Sarvodaya Press Service

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अमरनाथ यात्रा का फिर एक बार पर्यावरण प्रबंधन करेगा, इंदौर का स्टार्टअप ‘स्वाहा’

डॉ. सन्तोष पाटीदार

पूरे देश में तेजी से आगे बढ़ता इंदौर का सस्टेनेबिलिटी और वेस्ट मैनेजमेंट स्टार्टअप ‘स्वाहा’ फिर एक बार दुर्गम हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित बाबा अमरनाथ की गुफा यात्रा को पूर्णत: पर्यावरण सम्मत बनाएगा। इस हेतु उसका चयन पिछले वर्ष के उसके बेहतर प्रदर्शन की वजह से हुआ है।

इस वर्ष ‘स्वाहा’ फिर से 350 से अधिक सफाई मित्रों और वोलेंटियर की टीम के साथ अमरनाथ के दोनों यात्रा पथ, बालटाल और पहलगाम के साथ गुफा तक के 13 कैंप्स के माध्यम से कचरे को हिमालय में फैलने से रोकेगा। 

‘स्वाहा’ के डायरेक्टर समीर शर्मा ने बताया कि हमने जिम्मेदारी पूर्ण तीर्थयात्रा (रिस्पॉन्सिबल पिलग्रिमेज) को थीम बनाया है। इसमें सबसे पहले बेस-कैंप पर ही सिंगल यूज़ प्लास्टिक को रोकेंगे और उसके लिए जागरूकता और मुख्य स्थानों पर प्लास्टिक के बदले कपड़े के थैले निशुल्क बांटेंगे। इसके बाद लंगरों के भोजन अपशिष्ट food waste और रसोई अपशिष्ट kitchen waste से स्थान पर कंपोस्ट बनाया जायेगा। 

लगेगासस्टेनेबल “इन्दौर वाले” लंगर

इस बार ‘स्वाहा’ ने इंदौर शहर के सोशल मीडिया ग्रुप के साथ मिलकर एक ऐसा लंगर लगाने का आयोजन किया है जो पूर्णतः solar सोलर और बायोगैस से चलेगा और इसमें इंदौरी स्वाद यानी पोहे, साबूदाने की खिचड़ी, चाय यात्रियों को निशुल्क प्रसाद के तौर पर वितरित की जाएगी। यह अपने आप में पहला सस्टेनेबल लंगर होगा। इंदौर ग्रुप की शालिनी शर्मा ने बताया कि हम शहरवासियों और ग्रुप के 2 लाख सदस्यों के सहयोग से इसे अमरनाथ यात्रा में चलाएंगे। इसके साथ पूरे यात्रा मार्ग, बेस कैंप, लंगर और गुफा तक ‘स्वाहा’ की वेस्ट मैनेजमेंट फैसिलिटी लगेंगी। 

इंदौर के स्टार्टअप पूरे देश में स्वच्छता और जीरो वेस्ट इवेंट का नया मॉडल दे रहे हैं। अवेयरनेस में जिंगल्स, यात्रा एंथम, विभिन्न एक्टिविटीज, प्लेटफॉर्म, सेल्फी प्वाइंट, कपड़े का बैग और साथ ही स्वच्छता मासकॉट पूरे समय बेस कैंप्स में घूमेंगे। सोशल मीडिया से पूरे देश में सस्टेनेबल टूरिज्म और रिस्पॉन्सिबल पिलग्रिमेज का नया संदेश देश में जाएगा, ताकि कश्मीर की घाटियों और हिमालय के पहाड़ों पर प्रदूषण ना फैले। 

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‘स्वाहा’ के सलाहकार जयवंत दाभाड़े और समीर शर्मा ने बताया कि सोशल मीडिया पर विशेष पूरे माह का कार्यक्रम एक जून से लॉन्च किया है। इस बार भी कश्मीर के 200 से अधिक युवाओं द्वारा इसमें स्वयंसेवा की जायेगी। पूरे देश से इस पर्यावरण संरक्षण इवेंट हेतु युवा और लोग वोलेंटियर के रूप में ‘स्वाहा’ के पास आ रहे हैं जिन्हें पर्यावरण संरक्षण सिखाया जाएगा और ट्रेनिंग के साथ सर्टिफिकेट भी मिलेगा। 

