प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुफ्त सुविधाओं के खिलाफ आम सहमति बनती दिख रही है। गरीबों के लिए मुफ्त या सब्सिडी वाला अनाज, बिजली या स्वास्थ्य सेवाएं अचानक सभी वित्तीय चिंताओं का मूल कारण बन गई हैं। लेकिन कंपनियों को दी जा रही भारी कर कटौती, और करोड़ों की ऋण माफी को क्या कहा जाए? इन्ही सवालों के संदर्भ में पेश है सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी टीम व्दारा तैयार ‘हमारा पैसा हमारा हिसाब‘ का नया एपिसोड।

अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया
लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी

