लोकतंत्र समाज

दो घाटियों की गुहार

दो घाटियों की गुहार

नर्मदा और गंगा की तरह कश्‍मीर घाटी भी ‘जीवित इकाई’ मान ली गई होती तो वह इनके साथ मिलकर लोक-समाज से क्‍या कहतीं? प्रस्‍तुत है, कश्‍मीर और नर्मदा घाटी को जानने-समझने के बाद उनकी तरफ से लोक-समाज को लिखा गया...

मीनाक्षी नटराजन

नर्मदा और गंगा की तरह कश्‍मीर घाटी भी ‘जीवित इकाई’ मान ली गई होती तो वह इनके साथ मिलकर लोक-समाज से क्‍या कहतीं? प्रस्‍तुत है, कश्‍मीर और नर्मदा घाटी को जानने-समझने के बाद उनकी तरफ से लोक-समाज को लिखा गया मीनाक्षी नटराजन का यह पत्र।

प्रिय लोक-समाज,

इन दिनों व्यवस्था के पास फुर्सत नहीं है। वह बहुत व्यस्त है, दाना खिलाने, पाबंद करने, खामोश करने और ’’सुधारने’’ में लगी है। विकास जो अब तक नहीं हुआ, वो उसका एजेण्डा है। उसके लिए कोई भी कीमत चुकाना चलन में है। कीमत पर सवाल खड़ा  करना, अफसोस जाहिर करना ’’द्रोह’’ है।

ऐसे में क्या किया जाये? हम दोनों पार्टियों ने तय किया कि क्यों न लोक-समाज को ही लिखा जाये। इस तथाकथित विकास के पागलपन की मरुभूमि में संवेदनाओं का एक शीतल स्रोत लोक-समाज के भीतर आज भी मौजूद है। यही विश्वास लेकर लिख रहे हैं। पत्र हमारा साझा है। व्यथा की साझी दास्तान।

कश्मीर घाटी

हमारा भूगोल एक नहीं है। एक देश का मानस है, तो दूसरा उसके हृदय में बहता मन। शीर्ष पर बसी मानस-रुपी एक घाटी सुनसान खड़ी है। कहते हैं कि एक ’’धारा’’ हटा दी गई है। ऐसा लगता है जैसे कि गंगा-जमुना की तहजीबी धारा से ही किसी ने बलात् दूर कर दिया है। हर तरफ पहरेदारी है। चिनारों को नहीं पता कि इस पतझड पत्तों को लाल और सुनहरा करने की इजाजत है भी या नहीं। केसर को महकने की आज्ञा है कि नहीं? फिरन्‍ड की बुनाई में जज़्बातों की गरमाहट अभी-अभी तक थी, लेकिन अब पता नहीं किसकी सजा भुगत रही है। कहवे की मिठास में पराये-पन की कडुवाहट के लिए कोई स्थान नहीं हुआ करता था। अब वो फीका लगने लगा है। वाजवां के दस्तरख्वान मजहब को नहीं जानते थे। अब हैरान हैं। कहां चली गई डल झील में शिकारों, नावों में सजती फल, फूल, तरकारी की तैरती दुकानें, लहराते ठेले?

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घाटी की वो रुहानी कश्मीरी रुमानियत बेनूर हो गई है। जब भी पुरसुकून प्यारी बोलियों की जरुरत पडी, रबड की गोलियां बांटी गईं। नन्हें बच्चों की आंखें बूढ़े दादा, नाना के औंधे पड़े शरीर पर अब स्तब्ध नहीं होतीं। अब किसी को ऐसी दंत-कथायें याद नहीं जहां अमरनाथ जी ने चरवाहे को अपना स्थान स्वप्न में दिखाया था। दीवारें बहुत ऊंची उठ चुकी हैं। घाटी का विलय जो हुआ है। भले ही पहरेदार हर मोड पर तैनात हों। यह नया मॉडल है। इसमें भय का आसमान उम्मीदों को रोशन नहीं होने देता।

इतने में क्या सुनते हैं कि धारा हटी, धारा से कटे, अब धारा-प्रवाह बहती नदियों को खोद कर रेत निकाला जा रहा है। सचमुच विलय इसी को तो कहते हैं। हर दूसरे प्रांत के व्यक्ति को उत्खनन की छूट मिल गई है। घाटी की नदियां थोड़ी और मटमैली हो जायें तो क्या है? लहूलुहान तो पहले ही हो चुकी हैं। मायूस न हो, मानस घाटी! तू विकास कर रही है। हृदय में बसते मन की घाटी से तो पूछ। कभी से दोहन हो ही रहा है। मेरा चीरहरण रोकना अब किसी कृष्ण के बस की बात नहीं। मेरा एक नाम ‘रेवा’ भी था, जो अब केवल ‘रेता’ रह गया है। लाखों जन बेदखल किये गये हैं। जानती हो किस लिए? पहले कहा गया था कि मरु प्रदेश की प्यास बुझायी जायेगी। मैने न चाहते हुए भी नदी से सरोवर बनना स्वीकार कर लिया। मेरे साथ छल हुआ। मेरा पानी तो उद्योगों को दिया जाने लगा, वो भी बहुत सस्‍ते में। मेरी घाटी में पर्यटन का नया केन्द्र विकसित किया गया है। ’’एकता’’ के नाम पर एकाधिपत्य की विशाल प्रतिमा खड़ी की गई है। विडंबना है कि ‘सरदार सरोवर’ से कुछ ही दूरी पर स्थित यह प्रतिमा उस महानायक के महान् त्याग की तौहीन करती -सी दिखती है।

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आसपास के गांव पानी के लिए त्राहि-त्राहि करते हैं, लेकिन हजारों करोड़ पेयजल और सिंचाई पर खर्च करने के बजाय क्रूज, अभ्यारण्य, पर्यटन भवन पर व्यय किये जाने की योजना बनती है। स्थानीय को वहां कोई रोजगार नसीब नहीं। ’’विकास प्राधिकरण’’ कहलाते इस क्षेत्र में कोरोना कालखण्ड में भी बेदखली बदस्तूर जारी है। अब तार-फेंसिंग के नाम पर खदेड़ा जा रहा है। ’’प्रतिकार’’ ’’न्युसेंस’’ कहलाता है। प्रतिरोध के स्वर मुखरित होने पर नर्मदा घाटी कश्मीर बना दी जाती है। यानि खामोश कर दी जाती है।

नर्मदा घाटी

अब हम तुम क्या करें? पर्यावरण का नया जबरदस्त सुधारवादी आदेश आया है। प्रमाण-पत्र मुक्त शोषण की खुली आजादी। तुम्हें-मुझे चाहे जैसा मोड़ा, बांधा जा सकता है। इजाजत की जरुरत नहीं। वो बाद में मिलती रहेगी। हममें से एक खामोश कर दी गई, दूसरी की कोई सुनता नहीं। एक नफरत की झंझावात से टूट गई तो दूसरी आवाज उठाते-उठाते क्लांत हो गई। मेरी गोद में खेलता जन-समाज दर-दर भटक रहा है। उसकी सुध लेने की गरज कोई महसूस नहीं करता। वो तो कब से अघोषित लॉकडाउन का दंश झेल रहा है। इधर-से-उधर पैदल चलता रहा है। कोई आसरा देने वाला नहीं। उसके पैर थम गये। आंसू सूख गये। गला रुंध गया है। आवाज नहीं निकलती।

हम दोनों का यही मुस्तकबिल है। हम दो घाटियों की दारुण कथा। सभी व्यावसायिक प्रचार माध्यमों को अपनी गिरफ्त में लेने पर भी लोक-समाज को भरमाया नहीं जा सकता। यही सोचकर तुम्हारे द्वार खटखटा रहे हैं।

क्या इन दो घाटियों की खामोश आवाज विकास के शोरगुल में अनसुनी कर दी जायेगी? क्या संवेदना और करुणा की नन्हीं कोंपलें लोक-समाज में भी अब नहीं फूटने वालीं? हमारे इंसाफ की आवाज तुम जरुर उठाओगे न? हमें रीता तो नहीं लौटाओगे? तुम्हीं से उम्मीद है। तुम जरुर सुनोगे।

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लोक-समाज! हम दो घाटियों के इंसाफ की गुहार को अनसुना कर तुम चैन से जी नहीं सकोगे। आज जो हमारे साथ हो रहा है, वह कल तुम्हारे साथ भी होने वाला है। तब कोई किसी के लिए लड़ने वाला नहीं बचेगा। इसलिए जागो कि देर न हो जाये, व्यवस्था को झुकाने की अपनी शक्ति को पहचानो और हमारे इंसाफ के लिए अपने मन आंगन में दीप जलाओ। (सप्रेस)

तुम्हारी प्रिय

कश्मीर घाटी, नर्मदा घाटी 

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