इतना सन्नाटा क्यों है?

कुमार प्रशांत का सवाल : लोकतंत्र में बोलने की जरूरत

जयंत सिंह तोमर

कुमार प्रशांत ने अपने भाषण के ठीक बीच में अचानक सवाल उछाला – ‘इतना सन्नाटा क्यों है? जो जहां हैं वहां से बोलिये। आज के लोकतंत्र की पहली मांग है कि बोलिये। परिस्थिति और ज्यादा बिगड़े उससे पहले बोलिये। ‘

गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली) के अध्यक्ष कुमार प्रशांत गत 22 अप्रैल को भोपाल में गांधी भवन के मोहनिया सभागार में ‘गांधी का लोकतंत्र ‘ पर बोल रहे थे। इस आयोजन में मंच पर कोई बैकड्रॉप या बैनर नहीं था। पीछे दीवाल में काफी ऊंचाई पर महात्मा गांधी का एक चित्र था, जो यहां हमेशा रहता है।

आज के समय की तीन ज़रूरतें

कुमार प्रशांत ने आज के समय की तीन जरूरतें बताईं-
१) सच बोलें। सच की कीमत चुकानी होती है। कभी कभी प्राण देकर भी। जान तो एक दिन सबकी जानी है। लेकिन जान कैसे गई उससे इतिहास में हमारी जगह तय होती है।
२) खुद अगर सच बोलने का साहस न कर सकें तो सच बोलने वाले का साथ दें।
३) सच बोलने वाले का साथ भी यदि न दे सकें तो अपने ढंग से उसका समर्थन करें।
यदि इनमें से कुछ भी न कर सकें तो लोकतंत्र की तरफ पीठ करके खड़े हो जाएं।

व्यक्तिगत जिम्मेदारी और पर्यावरण की चिंता

भाषण के अंत में उन्होंने कहा कि हम सब अपनी जरूरतें कम करें। निजी वाहन रखने की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें। सिंगापुर में तो इस मामले में बहुत कड़ाई है। ऐसा करेंगे तो आजादी भी सुरक्षित रहेगी, पृथ्वी और उसका पर्यावरण भी।

लोकतंत्र और संसदीय लोकतंत्र का फर्क

लोकतंत्र और संसदीय लोकतंत्र को बिलकुल अलग – अलग बताते हुए कुमार प्रशांत बोले – लोकतंत्र एक जीवन शैली है। लोकतंत्र एक दूसरे का सम्मान करना सिखाता है। सबको साथ लेकर चलना इसमें जरूरी है।‌ महात्मा गांधी लोकतंत्र से एक कदम भी पीछे जाने को तैयार नहीं थे। जबकि संसदीय लोकतंत्र की कड़ी आलोचना उन्होंने ‘ हिन्द- स्वराज ‘ में इंग्लैंड की संसद के संदर्भ में साल 1909 में की थी।

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आज प्रधानमंत्री की शक्ति बहुमत साबित करने में ही लग जाती है। यह कैसी देशभक्ति? अलंकरणों के जरिए असहमति की आवाजों को अपने साथ किया जाता है। जो उपकृत हुए वे भी एक तरह से भेड़ों के बाड़े में शामिल हुए। जो पहले दरबार में बैठते थे, वे अब संसद में बैठ रहे हैं।
आज संसदीय लोकतंत्र के क्षितिज को बड़ा करने की जरूरत है। यह व्यवस्था बहुत मुश्किल से खड़ी हुई है जिसे आज बंद करने की कोशिश हो रही है।

राजनीतिक गठजोड़ और स्वतंत्र सोच का महत्व

‘हम से कांग्रेस के लोग कहते हैं आप इतने अच्छे ढंग से सत्ता – पक्ष की आलोचना करते हैं, कांग्रेस के साथ आ जाएं तो ताकत और बढ़ेगी।’
‘हम उनसे कहते हैं कि आप भूल रहे हैं कि हमारे और आपके दरम्यान आपातकाल यानी इमरजेंसी के समय की उन्नीस महीने की जेल भी आती है। हम साथ आ जायेंगे तो हम भी शून्य हो जायेंगे और आप भी।’

गांधीजी का लोकसेवक संघका विचार

कुमार प्रशांत बोले – गांधीजी ने 29 जनवरी 1948 के दिन कहा था कि कांग्रेस एक दर्शन है। उसकी जगह अब लोकसेवक संघ आगे का काम करेगा। इसके 12 बिन्दुओं में एक बिन्दु यह भी होगा कि गांव- गांव में प्रामाणिक मतदाता सूची बनाने का काम लोकसेवक संघ करेगा।

