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राजस्थान : गायब होते गोचर की लड़ाई

अमरपाल सिंह वर्मा

राजस्थान हमारे देश में पशुपालन के लिए जाना जाता है, लेकिन आजकल इसी पशुपालन के लिए सबसे जरूरी चारागाहों को लेकर भारी बवाल मचा है। एक तरफ, जमीन की लगातार बढ़ती ‘भूख’ है तो दूसरी तरफ, दुधारू, खेतिहर पशुओं के लिए चारा। इन दोनों जरूरतों से जुड़े हितग्राही अपने-अपने हितों को लेकर आंदोलनरत हैं। क्या हो रहा है, इन आंदोलनों का नतीजा? इसी पर प्रकाश डालता अमरपाल सिंह वर्मा का लेख।

राजस्थान में गोचर भूमि को बचाने के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है। लंबे समय से लगातार हो रहे अतिक्रमणों के कारण गोचर भूमि सिमटती जा रही है। एक ओर जहां लालची लोगों में गायों के लिए सुरक्षित रखी गई इस जमीन को कब्जाने की होड़ लगी है, वहीं दूसरी ओर गायों और पर्यावरण के प्रति प्रेम रखने वाले लोग इसे मुक्त करवाने की कवायद में जुटे हैं। इसके लिए अदालतों के दरवाजे खटखटाए जा रहे हैं। शासन-प्रशासन को ज्ञापन भेजे जा रहे हैं। गांधीवादी तरीके से धरने और प्रदर्शनों का सहारा लिया जा रहा है।

हाल में बीकानेर में हुए संयुक्त सम्मेलन में प्रदेश के 25 जिलों के गोचर भूमि के संरक्षण के लिए संघर्ष करने वाले प्रतिनिधियों ने गोचर को गायों के नाम करवाने के लिए बड़े आंदोलन का शंखनाद कर दिया है। सम्मेलन में गोचर भूमि को गायों के नाम दर्ज करवाने, गोचर का पुन: सीमांकन करने, ‘राजस्थान काश्तकारी अधिनियम’ में आवश्यक संशोधन करने जैसी मांगों को लेकर व्यापक आंदोलन छेडऩे का संकल्प लिया गया है। जाहिर है, गोचर भूमि के संबंध में सरकार के रुख से गो-प्रेमी खुश नहीं हैं और उन्हें आंदोलन ही एक मात्र रास्ता दिखाई दे रहा है।

देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में गोचर को बचाने का बड़ा मुद्दा है। पिछले साल गायों के प्रति आदर भाव रखने वाले लोगों ने लंबे अरसे तक आंदोलन करके सरकार को उस फैसले को ठंडे बस्ते में डालने पर मजबूर किया था, जिसके जरिए वह गोचर भूमि पर हुए अतिक्रमणों का नियमन करना चाहती थी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में दिसम्बर 2021 को हुई केबिनेट बैठक में चारागाह भूमि पर कम-से-कम तीस साल से मकान बनाकर रह रहे लोगों को पट्टे देने की नीति के ड्राफ्ट को मंजूरी दी गई। इसके बाद सरकार ने इस संबंध में नीति भी जारी कर दी। इस नीति में कहा गया कि चारागाह भूमि का परिवर्तन व्यापक जनहित और राजकीय भूमि की अनुपलब्धता होने पर किया जाएगा। इस नीति से चारागाह भूमि पर बसे निर्धन परिवारों को पट्टा मिल सकेगा।

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इस फैसले से गो-प्रेमियों में आक्रोश फैलना लाजिमी था, क्योंकि समय-समय पर सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट ने चारागाह भूमि से अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए हैं, जबकि इसके विपरीत सरकार ने अतिक्रमियों को पट्टे देने का फैसला कर लिया था। गो-प्रेमी इस आशंका से चिंतित हो उठे थे कि सरकार के फैसले से अतिक्रमियों को प्रोत्साहन मिलेगा और चारागाह भूमि पर अतिक्रमण बेतहाशा बढ़़ जाएंगे। इससे गोचर भूमि का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

प्रश्न यह उठता है कि गो-प्रेमियों को हाल में फिर से बड़ा आंदोलन करने का निर्णय क्यों लेना पड़ा? गो-प्रेमी इसका जवाब यह कहकर देते हैं कि लिखित समझौते के क्रियान्वयन के लिए जरूरी कदम आज तक सरकार ने नहीं उठाए। वार्ता के दौरान गोचर व चारागाह की जमीन पर जल-संग्रहण संरचनाओं के अतिरिक्त अन्य कोई निर्माण कार्य न करने, सरकार द्वारा जारी पॉलिसी का परीक्षण गाय के हित में करके ही उचित निर्णय किए जाने और राजस्व अधिनियम में संशोधन की मांग को अधिकारियों ने स्वीकार किया था।

लिखित समझौते में बीकानेर संभाग के संभागीय आयुक्त ने तब यह आश्वासन दिया था कि ‘गोचर, ओरण, चारागाह के संरक्षण एवं विकास के समस्त उपलब्ध उपायों का क्रियान्वयन प्रभावी तरीके से किया जाएगा। इनमें हो रहे अतिक्रमण को यथाशीघ्र हटाकर ‘मनरेगा’ के माध्यम से विकास व संरक्षण किया जाएगा। अगर कोई राजकीय भूमि चारागाह गोचर व ओरण के रूप में उपयोग की जा रही है और राजकीय रिकॉर्ड में उसका अंकन नहीं है तो सक्षम अधिकारी द्वारा मौका निरीक्षण कर उसका राजस्व अभिलेख में अंकन करने की प्रभावी कार्यवाही की जाएगी। गोचर, ओरण, चारागाह के संरक्षण, सुरक्षा एवं विकास के लिए तहसील एवं पंचायत स्तर पर कार्ययोजना बनाकर मैकेनिज्म को सक्रिय किया जाएगा।’

