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अरावली बचाने के लिए पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह की सुप्रीम कोर्ट से गुहार, स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह

नई दिल्ली 27 दिसंबर।  देश की प्राचीन और जीवनदायिनी अरावली पर्वतमाला पर गहराते संकट को लेकर प्रसिद्ध पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने न्यायालय से अरावली के संरक्षण के लिए अविलंब स्वतः संज्ञान लेते हुए प्रभावी न्यायिक कार्रवाई सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।

अपने पत्र में राजेंद्र सिंह ने लिखा है कि उनका पूरा जीवन प्रकृति तथा जल-जमीन के संरक्षण में समर्पित रहा है और यह संघर्ष जीवनपर्यंत चलता रहेगा। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले से वे आहत हैं, जिसके तहत अरावली को परिभाषित और खंडित किया गया है। उनका मानना है कि ऐसा फैसला हमारी प्राचीन प्राकृतिक धरोहर को नष्ट कर सकता है और मानव जीवन के लिए दीर्घकाल में घातक सिद्ध होगा।

पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि अरावली कोई साधारण पहाड़ नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक संसाधन है। हवा, मानसून, भूजल भंडार, जल संग्रहण, जंगल, जंगली जीव, जलधाराएं और समृद्ध जैव-विविधता मिलकर अरावली को जीवनदायी बनाती हैं। यही समग्रता इसकी पहचान है और इसे किसी भी तरह से परिभाषित या खंडित करना अनुचित है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी प्राकृतिक संसाधन को इस प्रकार सीमित करना न्यायसंगत है।

राजेंद्र सिंह ने पत्र में यह भी रेखांकित किया है कि हमारा कर्तव्य है कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और संवर्धन इस तरह किया जाए, जिससे उनकी गुणवत्ता बनी रहे और किसी भी प्रकार का नुकसान न हो। उन्होंने पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन और इंटरजेनरेशनल इक्विटी जैसे सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये सिद्धांत स्पष्ट करते हैं कि प्राकृतिक संसाधन समाज की साझा धरोहर हैं और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी लिखा कि भारतीय संविधान और संवैधानिक दायित्व भी इसी भावना को पुष्ट करते हैं।

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पत्र में अरावली के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर देते हुए उन्होंने कहा है कि अरावली को समझने का आधार केवल भौगोलिक या आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक होना चाहिए। अरावली की पारंपरिक पहचान भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रकृति-बोध से जुड़ी है, जिसे केवल आर्थिक उद्देश्यों के आधार पर नहीं आंका जा सकता।

उन्होंने लिखा है कि अरावली की भौगोलिक महत्ता सभी को ज्ञात है और स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार इसे स्वीकार किया है। अरावली समुद्र, मरुस्थल और हरित क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायक रही है। वर्तमान समय में, जब जलवायु परिवर्तन की समस्या गहराती जा रही है, हवा में विषाक्तता बढ़ रही है और मौसम असंतुलित हो रहा है, तब अरावली को किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचाना गंभीर परिणाम ला सकता है।

राजेंद्र सिंह ने पत्र में साफ कहा है कि अब आवश्यकता है अरावली को सुरक्षित रखने और संरक्षित बनाए रखने की, ताकि प्राकृतिक आपदाओं से बचाव हो सके। उन्होंने लिखा है कि किसी भी प्रकार का खनन या ऐसा कार्य, जिससे अरावली को नुकसान पहुंचे, अस्वीकार्य होना चाहिए।

पत्र में वर्ष 1994 का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया है कि तब न्यायमूर्ति के. वेंकटचलैया की खंडपीठ के समक्ष दायर याचिका के आधार पर लगभग 478 खनन लीज निरस्त की गई थीं और अरावली में खनन पर रोक लगी थी। उनका कहना है कि आज उसी तरह की न्यायिक चेतना और हस्तक्षेप की फिर से आवश्यकता है।

पत्र के अंत में राजेंद्र सिंह ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश से भयंकर विपत्ति के क्षण में प्रार्थना की है कि आप अपने न्याय के प्रति दायित्व को समझते हुए इस गंभीर स्थिति में स्वतः संज्ञान लें और अरावली को बचाने के लिए शीघ्र न्यायिक कार्रवाई सुनिश्चित करें। उन्होंने लिखा है कि समस्त जनमानस और आने वाली पीढ़ियां इस दिशा में न्यायालय की भूमिका से अनुग्रहित रहेगी।

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