लोकतंत्र

इतना सन्नाटा क्यों है?

कुमार प्रशांत का सवाल : लोकतंत्र में बोलने की जरूरत जयंत सिंह तोमर कुमार प्रशांत ने अपने भाषण के ठीक बीच में अचानक सवाल उछाला – ‘इतना सन्नाटा क्यों है? जो जहां हैं वहां से बोलिये। आज के लोकतंत्र की…

लोकतंत्र, संविधान व धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए संघर्ष में सहभागी और पहल करने का संकल्प

48 वें सर्वोदय समाज सम्मेलन के अंतिम दिन राजनीतिक प्रस्ताव पारित Sewagram सेवाग्राम, वर्धा,16 मार्च, 2023। 48वें सर्वोदय समाज सम्मेलन sarvodaya samaj sammelan के समापन पर एक राजनीतिक प्रस्ताव पारित करके मौजूदा सत्ता की वैचारिकी पर देश के अहिंसक समाज…

उन्नीस बनाम छियान्नबे : अपने-अपने आपातकाल

लगभग पांच दशक पहले इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल सत्ता के लिए निजी हुलफुलाहट के अलावा राज्य के सर्वशक्तिमान बनते जाने को भी उजागर करता है। क्या होता है, जब राज्य सारे जहां की वैध-अवैध शक्तियां अपने तईं जमा…

लोकतंत्र की डूबती लुटिया

दुनिया के अधिकांश देशों में राज-काज चलाने के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय और सफल प्रणाली लोकतंत्र मानी जाती है, लेकिन क्या वह अपने घोषित उद्देश्यों के मुताबिक अमल में लाई जा रही है? क्या हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली कारगर साबित…

जनता के ‘बजट’से जनता की ही जासूसी ?प्रजातंत्र अमर रहे !

अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से उस सरकार द्वारा अपने ही उन नागरिकों की जासूसी करना जिसे कि उन्होंने पूरे विश्वास के साथ अपनी रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंप रखी है एक ख़तरनाक क़िस्म का ख़ौफ़ उत्पन्न करता है। ख़ौफ़ यह कि…

पंचायती राज में गांधी की प्रासंगिकता

गांधी के नजरिए से मौजूदा लोकतंत्र की समीक्षा की जाए तो उसमें राज्य की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई ग्रामसभाएं और ग्राम-पंचायतें प्रमुखता से उभरती हैं, लेकिन धीरे-धीरे हमारे लोकतंत्र की बुराईयां गांव और उनके प्रशासनिक ताने-बाने तक पहुंच गई हैं।…

विचार : लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक व्यवहार

दुनियाभर में वापरी जा रही लोकतांत्रिक प्रणाली व्यवहार में कितनी कारगर है, यह उसके मैदानी अमल से उजागर होता रहता है। व्यक्ति और समाज के स्तर पर लोकतंत्र के कसीदे काढने वाले अपने निजी, राजनैतिक और सामाजिक जीवन में कितने…

नतीजों के निहितार्थ

पिछली सदी में जहां अनेक देशों ने लोकतंत्र को एक बेहतर शासन-प्रणाली की तरह अंगीकार किया गया था, अब उसी लोकतंत्र की चपेट में पड़े कराह रहे हैं। जगह-जगह लोकतंत्र के नाम पर तानाशाहों, एक-आयामी विचारधाराओं और फर्जी सत्‍ताओं ने…

लोकतंत्र की लुटिया डूबने, न डूबने देने का चुनाव

कोविड-19 महामारी तक को अनदेखा करके मार्च में करीब दो दर्जन विधायकों को ‘लोकतंत्र की रक्षा करने’ की खातिर अपने अल्‍पमत के पाले में मिलाने वाली ‘भारतीय जनता पार्टी’ और बहुमत गंवाकर गद्दी से उतारी जाने वाली ‘भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस,’…

क्‍या गौरव करने लायक बचा है, लोकतंत्र?

हमारे समय का सर्वग्राही सवाल उस लोकतंत्र से है, जिसका नाम लेकर तरह-तरह के रंगों, झंडों वाली राजनीतिक जमातें सत्‍ता पर चढती-उतरती रहती हैं। क्‍या सचमुच हम जिसे सतत वापरते हैं, वह लोकतंत्र ही है? दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में…