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हकीकत में यह समझौता कागजी बनकर रह गया। गो-प्रेमियों ने एक साल तक इंतजार किया कि सरकार कुछ करेगी, लेकिन अब उनके सब्र का बांध टूट रहा है। बीकानेर में आयोजित सम्मेलन में प्रदेश के 33 में से 25  जिलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। उन्होंने एक मत से ‘गोचर-ओरण संरक्षक संघ’ का गठन करके बुजुर्ग नेता देवीसिंह भाटी को इसका प्रदेश संयोजक बनाया है। संघ में सभी सातों संभागों से एक-एक सदस्य लेकर सात सह-संयोजक और सभी 33 जिलों से 33 प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं। आगामी बैठक में गोचर को बचाने के लिए संयुक्त एजेंडा तय होगा और व्यापक आंदोलन की रूपरेखा घोषित कर दी जाएगी।

राजस्थान में 88,56,101 हेक्टेयर भूमि है, जो कुल उपलब्ध भूमि का 41.8 प्रतिशत है। इसमें से 9,11,233  हेक्टेयर स्थायी गोचर भूमि, 70,50,577 हेक्टेयर ऊसर भूमि (लवणीय) और 8,93,691 हेक्टेयर सीमांत भूमि है। प्रदेश के गांवों में गोचर भूमि सामुदायिक उपयोग के लिए है और पंचायतों के अधीन आती है। लिहाजा उस पर किसी व्यक्ति विशेष का आधिपत्य नहीं हो सकता। घास के मैदानों से अटी पड़ी यह जमीन पशुओं का पेट भरने के लिए है, लेकिन दुखद है कि इस जमीन पर जगह-जगह अतिक्रमण कर लिए गए हैं। लोगों ने न केवल इस पर बस्तियां बसा ली हैं, बल्कि खेती भी कर रहे हैं।

अत्यधिक अतिक्रमणों के बावजूद राज्य में लाखों हेक्टेयर गोचर भूमि अभी भी अपने मूल स्वरूप में पड़ी हुई है जिसे बचाने के प्रयास हो रहे हैं। जब भी कहीं कोई व्यक्ति गोचर भूमि पर अतिक्रमण करता है तो समुदाय के लोग प्रशासन के समक्ष गुहार लगाकर अतिक्रमण हटाने की मांग करते हैं। यदि प्रशासनिक स्तर पर उनकी सुनवाई नहीं होती तो अदालत की शरण ली जाती है। समय-समय पर सुप्रीमकोर्ट ने इस संबंध में निर्णय देकर यह प्रतिपादित किया है कि चरागाह भूमि का उपयोग केवल उन्हीं उदद्श्यों के लिए किया जा सकता है जिसकी अनुमति है।

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राजस्थान हाईकोर्ट ने भी सभी 33 जिलों में संबंधित जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में ‘पब्लिक लैंड प्रोटेक्शन सेल’ (पीएलपीसी) का गठन कर गोचर भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है। इस आदेश पर सभी जिलों में ‘पीएलपीसी’ बनाई जा चुकी हैं, लेकिन उनके जरिए कोर्ट की भावना के अनुरूप काम नहीं हो रहा है। लोग ‘पीएलपीसी’ से संतुष्ट नहीं हैं। गोचर से न सिर्फ पशुओं को चारा मिलता है, बल्कि यह जमीन विभिन्न प्रकार के पेड़, पौधे, झाडिय़ां, घास, जड़ी-बूटियां, औषधियां और खाना पकाने के लिए ईंधन भी मुहैया करवाती हैं। ज्यादातर जलस्रोत भी गोचर पर ही हैं।

गोचर भूमि वन्यजीवों की कई प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है। मरू-प्रदेश के लिए चारागाह, गोचर भूमि बहुत जरूरी है। गोचर पर अतिक्रमण सिर्फ एक जमीन पर अतिक्रमण नहीं है, बल्कि यह पशुओं के जीने के अधिकार का अतिक्रमण है। राजस्थान ऐसा प्रदेश है, जो बार-बार अकाल झेलता है और इसलिए पशुपालन यहां के निवासियों का मुख्य व्यवसाय है। पशुओं की अधिकता के कारण चारे की मांग इसके उत्पादन के मुकाबले अधिक रहती है। ‘सेवण’ और ‘धामन’  घास के रूप में चारे की आपूर्ति चारागाह व गोचर भूमि से ही होती रही है। चारागाहों के निरंतर घटते जाने से चारे का परंपरागत स्रोत सिकुड़ रहा है। आज तो गोचर पर अतिक्रमणों को केवल पशुओं के विरोध में देखा जा रहा है, लेकिन यदि गोचर भूमि को बचाया नहीं गया तो यह मानव जीवन के लिए कई तरह की मुश्किलों को न्यौता होगा। गोचर भूमि का खत्म होना पर्यावरणीय असंतुलन की वजह भी बनेगा। (सप्रेस)

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