62 दिन की यह यात्रा एक जुलाई से 31 अगस्त तक आयोजित होगी

इस बार लगभग 1200 टन कचरे को इकट्ठा कर प्रोसेस करना, व्यवहार परिवर्तन Behavioural change मुख्य उद्देश्य है। बेस कैंप पर ही प्लास्टिक का कचरा रोकना बड़ा काम है। यात्रा के रास्ते में प्लास्टिक कचरा बढ़ता है। ‘स्वाहा’ टीम कोशिश करेगी कि लोग यात्रा के शुरुआत के बिंदु बेस कैम्प बालटाल और पहलगाम पर ही सारा प्लास्टिक रोकें। 

यात्री 20 से 30 लाख प्लास्टिक बोतलें रास्ते में खरीद कर फेंकते हैं। ‘स्वाहा’ के रोहित अग्रवाल ने बताया कि यात्री यदि अपने साथ सिर्फ पानी की रियूजेबल बोतल ही लेकर आ जाएं तो 20 से 30 लाख प्लास्टिक बोतलों को हिमालय में आने से रोका जा सकता है। इसमें पानी, कोल्डड्रिंक और ज्यूस सबसे बड़े कचरा उत्पादक होते हैं। 

बनाई स्पेशल मशीनें

‘स्वाहा’ के ज्वलंत शाह ने बताया कि हमने बिना बिजली से चलने वाली ऐसी मशीन बनाई है जो नॉन मोटरेबल रोड से घोड़ों पर रखकर पहाड़ों पर जाएगी और उसके बाद मैकेनिकली ऑपरेट होगी। यह अपने आपमें अदभुत प्रयोग होगा जो ऐसे दुर्गम स्थानों के लिए एक उदाहरण बनेगा। यह सस्ते, पोर्टेबल और बिना बिजली के चलाए जा सकते हैं और इसका मेंटेनेंस भी आसान है। 

मोबाइल घोड़ा इंजीनियरिंग यूनिट

‘स्वाहा’ की एक इंजीनियरिंग टीम पूरे समय यात्रा पथ पर घोड़ों के साथ 13 कैंप्स पर मेंटेनेंस करती रहती है। इसमें हर 72 घंटे में इंजीनियर बदलना पड़ता है। 

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वेब ऐप्स और MIS पोर्टल से मॉनिटरिंग

पूरे समय कचरा प्रबंधन, प्रोसेसिंग, मानव संसाधन प्रबंधन के लिए सॉफ्टवेयर बनाया गया है जो रीयल टाइम डेटा एनालिसिस करेगा और रिपोर्टिंग भी। यात्री जहां भी कचरा देखेंगे वे वेब ऐप पर रिपोर्ट कर सकेंगे ताकि एजेन्सी तत्काल उसे हटाएं। टचस्क्रीन कियोस्क भी यात्रा फीडबैक देने के काम आयेंगे।

मौसम सबसे बड़ी चुनौती

अप्रत्याशित मौसम जो कभी भी बारिश, तूफान, भू-स्खलन, क्लाउड बर्स्ट, अत्यधिक ठंड, बर्फबारी के बीच यह कार्य देश के सबसे ऊंचे तीर्थयात्रा स्थल पर करना बेहद कठिन है। समीर शर्मा ने बताया कि हम एक माह पहले से पहाड़ों पर जाते हैं, ताकि मौसम की अनुकूलता हासिल करें अन्यथा ऑक्सीजन की कमी और ठंडे मौसम, हाई एल्टीट्यूड सिंड्रोम से बेहद परेशानी होती है। (सप्रेस)

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