Gandhi

दूसरों से बदला लेते लेते हम समाज में बदलाव लाना भूल गये : गांधीवादी चिंतक रमेश शर्मा

हिसार, हरियाणा । दूसरों से बदला लेने लेते हम समाज में, देश में बदलाव लाना ही भूल गये । हम प्रकृति से, समाज से और देश से बदला लेने में ही व्यस्त हो चुके हैं । भूल गये हम प्रकृति…

अतीत के प्रति घृणा और बदले की भावना लोगों के मन में घोलने के बजाय देश के वास्तविक विकास के लिए काम करना चाहिए

सरकारों, मीडिया और नागरिकों से की महात्मा गांधी की पौत्री तारा भट्टाचार्य ने अपील नईदिल्‍ली। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पोती 89 वर्षीय तारा गांधी भट्टाचार्य ने एक बयान में कहा है कि आज देश में जो कुछ हो रहा है, वह विकट…

शांति की लक्ष्मण-रेखा का विवेक जगाता गांधी-जनों का आह्वान

शांति सबसे बड़ा मानवीय धर्म है देश भर के वरिष्‍ठ  विशिष्ट गांधीजनों ने चिंता जाहिर की है कि देश में यहां-वहां से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं जो बताती हैं कि भारतीय समाज के ताने-बाने को कमजोर करने की…

शिक्षा की बेहतरी के लिए हाथ, दिमाग, दिल मिलकर कार्य करें

हमारा शिक्षा तंत्र बुनियादी समझ विकसित करने में जितना विफल रहा है उतना ही विफल आर्थिक एवं अन्य उद्देश्यों को पूरा करने में भी रहा है। युवाओं में बेरोजगारी एवं अल्प रोजगार दर बढ़ाने में इस तंत्र की मुख्य भूमिका…

समाज : दंगों की दास्तान

जातियों, धर्मों, लिंगों और वर्गों में विभाजित हमारे समाज में क्या दंगे यूं ही, बे-वजह या तात्कालिक वजहों से हो जाते हैं? या फिर कईयों के सतत प्रयासों, कारनामों से इन्हें अंजाम दिया जाता है? क्या आपस की मारामार में…

भगत सिंह की फांसी और महात्मा गांधी

महात्मा गांधी भी न केवल फांसी की सजा के विरोध में थे, वरन उन्होंने हिंसात्मक गतिविधियों में लिप्त, क्रांतिकारियों, नजरबंद लोगों की रिहाई की मांग लार्ड इरविन से की, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने बिना मुकदमा चलाए, बिना अभियोग लगाए या…

गांधी का धर्म और धर्म की राजनीति

आजकल महात्मा गांधी को सार्वजनिक तौर पर तरह-तरह से अपमानित करने का चलन हो गया है। मौजूदा सत्ता की शह पर गांधी को, उनकी धार्मिक मान्यताओं के लिए भी गरियाया जाता है। तो क्या गांधी के धार्मिक विश्वास तत्कालीन धार्मिक…

क्या देश में अब विस्मृत हैं गांधी

आचार्य राममूर्ति कर्मकांडों, मूर्तियों और खोखले ‘भजनों’ के बावजूद सब जानते हैं कि एक व्यक्ति और देश की हैसियत से हम गांधी को भूल गए हैं। यदि गांधी हमारे आसपास होते तो आज हमारी ऐसी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक…

सत्ता से साधे नहीं जा सकते, गांधी

जैसे-जैसे सत्ता समाज में बसे गांधी को नकारती है, वैसे-वैसे गांधी और-और सामने आते जाते हैं। पिछले सात-आठ सालों में गांधी की ठोस पुनर्वापसी इसी बात का प्रमाण है। इसके उलट, यदि सत्ता गांधी को खारिज करना चाहती है तो…

मौजूदा राजनीति से असहमत गांधी

स्वराज के लिए गांधीजी राजनीतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी आवश्यक मानते थे। लोकशाही की स्थापना के लिए सैनिक सत्ता पर नागरिक सत्ता की प्रधानता की लड़ाई वे अनिवार्य मानते थे। दरअसल आज सत्ता का आधार दंड…