष्टिकोण का है।

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‘एआई’ भविष्य तय करेगा या भविष्य में ‘एआई’ को कैसे इस्तेमाल किया जाए, यह फैसला हमें ही करना होगा। भारत में ‘एआई’ की संभावनाओं का उपयोग करने के लिये सुदृढ़ कौशल-विकास, पुनः कौशल विकास तथा ‘एआई’ साक्षरता संबंधी पहल आवश्यक हैं। प्रतिस्पर्द्धी ‘एआई’ विकास के लिये आवश्यक उन्नत कंप्यूटिंग अवसंरचना, सेमीकंडक्टर विनिर्माण और हाइपरस्केल ‘डेटा’ केंद्रों की भारत में कमी है। इधर, बड़ी कंपनियां खर्च घटाने के लिए ‘एआई’ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं और नौकरियां कम कर रही हैं।

इसी बीच, ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (आईएमएफ) की चीफ क्रिस्टलीना जॉर्जीवा ने नौकरियों पर ‘एआई’ के बढ़ते खतरे को लेकर एक बड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि दुनियाभर में करीब 40 प्रतिशत एंट्री-लेवल नौकरियों पर ‘एआई’ का खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह आंकड़ा बढ़कर 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। हालांकि भारत के लिए यह 26 फीसदी हो सकता है। ‘एआई’ भविष्य में मानव सभ्यता के लिए खतरा बनने की संभावना एक वैश्विक बहस का विषय है। कई विशेषज्ञ, शोधकर्ता और तकनीकी दिग्गज इस बात पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं कि अनियंत्रित ‘एआई’ विकास मानवता के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ‘एआई’ का विकास और उसे लागू करने की गति, उसके सुरक्षा मानकों से तेज रही, तो यह मानवता के लिए अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। लेखक और पत्रकार प्रियदर्शन कहते हैं कि इंटरनेट ने हमारी स्मृति छीनी थी, ‘एआई’ कल्पनाशीलता न छीन ले। इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए भविष्य की योजना बनाई जाने की आवश्यकता है। (सप्रेस)

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