गांधीजी का आत्मविश्वास और सत्य के प्रति आस्था

गांधीजी के आत्मविश्वास की चर्चा करते हुए कुमार प्रशांत ने कहा – इलाहाबाद से भेजी गई एक चिठ्ठी में मोतीलाल नेहरू ने नमक- सत्याग्रह पर व्यंग्य किया। जवाबी चिठ्ठी में गांधीजी ने लिखा – ‘ बना कर देखो।’ मोतीलाल नेहरू ने सड़क पर आग जलाकर बड़े बर्तन में समुद्र का पानी उबालना शुरू ही किया था कि पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।
महात्मा गांधी ने तब कहा था कि आज की परिस्थिति पर मेरी पकड़ है। आज मुकाबला शक्ति और सत्य के बीच है। Fight between might and right. मैं पूरी दुनिया से सत्य के पक्ष में समर्थन चाहता हूं।

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संसद और संविधान: सीमाओं की समझ

संसद को सर्वोच्च बताने के संदर्भ में उपराष्ट्रपति श्री धनखड़ के बयान पर बोलते हुए कुमार प्रशांत ने कहा – संसद कानून बनाती है। कानून संविधान – सम्मत है या नहीं यह समीक्षा करने का काम न्यायपालिका का है। कार्यपालिका क्रियान्वयन करती है। सब एक दूसरे से ऐसे बंधे हैं कि सबकी सीमाएं स्पष्ट हैं। यह कहीं नहीं लिखा कि संसद सर्वोच्च है।

गांधीजी की स्वेच्छा से स्वीकार की गई गरीबी और सरल जीवन का संदेश

देशवासियों से अपनी जरूरतें कम करने का आह्वान करते हुए कुमार प्रशांत ने बताया कि गांधीजी स्वेच्छा से स्वीकार की हुई गरीबी के पक्ष में थे। वे कहते थे स्वर्ग तक सोने की सीढ़ी हर आदमी बनाये। लेकिन अपनी जरूरतें बढ़ाकर और दूसरे का हक का छीनकर यह काम बिलकुल नहीं होना चाहिए।

भाषा, संचार और संवाद में गांधीजी का दृष्टिकोण

हिंदी को देश की भाषा बनाना है, यह बात सबसे पहले महात्मा गांधी ने ही उठाई थी, जबकि वे खुद गुजराती थे। उनके बेटे देवदास गांधी इसी काम के लिए पंद्रह साल मद्रास में रहे। गांधी जी जानते थे कि भाषा के व्याकरण पर जोर देने के बजाय उससे संवाद और संचार का काम पूरा होना ज्यादा जरूरी है।

गाय संरक्षण पर गांधीजी का संतुलित दृष्टिकोण

गांधीजी गाय को बचाने की बात करते थे, लेकिन यह भी कहते थे कि गाय बचाने के लिए किसी की जान लेना भी ठीक नहीं। वे आमिष भोजन या मांसाहार करने वालों की जरूरत भी समझते थे। खान अब्दुल गफ्फार खान जब उनके आश्रम में गए तो गांधीजी ने बादशाह खान के लिए उनके अनुकूल भोजन बनाने के निर्देश दिए। यह अलग बात है कि बादशाह खान आश्रम की रीति – नीति को समझकर खुद ही शाकाहारी या निरामिष भोजन करने लगे।

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विकास मॉडल और लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा

आज लोकतंत्र की आत्मा को बचाने के लिए गांधी के संदर्भ को समझने की जरूरत है। लोकतंत्र तो रूस में चल रहा है जहां के शासक का कार्यकाल अबाध गति से बढ़ रहा है। लेकिन यह लोकतंत्र नहीं है। लम्बे समय से लोग छले गए हैं। विकास के जो माडल आज दिये जा रहे हैं उनके विकल्पों पर भी हमें सोचना होगा।

पूंजी बनाम श्रम का सवाल: आज की चुनौती

बिड़ला ने जब पूछा कि अंग्रेज चले गए, अब किससे लड़ना बाकी है। गांधी जी ने हंसते हुए कहा था- अब तुमसे लड़ना बाकी है। गांधी ने यह बात सहज भाव से कहीं थी। लेकिन पूंजी -प्रधान व्यवस्था को श्रम- प्रधान बनाना आज के समय की जरूरत है।

समारोह की प्रमुख उपस्थिति और संचालन

जाने- माने आलोचक डॉ विजय बहादुर सिंह, गांधी भवन के सचिव दयाराम नामदेव, वरिष्ठ पत्रकार सुधीर सक्सेना, राजेश बादल व पियूष बबेले, कवि राजेश जोशी, साहित्यकार नीलेश रघुवंशी, कुमार सिद्धार्थ आदि की इस अवसर पर विशेष उपस्थिति रही। कुमार प्रशांत के इस व्याख्यान का संयोजन राकेश दीवान ने व संचालन श्री अंकित मिश्रा ने किया।

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