Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

बारूद के एक ढ़ेर पर बैठी है, ये दुनिया

रमाकांत नाथ

दुनिया के लगभग सभी प्रमुख धर्मों में प्रलय की अवधारणा मौजूद है, लेकिन सचराचर जगत के शून्य हो जाने की यह प्रक्रिया कैसे होती है, इस पर कोई विस्तृत आख्यान दिखाई नहीं देता। अलबत्ता, आज की दुनिया और उसके अलमबरदारों को देखें तो इसे आसानी से समझा जा सकता है कि कैसे दुनिया के देशों की सत्ताओं पर काबिज राजनीतिक मूढ खुद को नेस्तनाबूद करने की हुलफुलाहट में शिद्दत से लगे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच ‘अलास्का शिखर सम्मेलन’  हो गया है। कई लोग कहने लगे हैं कि इस बैठक का नतीजा कुछ भी नहीं निकला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शब्दों से यह स्पष्ट हो गया है कि वे ‘शिखर सम्मेलन’ में किसी नतीजे की उम्मीद लेकर नहीं आए थे। तो यह ‘शिखर सम्मेलन’ क्यों आयोजित किया गया, जिससे कोई नतीजा नहीं निकल सका या रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने का कोई समाधान नहीं निकल सका?

पूरी दुनिया ‘अलास्का शिखर सम्मेलन’ के नतीजों का इंतज़ार कर रही थी और उम्मीद कर रही थी कि  3 साल से ज़्यादा समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध को रोका जा सकेगा। साथ ही, उन्हें उम्मीद थी कि दुनिया को एक संभावित महायुद्ध, परमाणु युद्ध से बचाया जा सकेगा। हालांकि अलास्का में दुनिया की उम्मीदों के मुताबिक नतीजे नहीं मिले, लेकिन यह कहा जा सकता है कि इस वार्ता ने रूस और यूक्रेन के बीच अगले  ‘शिखर सम्मेलन’ और शांति वार्ता का मार्ग प्रशस्त किया है और रूस, यूक्रेन के बीच शांति संधि पर सहमत होने के लिए अनुकूल माहौल बनाया है।

अगर हम इसे दूसरे नजरिए से देखें, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि अलास्का वार्ता विश्व में शांति स्थापित करने, रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने, संभावित विश्वयुद्ध को रोकने, संभावित परमाणु युद्ध के प्रभावों से दुनिया को बचाने जैसे मुद्दों पर नहीं थी। दुनिया की दो महाशक्तियां, अमेरिका और रूस, लंबे समय के बाद आमने-सामने आईं और एक-दूसरे का अध्ययन किया। अप्रत्यक्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि अपने-अपने साम्राज्यों की सुरक्षा और विस्तार तथा दोनों विश्व नेताओं की तानाशाही और विश्व विजेता बनने की चाहत उन्हें अलास्का खींच लाई थी।

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‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ (मागा) के नारे के साथ दूसरी बार सत्ता में आए ट्रंप को इस बात का अहसास नहीं था कि जिस तरह फीनिक्स पक्षी अपनी राख से उठ खड़ा होता है, उसी तरह पुतिन रूस को फिर से दुनिया की एक महान शक्ति बनाना चाहते हैं और यूक्रेन समेत उसके सभी विभाजित 14 क्षेत्रों को एकजुट करना चाहते हैं। अलास्का वार्ता के बाद स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका के प्रभाव, उकसावे, प्रतिक्रिया और व्यापार शुल्कों की धमकियों के तहत दुनिया में शांति स्थापित करना संभव नहीं होगा। वैसे भी ट्रम्प अपनी ‘नोबेल पुरस्कार’ की जिद के कारण पुतिन की बातों से सहमत होने के लिए मजबूर हो गए हैं।

दुनिया के दो प्रमुख नेताओं का एक साथ आना और विश्व शांति के लिए एक मसौदा तैयार करना महत्वपूर्ण घटना थी। तीन घंटे की बैठक के दौरान, रूसी राष्ट्रपति पुतिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से ज़्यादा प्रभावशाली दिखाई दिए। पुतिन ‘शिखर सम्मेलन’ से पहले रखी गई अपनी शर्तों पर अडिग रहे और राष्ट्रपति ट्रम्प पुतिन को प्रभावित नहीं कर पाए। बल्कि, ट्रंप को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि रूस का अपनी सीमा सुरक्षा को लेकर चिंतित या सक्रिय होना गलत नहीं है। संक्षेप में, ट्रंप ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदीमीर ज़ेलेंस्की को यह संदेश दे दिया है कि रूस एक महाशक्ति है। इसलिए उससे बहस करने की बजाय, उसकी बातों में आना या उसकी इच्छा के अनुसार काम करना बेहतर होगा। ट्रंप-पुतिन वार्ता के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति और रूसी राष्ट्रपति अगले महीने शांति वार्ता के लिए मास्को में फिर मिलेंगे। इस वार्ता में यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की के शामिल होने की भी संभावना है, लेकिन जब ज़ेलेंस्की पुतिन की शर्तें मानने को तैयार नहीं हैं, तो यह उम्मीद कम ही है कि ज़ेलेंस्की ‘मास्को शिखर सम्मेलन’ में रूस-यूक्रेन युद्ध का कोई समाधान निकालेंगे।

