उत्तराखंड आन्दोलन आधुनिक भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो क्षेत्रीय अस्मिता, सामाजिक चेतना और अहिंसक संघर्ष का प्रतीक रहा है। यह आन्दोलन केवल एक नए राज्य की माँग तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से एक…
आजकल देश की अर्थव्यवस्था में उद्योग कहा जाने वाला पर्यटन खासी अहमियत रखता है, लेकिन क्या बरसों से हो रहे तीर्थाटन और देशाटन का आनंद इस पर्यटन से मिल पा रहा है? क्या अपने समाज और रास्ते में मिलने वाली…
पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र के मुताबिक बिहार के लिए प्रकृति का प्रसाद मानी जाने वाली बाढ़ आजकल एक त्रासदी बन गई है। वजह है, उससे निपटने की कथित आधुनिक, तटबंध जैसी तरकीबें। साल-दर-साल आने वाली बाढ़ ने बिहार को किस तरह…
सुनील कुमार बिजली के निजीकरण की ताजा तरकीब है, स्मार्ट-मीटर। इसमें ठीक मोबाइल फोन की तरह जरूरत-भर बिजली को रीचार्ज करके उपयोग किया जाएगा। कहा जा रहा है कि इससे बिजली की चोरी रोकी जा सकेगी, लेकिन क्या यह तरकीब…
सुनील कुमार कलिंगनगर, नियमगिरि, जगतसिंहपुर (पोस्को), नारयणपटना, काशीपुर के बाद निगाह रायगड़ा़ जिले के सिजिमाली, कुटरूमाली और माजनमाली पर है। यहां पर बॉक्साइट का भंडार बड़ी मात्रा में है। कलिंगनगर, नियमगिरि, जगतसिंहपुर (पोस्को), नारायणपटना, काशीपुर के बाद निगाह रायगड़ा़ जिले के सिजिमाली, कुटरूमाली और माजनमाली…
वीजू कृष्णन रोटी, कपडा और मकान की तरह बिजली भी जीवन की बुनियादी जरूरत बन गई है। जाहिर है, इन चारों अपरिहार्य उपादानों ने सेठों को अकूत पूंजी कूटने के भरपूर अवसर दिए हैं। बिजली क्षेत्र में सरकारें, तरह-तरह के…
अनुपम मिश्र यह साल दुनिया की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी ‘भोपाल गैसकांड’ की चालीसवीं बरसी का साल है। क्या हुआ था, दो और तीन दिसंबर की दरमियानी रात को? और उसके बाद किस-किस ने, कैसे-कैसे, क्या-क्या किया? ‘सप्रेस’ के दस्तावेजों में…
आज़म खान दुनिया की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी से चार दशक पहले निपटने वाले भोपाल में इसे लेकर आज क्या हो रहा है? क्या सरकारों, सेठों और समाज ने अपनी-अपनी जिम्मेदारी सलीके से निभाई है? प्रस्तुत है, इसी की पड़ताल करता…
नई दिल्ली, 24 नवंबर । काका साहब कालेलकर और विष्णु प्रभाकर की स्मृति में गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से सन्निधि सभागार में आयोजित एक समारोह में पर्यावरण के क्षेत्र में निरंतर रचनात्मक लेखन करने…
भारती पंडित फिल्म समीक्षा मीडिया में तो राजनीति का दखल हम देख ही रहे थे, अब फिल्मों में राजनीतिक दखल के क्या मायने होते हैं, इस फिल्म को देखने से आप समझ पाएँगे | सीधे और छुपे रूप से नफरत…