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जंगल बढ़ेगा तो देश भी बढ़ेगा – तुलसी गौड़ा

पिछले यानी 16 दिसम्बर देश की दो हस्तियां हमसे अलविदा हो गयी एक तो प्रसिद्ध तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन तथा दूसरों जंगलों का विश्वकोष कहीं जाने वाली तुलसी गौड़ा। तुलसी गौड़ा का नाम ही हिन्दुओं के पवित्र एवं पूजनीय पौधे तुलसी से जुड़ा है। कर्नाटक के होनाली में एक अत्यंत गरीब आदिवासी परिवार में उनका जन्म वर्ष 1937 या 38 बताया गया है। दो वर्ष की आयु में ही पिताजी गुजर गए। परिवार की गरीबी के कारण कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की बल्कि आजीविक चलाने हेतु मां के साथ दिहाड़ी मजदूरी की। 10-12 वर्ष की उम्र में मां के साथ जब जंगल में लकड़ी एकत्र करने जाती थी तो मां से पेड़ पौधों के बारे में कई सवाल पूछकर उनकी जानकारी लेती थी। इस प्रकार पेड़ पौधों के प्रति लगाव बढ़ता गया जो उम्रभर बना रहा। बगैर किसी प्रकार की शिक्षा के तुलसी न केवल पेड़ पौधों की सही पहचान करती अपितु उनके औषधीय गुणों को भी बताती थी।

अपनी किशोर अवस्था में ही घर के पीछे पड़ी विरान जमीन को अपनी मेहनत से विशेष प्रकार के पेड़ पौधों के जंगल में बदल दिया। सामान्यतः शादी के बाद महिलाए अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त हो जाती है परंतु तुलसी में कम उम्र में शादी के बाद भी पेड़ पौधों से अपना लगाव बनाये रखा। कोई संतान नहीं होने पर तुलसी अपने रोपित पौधों की देखभाल एक मां के समान कर उन्हें बड़ा करती थी। पेड़ पौधों के प्रति लगाव देखकर राज्य के वन विभाग ने उन्हें पहले दिहाडी मजदूरी पर रखा एवं बाद में स्थायी नौकरी दी। वन विभाग के एक अधिकारी ए.एन.मलप्पा रेडी 1983 में उनसे वनों के विस्तार एवं संरक्षण के संदर्भ में सलाह लेने गये थे। उनके पारम्परिक एवं अनुभवी ज्ञान का उपयोग वनों के विस्तार आग से बचाव एवं वन्य जीवों के संरक्षण में सफलता पूर्वक किया गया।

70 वर्ष की आयु में वन विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद भी पेड़-पौधों को रोपने एवं देखभाल कर बड़ा करने का कार्य जारी रखा। आजीवन पेड़ पौधों से जुड़े रहने के कारण उन्हें इतनी गहराई से जानकारी होती थी कि वनस्पति शास्त्र के शिक्षक व विद्यार्थी बागवानी से जुड़े लोग एवं किसान भी समय समय पर उनसे पूछने आते थे। पेड़ पौधों को विस्तृत जानकारी होने से उन्हें जंगलों का विश्व कोष (फारेस्ट एनसायक्लोविडिया) कहा जाने लगा था। जनजातीयां के लोग उन्हें पेड़ों की देवी भी कहते थे। अपनी भाषा में वे लोगों को समझाती थी कि इंसान ने जंगलों का विनाशकर पेड़ों व जानवरों के स्थान पर कब्जा कर लिया है। इंसान चाहे तो पेड़ों को कटे बिना भी समृद्ध हो सकता है। अनपढ़ महिला की इस सीख पर हमें ध्यान देना चाहिये कि हमें किस प्रकार का विकास चाहिये? आदिवासी बच्चों को भी वे अपने भाषा में कहती थी कि हमें जंगलों की जरूरत है, इनके बिना सुखा होगा, फसले नहीं होगी, सूरज ज्यादा गर्मी देगा। जंगल बढ़ेगा तो देश भी बढ़ेगा।

तुलसी गौड़ा द्वारा हरियाली बाबद् किय गये असंख्य कार्यो पर उन्हें इंदिरा प्रिय दर्शनी वृक्ष मित्र (1986) तथा राज्योत्सव (1999) के साथ श्रीमती कविता मेमोरीयल पुरस्कारों से नवाजा गया। वर्ष 1920 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान लेने वह राष्ट्रपति भवन नंगे पैर अपनी पारम्परिक वैश भूषा में गयी। उनकी इस सादगी को काफी सराहा गया। पुरस्कर प्राप्ती के बाद किसी संवाददाता से अपनी भाषा में जो कहा था उस भावार्थ पर था कि मुझे खुशी है कि मैंने पुरस्कार जीता, कई पुरस्कार इसके पहले भी जीते है, परंतु इन सभी पुरस्कारों के बावजूद पेड़ पौधे मुझे सबसे ज्यादा खुशी देते है। (सप्रेस)

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