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अरावली का 40 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो चुका है राजस्थान में! : उपेंद्र शंकर

कोटा । सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एंपावरमेंट कमेटी की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले पचास सालों में राजस्थान में 128 पहाड़ों में से 31 पहाड़ समाप्त हो चुके हैं। अरावली पर्वत, जो राजस्थान को दो हिस्सों में बांटता है, खनन की वजह से उस पर भी खतरा मंडरा रहा है। पिछले 40 सालों में अरावली का 40 फ़ीसद हिस्सा खत्म हो चुका है।

ये तथ्‍य जलधारा अभियान के संयोजक उपेंद्र शंकर  ने कोटा में आयोजित जलवायु परिवर्तन पर आयेाजित राज्य संगोष्‍ठी में साझा किये। इस कार्यशाला का आयोजन सोशल लीगल इनफॉरमेशन सेंटर, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क और सेंटर फॉर कांस्टीट्यूशनल राइट्स इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था।

उपेंद्र शंकर ने बताया कि वर्षा जल जमीन में जाकर ऐसे स्थानों पर एकत्र हो जाता है जिन्हें एक्वाफर या जलभर कहते हैं। ये भूजल के भंडार भी पिछले सालों में रीतते जा रहे हैं। सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 2008 से लेकर 2018 तक दस साल के अंतराल में 67 फीसद एक्वाफर कम हो गए हैं जो चिन्ताजनक है। वैसे भी राजस्थान में भूजल  की गुणवत्ता अच्छी नहीं है क्योंकि उसमें क्लोराइड, फ्लोराइड और अब यूरेनियम भी मिला है जो नहाने-धोने और पीने के काम का नहीं है।

राजस्थान में निरंतर घटते जा रहे बारिश के दिन

उपेंद्र शंकर ने 5 जून 2017 की एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि दुनिया के 15 सर्वाधिक तापमान वाले शहरों में 10 शहर भारत में थे और उन 10 शहरों में भी राजस्थान के 8 शहर शामिल थे, जिनका तापमान 47•5 सेंटीग्रेड से अधिक था। उसमें कोटा शहर भी शामिल था।

श्री उपेंद्र शंकर ने सिंचाई विभाग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि राजस्थान में बारिश के दिन निरंतर घटते जा रहे हैं। यद्यपि मिलीमीटर के हिसाब से बारिश कम नहीं हो रही है। कम दिनों में बारिश तूफान की तरह आती है और बहुत ज्यादा पानी उंढोल कर चली जाती है। अधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से 1973 में 108 दिन, 1985 में 64 दिन, 2011 में 48 दिन और 2015 में 45 दिन वर्षा रिकॉर्ड की गई है।

कोई भी नदी ग्रीन जोन में नहीं

इसका बड़ा दुष्परिणाम यह है कि जब कम दिनों में ज्यादा बारिश होती है तो पानी नदियों से निकल नहीं पाता और उफान आ जाता है। बड़ा इलाका जलमग्न हो जाता है। इसके साथ ही भूजल रिचार्ज भी ढंग से नहीं हो पाता। उन्होंने एक अन्य रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि वाटर हार्वेस्टिंग की बात बहुत होती है लेकिन सिर्फ छह फ़ीसदी वर्षा जल ही कृत्रिम तरीके से जमीन में रिचार्ज हो पा रहा है जबकि 90 प्रतिशत बरसाती पानी से ही भूजल रिचार्ज हो रहा था। अभी भी इसमें बहुत काम करने की आवश्यकता है। वर्ष 2017 में राजस्थान की 9 नदियों का अध्ययन किया गया जिसमें से 8 नदियां खराब स्थिति में पाई गई थी। कोई भी नदी ग्रीन जोन में नहीं थी।

उन्होंने कहा कि भारत में 52 बड़े लोग देश की 75 फीसदी संपदा पर अधिकार  रखते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि प्राकृतिक संपदा पर मिल्कियत किसकी होगी? अगर मिल्कियत बड़े लोगों के हाथों में है तो फिर आम आदमी धोखे में ही रहेगा। वह जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने में ज्यादा कुछ कर नहीं पाएगा। उसका फल नहीं मिलेगा।

वॉटरशेड विभाग के अतिरिक्त निदेशक रहे जल बिरादरी के संभाग अध्यक्ष सीएसके परमार ने कहा कि बरसाती पानी को हम समुद्र में जाने से रोक पाते तो जलवायु गर्म होने की समस्या ही नहीं होती। इसके लिये मनरेगा में 155 तरह के ग्राम विकास के काम हो सकते हैं। उसकी मदद लेकर भूजल रिचार्ज करने, पेड़ लगाने, चरागाह विकसित करने जैसे काम प्राथमिकता से हाथ में लिए जाने चाहिए। सभी जागरूक होंगे और तभी ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से निपट पाएंगे। सत्र का संचालन जल बिरादरी के प्रदेश उपाध्यक्ष पर्यावरणविद् ब्रजेश विजयवर्गीय ने किया।

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