पढ़ाई, परीक्षा और मेरिट सूची में जगह बनाने के बाद भी नियुक्ति न मिले तो सड़क पर उतरना पड़ता है। लेकिन क्या इतना भी काफी नहीं? क्या सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए भूख हड़ताल, महीनों धरने पर बैठना और आखिरकार सिर तक मुंडवाना पड़ेगा? केरल में शिक्षक भर्ती की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन ऐसे ही सवाल खड़े करता है।
तिरुवनंतपुरम में केरल सचिवालय के बाहर लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर (एलपीएसटी) के अभ्यर्थी पिछले 115 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। ये वे युवा हैं, जिन्होंने शिक्षक बनने की योग्यता हासिल की, परीक्षा पास की और केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) की रैंक सूची में जगह बनाई। वर्षों की मेहनत के बाद उन्हें नियुक्ति की उम्मीद थी, लेकिन रैंक सूची में नाम होना और नियुक्ति पत्र मिलना दो अलग-अलग बातें साबित हो रही हैं। यह प्रदर्शन 115 से अधिक दिनों से चल रहा है (यह विरोध जुलाई 2026 में शुरू हुआ था)।
इस संघर्ष की एक तस्वीर 26 अक्टूबर को सामने आई, जब ऑल केरल लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर रैंक होल्डर्स एसोसिएशन की सचिव एस. वलारमाथी ने सचिवालय के बाहर अपना सिर मुंडवा लिया और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करने का एलान किया। एक महिला का विरोध जताने के लिए इस हद तक पहुंचना व्यवस्था के प्रति उसकी निराशा दिखाता है। सवाल है कि अपनी योग्यता और मेहनत का हक पाने के लिए अभ्यर्थियों को आखिर इस हद तक क्यों जाना पड़ रहा है?
यह पहली बार नहीं है जब अभ्यर्थियों ने भूख हड़ताल की है। इससे पहले वलारमाथी 13 दिनों तक अनशन पर बैठी थीं और उनका धरना 37 दिनों तक चला था। 11 अगस्त को शिक्षा मंत्री एन. शमसुद्दीन से बातचीत के बाद उन्होंने भूख हड़ताल खत्म की थी। सरकार ने मांगों पर विचार के लिए 45 दिन का समय मांगा था। अभ्यर्थियों ने भरोसा किया, लेकिन उनके मुताबिक तय समय बीतने के बाद भी कोई ठोस फैसला नहीं हुआ।
30 सितंबर को सरकार के साथ दोबारा बातचीत हुई। कुछ मांगों पर सहमति और आगे की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई, लेकिन अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्हें लिखित आदेश नहीं मिला। ऐसे में सवाल है कि सरकारी आश्वासनों पर आखिर कितनी बार भरोसा किया जाए?
अभ्यर्थियों की प्रमुख मांगों में शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात को मौजूदा 1:30 से घटाकर 1:25 करना शामिल है। उनका मानना है कि इससे शिक्षकों के अधिक पद सृजित हो सकेंगे। इसके अलावा प्रधानाध्यापक के रिक्त पदों को पीएससी के दायरे में लाने, मौजूदा रैंक सूची की वैधता बढ़ाने और नई भर्ती अधिसूचना फिलहाल टालने की मांग है। सहायता प्राप्त स्कूलों में नियुक्ति प्रक्रिया में भी वे पीएससी की भूमिका और पारदर्शिता चाहते हैं, ताकि सभी योग्य अभ्यर्थियों को समान अवसर मिल सके।
सवाल यह भी है कि पीएससी की रैंक सूची में जगह बनाने के बावजूद नियुक्तियां क्यों नहीं हो रही हैं? सरकार की ओर से इसकी वजह स्कूलों में विद्यार्थियों की घटती संख्या और शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से जुड़े नियमों को बताया जाता रहा है। विद्यार्थियों की संख्या कम होने से शिक्षकों के पद प्रभावित होते हैं और नई नियुक्तियों की गुंजाइश घट जाती है। लेकिन अभ्यर्थियों का तर्क है कि चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद नियुक्ति का रास्ता निकालना सरकार की जिम्मेदारी है। व्यवस्था की जटिलताओं का बोझ उन युवाओं पर क्यों डाला जाए, जिन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा पास की है?
