पटाखों से बढ़ते वायु और ध्वनि प्रदूषण के बीच देश में कई ऐसे समुदाय हैं, जिन्होंने पर्यावरण और जीव-जंतुओं की चिंता करते हुए बिना पटाखों के दीपावली मनाने की परंपरा विकसित की है। अलीगढ़ से शिवगंगा और जौनसार तक के ये उदाहरण बताते हैं कि उत्सव की खुशियां प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर भी मनाई जा सकती हैं।
वर्तमान समय में दीपावली पर्व पटाखों के चलाने से धूल, धुंआ एवं धमाकों का उत्सव बन गया है। पटाखों के चलाने से औसतन वायु-प्रदूषण में तीन गुना तथा शोर-प्रदूषण में पांच गुना वृद्धि का आंकलन किया गया है। यह प्रदूषण मानव स्वास्थ के साथ-साथ पशु-पक्षी तथा पर्यावरण पर भी विपरित प्रभाव डालता है। प्रदूषण के दुष्प्रभावों से सचेत हो अब देश में कई स्थानों पर बगैर पटाखों के दीपावली मनाने के सार्थक प्रयास किये गए हैं, जो प्रशंसनीय तथा अनुकरणीय है। आइये ऐसे ही कुछ प्रयासों के बारे में जानते हैं।
अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश) की ‘ग्रीन पार्क सोसायटी’ में बसे लगभग 200 परिवार पिछले 10-12 वर्षों से बगैर पटाखे चलाये आपसी मेल-जोल से दीपावली मना रहे हैं। दीये एवं रांगोली से घरों पर सजावट की जाती है। बिजली बचाने हेतु झालर वगैरह भी नहीं लगाई जाती। इसी प्रकार गुरूग्राम (हरियाणा) के सेक्टर 30 में स्थित ‘यूनिटेक वर्ल्ड सोसायटी’ के 200 तथा ‘डी.एल.एफ. फेज वन’ के 700 परिवार भी पिछले 10-12 वर्षों से बगैर पटाखे चलाये दीपावली मना रहे हैं। इन लोगों ने दीप-दान की मुहीम चला रखी है।
‘बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय’ परिसर में सड़कों के किनारे तथा भवनों के आसपास आम, महुआ, इमली एवं सागौन के पुराने पेड़ बहुतायत में लगे हैं। इन पेड़ों पर कई प्रकार के पक्षियों का आवास है। पटाखों की आवाज तथा धूल-धुंए से पक्षी परेशान न हों इसलिए यहां दीपावली पर पटाखे नहीं चलाने की स्वप्रेरित परम्परा पिछले कईं वर्षों से जारी है। वर्तमान में नई पीढ़ी के कुछ लोग लक्ष्मी पूजन के समय कुछ पटाखे चलाते हैं, परन्तु बहुत नियंत्रित ढंग से।

पक्षियों को ही ध्यान में रखकर तमिलनाडु के शिवगंगा जिले के तीन गांव (कौलुकडीपट्टी, एस. मापंती, वेतागुंड्डीपट्टी) में पिछले 30-35 वर्षों से दीपावली पर पटाखे नहीं चलाये जाते हैं। इसका कारण पास में स्थित ‘वेत्तानगुड़ी पक्षी-अभयारण्य’ है, जो लगभग 40 हेक्टर में फैला है। यहां सर्दियों में 200 प्रकार के प्रवासी पक्षी आते हैं। गांव वालों का मानना है कि पक्षियों के आने से उनकी फसल अच्छी होती है क्योंकि वे फसलों के लिए हानिकारक कीट-पतंगों को खा जाते हैं।
फरीदाबाद (हरियाणा) स्थित वल्लभगड़ की ‘भगतसिंह कालोनी’ में 45 वर्ष पूर्व ‘पर्वतीय बंधु-समाज’ नामक संगठन बनाया गया था। संगठन के ज्यादातर लोग पहाड़ी क्षेत्रों से आकर यहां कारोबार करने हेतु बस गए थे। पहाड़ी क्षेत्रों से आने के कारण ये लोग साफ हवा का महत्व जानते थे एवं इसी विचार पर यह निर्णय 2015 में लिया गया कि संगठन से जुड़े 125 परिवार दीपावली पर पटाखे नहीं चलायेंगे ताकि हवा ज्यादा प्रदूषित नहीं हो। ये लोग दीपावली की शाम एकत्र होकर एक-दूसरे की बधाई देकर मिठाई खिलाते हैं। रात को पारम्परिक नृत्य एवं संगीत का कार्यक्रम होता है।जनजातीय बहुलता वाले जौनसार (उत्तराखण्ड) के लोग एक महीने बाद बूढ़ी दीवाली (देयई) मनाते हैं क्योंकि इन्हें भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की जानकारी देरी से मिली थी। दीपावली के आयोजन अलग-अलग स्थानीय नामों के अनुसार पांच दिनों तक चलते हैं। पटाखे नहीं चलाये जाते, परंतु देवदार या भीमल पेड़ की लकड़ी की मशालें (होलो) जलाकर पारम्परिक एवं सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के अनुसार कार्यक्रम करते हैं।
‘दलमा वन्यप्राणी अभ्यारण्य’ (जमशेदपुर, झारखंड) के अंतर्गत आने वाले छोटे-छोटे 85 गांव के लोग भी दीपावली पर पटाखे नहीं चलाते। घरों की साफ-सफाई कर दीवारों पर अपने इष्टदेव के चित्र बनाते हैं तथा दीपों से सजावट करते हैं। जंगली हाथियों के आक्रमण से बचाव हेतु स्थानीय प्रशासन इन गांवों के लोगों को 8-10 पटाखों के पैकेट प्रतिमाह देता है। दीपावली पर वे इन पटाखों के पेकेट्स का उपयोग नहीं करते, क्योंकि आसपास के क्षेत्रों में इतने पटाखे चलते हैं कि उनकी आवाज से हाथियों के आक्रमण का खतरा नहीं रहता।
हमारे देश के ज्यादातर शहरों में सामान्यतः वायु-प्रदूषण निर्धारित पैमानों से ज्यादा ही बना रहता है। अतः ऐसे हालात में बगैर पटाखों की दीपावली मनाना कुछ समय के लिए थोड़ी राहत दे सकता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी दीपावली पर पटाखे चलाने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। (सप्रेस)