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मूलवासी बचाओ मंच पर पाबंदी के विरोध में सौ नामचीन विधिक पेशेवरों की राष्ट्रपति, राज्यपाल और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से अपील

मूलवासी बचाओ मंच पर लगा प्रतिबंध हटे, बंदी सदस्यों की रिहाई हो

नई दिल्ली, 23 जून। देशभर के सौ से अधिक वरिष्ठ वकीलों, कानून शोधकर्ताओं और विधि विद्यार्थियों के एक मंच “नेशनल एलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स (NAJAR)” ने राष्ट्रपति, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मूलवासी बचाओ मंच (MBM) को “गैर-कानूनी संगठन” घोषित किए जाने के निर्णय को न केवल मनमाना और असंवैधानिक बताया है, बल्कि इसे तुरंत रद्द करने की मांग भी की है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने 30 अक्टूबर 2024 को अधिसूचना क्रमांक F-4-101/Home-c/2024 के तहत MBM को छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 (CSPSA) के अंतर्गत प्रतिबंधित घोषित किया था। इस फैसले का विरोध करते हुए NAJAR ने कहा है कि यह कदम संविधान में प्रदत्त संगठन निर्माण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण एकत्रीकरण के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। वकीलों का कहना है कि मंच को गैर-कानूनी करार देना न केवल कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन है, बल्कि यह आदिवासी युवाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी को अपराध के रूप में प्रस्तुत करने की खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत है।

पत्र में MBM के उन सभी सदस्यों की बिना शर्त रिहाई की मांग की गई है जिन्हें झूठे या राजनीतिक रूप से प्रेरित मामलों में गिरफ्तार किया गया है—जिनमें UAPA, CSPSA, आईपीसी, शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक अधिनियम जैसी कठोर धाराएं लगाई गई हैं। साथ ही, यह भी मांग की गई है कि सरकार इस मंच से पहले जुड़े रहे व्यक्तियों के खिलाफ जारी गिरफ्तारी, निगरानी और उत्पीड़न को तत्काल रोके, और यह सुनिश्चित करे कि केवल विरोध दर्ज करने या संगठन से जुड़ाव मात्र के आधार पर किसी को भी अपराधी न ठहराया जाए।

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National Alliance for Justice, Accountability and Rights (NAJAR) ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा है कि छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 को पूरी तरह से निरस्त किया जाना चाहिए, क्योंकि यह कानून राज्य सरकार को बिना पर्याप्त कानूनी आधार के संगठनों को प्रतिबंधित करने की शक्ति देता है, जो विधिकता और अनुपातिकता जैसे सिद्धांतों के विपरीत है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों द्वारा किए जा रहे शांतिपूर्ण आंदोलनों को दबाना लोकतंत्र की भावना के विपरीत है, और इस प्रकार के आंदोलनों को खतरा नहीं बल्कि लोकतंत्र की ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए।

NAJAR ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेदों के अनुसार राष्ट्रपति और राज्यपाल की जिम्मेदारी है कि वे अनुसूचित क्षेत्रों में शांति और सुशासन सुनिश्चित करें, और इसलिए इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है।

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में देश के अनेक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ शामिल हैं, जिनमें बॉम्बे हाईकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह, सुप्रीम कोर्ट एवं दिल्ली हाईकोर्ट की अधिवक्ता इंदिरा उन्निनायर, मद्रास हाईकोर्ट के अधिवक्ता एडगर काइज़र, तेलंगाना हाईकोर्ट की अफसर जहां, राजस्थान हाईकोर्ट के दिनेश सी. माली, ओडिशा हाईकोर्ट के आफराज सुहैल, दिल्ली , अधिवक्ता मनोहर शरद तोमर (भोपाल), अधिवक्ता ऋचा रस्तोगी (लखनऊ हाईकोर्ट), एनसीआर की अधिवक्ता व शोधकर्ता डॉ. शालू निगम, अधिवक्ता कंवलप्रीत कौर, अधिवक्ता नमन जैन, अधिवक्ता स्वस्तिका चौधरी, अधिवक्ता संभव कौशल (नई दिल्ली) और मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, अहमदाबाद, ग्वालियर, कोलकाता, त्रिवेंद्रम, जैसे शहरों के अधिवक्ता व शोधकर्ता शामिल हैं।

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