30 सितंबर की बैठक में सरकार ने 150 से अधिक विद्यार्थियों वाले सरकारी स्कूलों के एलपी सेक्शन में प्रधानाध्यापक के कुछ पद पीएससी को रिपोर्ट करने और मौजूदा रैंक सूची से नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी। रैंक सूची की अवधि बढ़ाने के अनुरोध पर उसके समाप्त होने के बाद सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की बात भी कही गई थी। हालांकि, अभ्यर्थियों का कहना है कि प्रमुख मांगों पर अब तक ठोस और लिखित निर्णय नहीं हुआ है। यही वजह है कि आंदोलन जारी है।
इस मामले में सरकार की राजनीतिक जवाबदेही का सवाल भी अहम है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ लंबे समय तक विपक्ष में रहा और अब सत्ता में है। विपक्ष में रहते हुए उसके नेताओं ने युवाओं के रोजगार और नियुक्तियों के मुद्दे उठाए थे। अब उन्हीं मांगों पर फैसला लेने की जिम्मेदारी उसकी है। आखिर सत्ता बदलने के साथ रोजगार के सवाल की अहमियत कैसे बदल सकती है? युवाओं को राजनीतिक आश्वासन नहीं, नियुक्ति चाहिए।
शिक्षक भर्ती का मामला केवल बेरोजगार युवाओं तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध बच्चों की शिक्षा से भी है। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने की बात तभी पूरी हो सकती है, जब वहां पर्याप्त योग्य शिक्षक हों। एक ओर बेहतर शिक्षा के दावे किए जाएं और दूसरी ओर योग्य युवा महीनों नियुक्ति का इंतजार करें, तो यह विरोधाभास सवाल खड़े करता है।
केरल अकेला राज्य नहीं है, जहां शिक्षक भर्ती को लेकर अभ्यर्थी आंदोलन कर रहे हैं। बिहार में बीपीएससी शिक्षक भर्ती के प्रारूप, झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में देरी, उत्तर प्रदेश में चयन प्रक्रिया और भर्ती नियमों को लेकर विरोध हुआ है। पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती का मामला लंबे समय से अदालतों में उलझा है। मध्य प्रदेश में रिक्त पद भरने और पदों की संख्या बढ़ाने की मांग पर प्रदर्शन हुए हैं, जबकि आंध्र प्रदेश में मेगा डीएससी भर्ती की पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। राज्यों की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन युवाओं का सवाल एक ही है—परीक्षा और चयन के बाद भी नियुक्ति के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों?
इस आंदोलन के पीछे सिर्फ कुछ पदों पर नियुक्ति की मांग नहीं, बल्कि उन परिवारों की उम्मीदें भी हैं, जिन्होंने बच्चों की पढ़ाई और तैयारी में सालों लगाए हैं। कई युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी उम्र के महत्वपूर्ण साल गुजार चुके हैं। कुछ ने शिक्षक बनने के लिए दूसरी नौकरियों के विकल्प छोड़े हैं। उनके सामने पारिवारिक और आर्थिक जिम्मेदारियां भी हैं। रैंक सूची की वैधता मई 2028 तक है, लेकिन समय बीतने के साथ नए अवसरों की चिंता बढ़ रही है। अगली परीक्षा और फिर से तैयारी की अनिश्चितता उनके संघर्ष को और मुश्किल बनाती है।
एक महिला का सिर मुंडवाकर भूख हड़ताल पर बैठना किसी भी व्यवस्था के लिए सामान्य घटना नहीं होनी चाहिए। यह लंबे इंतजार और बार-बार मिले आश्वासनों से पैदा हुई निराशा की तस्वीर है। आंदोलनकारी बेहतर भविष्य की उम्मीद में अपनी मांगों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सरकार से जवाब मांगना जरूरी है, क्योंकि भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने और नियुक्तियों पर फैसला लेने की जिम्मेदारी उसी की है। क्या 114 दिनों का धरना भी अभ्यर्थियों की मांगों को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है? बातचीत में दिए गए आश्वासनों को ठोस फैसलों में बदलने में इतनी देरी क्यों हो रही है? क्या हर बार अपनी बात सुनाने के लिए युवाओं को विरोध का स्तर और ऊंचा करना पड़ेगा?
शिक्षक बनने का सपना देखने वाले इन युवाओं ने परीक्षा पास कर अपनी योग्यता साबित की है। वे किसी विशेष कृपा की मांग नहीं कर रहे, बल्कि चयन प्रक्रिया के तहत नियुक्ति चाहते हैं। लिखित परीक्षा दे चुके और रैंक सूची में जगह बना चुके इन युवाओं को अब नौकरी के लिए सड़क पर संघर्ष करना पड़ रहा है। आखिर नौकरी की आस में बैठे युवाओं की परीक्षा कब खत्म होगी?