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विश्व में युद्ध और आतंक के भय को बढ़ाने में यदि किसी का सबसे अधिक योगदान रहा है, तो वह अमेरिका ही है। यह आश्चर्यजनक है कि अमेरिका विश्व में शांति स्थापित करने के लिए आगे आया है। वियतनाम से लेकर, मध्य पूर्व में ईरान और इराक के बीच युद्ध, सोवियत संघ के प्रभाव को समाप्त करने और अफगानिस्तान में लोकतंत्र स्थापना के नाम पर नरसंहार, इराक के खनिज संसाधनों पर कब्जा करने के लिए सद्दाम हुसैन की हत्या, तानाशाही उन्मूलन की आड़ में अपनी तानाशाही महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति और हथियारों के व्यापार को बढ़ाने के लिए देशों के बीच संघर्ष, गृहयुद्ध आदि भड़काने में अमेरिका के योगदान को कोई नकार नहीं सकता। अमेरिका द्वारा भड़काई गई कई हिंसक घटनाओं, जैसे – गाजा, फिलिस्तीन में इजरायल द्वारा नरसंहार, ईरान में युद्ध, सीरिया में गृहयुद्ध आदि के बरक्स शांति का अग्रदूत बनना विश्व के लोगों के लिए अमेरिका का एक धोखा मात्र है।

इसी प्रकार, सोवियत संघ और बाद में रूस द्वारा विश्व मंच पर अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों ने भी अनेक युद्धों और गृहयुद्धों का सामना कराया है। दो वैश्विक शक्तियों, अमेरिका और रूस के बीच तीसरी शक्ति के रूप में चीन के उदय और एशिया सहित संपूर्ण विश्व के व्यापार पर एकाधिकार की चाहत ने आर्थिक असंतुलन को जन्म दिया है। अमेरिका बनाम रूस-चीन, अमेरिका-चीन बनाम रूस, अमेरिका-रूस बनाम चीन का समीकरण बन जाएगा, यह कहना संभव नहीं है। यह असंभव नहीं है कि इन तीनों शक्तियों के संघर्ष के बीच विश्व के राष्ट्र दो या तीन गुटों में बंट जाएँ। भारत एक समय अपनी ‘गुटनिरपेक्ष नीति’ के माध्यम से ‘तीसरी शक्ति’ के रूप में उभरा था। आज, जब गुटनिरपेक्ष सोच समाप्त हो चुकी है, तो यह विश्व शांति स्थापित करने और महाशक्तियों के प्रभाव से बचने का एक विकल्प हो सकता है। भारत को इसी सोच के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है, लेकिन भारत की वर्तमान विदेश नीति और विश्व के साथ संबंधों ने उसे उसकी महान सोच से दूर कर दिया है।

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फरवरी 2022 में शुरु हुए रूस-यूक्रेन युद्ध में अब तक यूक्रेन के लगभग 50,000 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि रूस में मरने वालों की संख्या 15,000 से अधिक है। अब तक, यूक्रेन से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और कई घायल हुए हैं। रूसी सेना ने यूक्रेन के लगभग 20 प्रतिशत भू-भाग पर नियंत्रण कर लिया है, जबकि रूस यूक्रेन से औद्योगिक रूप से समृद्ध डोनेट्स्क क्षेत्र को छीनने की कोशिश कर रहा है। अगर इस युद्ध को नहीं रोका गया, तो यह विश्वयुद्ध में बदल सकता है और पूरी मानव सभ्यता के लिए एक भयानक आपदा बन सकता है। जिस तरह जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहर परमाणु बम विस्फोट में लोगों से खाली हो गए थे, उसी तरह यह कहना संभव है कि दुनिया के परमाणु-अस्त्र संपन्न देश अपनी शक्ति से पृथ्वी को बार-बार नष्ट कर सकते हैं। ऐसी तबाही से पहले, दुनिया को इन शक्तियों के हाथों से बचाना होगा। यह केवल विश्व नेताओं के बीच शांति वार्ता से संभव नहीं होगा। जब विश्व में शांति बनाए रखने और राष्ट्रों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए गठित ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ निष्क्रिय हो गया है, तो विश्व के लोगों को विश्व को बचाने के लिए आगे आना चाहिए। (सप्रेस)

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