सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की नई स्टडी के मुताबिक, देश के ज्यादातर राज्यों में ग्रामीण इलाकों का PM2.5 स्तर शहरी क्षेत्रों के लगभग बराबर पहुंच गया है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश के गांवों में प्रदूषण का औसत स्तर राष्ट्रीय मानकों से काफी अधिक है। इसके बावजूद वायु प्रदूषण से निपटने की सरकारी नीतियां और मॉनिटरिंग व्यवस्था मुख्य रूप से शहरों पर केंद्रित हैं।
बचपन से हमें बताया जाता रहा है कि अगर साफ हवा चाहिए तो गांव चले जाना चाहिए। शहरों की फैक्ट्रियां, गाड़ियां और धूल-मिट्टी को वायु प्रदूषण की मुख्य वजह माना गया, जबकि गांवों को हरे-भरे और स्वच्छ हवा वाले इलाकों के रूप में देखा जाता रहा। लेकिन देश के ग्रामीण इलाकों में वायु प्रदूषण की स्थिति इस धारणा को चुनौती दे रही है।
ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान भी गांवों में मैंने प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखा है। राजस्थान, हरियाणा, यूपी, बिहार और बंगाल समेत गंगा के मैदानी भाग में वायु प्रदूषण का यह गुबार शहरों और गांवों को तकरीबन एक समान रूप से ढके हुए है। कई जगह हालात ऐसे हैं कि लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल हो रहा है।
अब सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक नई स्टडी ने इस समस्या के व्यापक स्वरूप को सामने रखा है। अध्ययन बताता है कि वायु प्रदूषण अब केवल महानगरों या औद्योगिक शहरों तक सीमित नहीं है। देश के कई राज्यों में ग्रामीण इलाकों की हवा भी शहरों जितनी ही प्रदूषित हो चुकी है।
शहर और गांव के प्रदूषण का अंतर 10 फीसदी से भी कम

इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि देश के ज्यादातर राज्यों में शहरी और ग्रामीण इलाकों के PM2.5 स्तर के बीच का अंतर बहुत कम रह गया है।
वर्ष 2023 में 24 राज्यों का आकलन किया गया। इनमें से 16 राज्यों में शहरी और ग्रामीण PM2.5 स्तर के बीच का अंतर 10 फीसदी से भी कम था।
CREA के विश्लेषक मनोज कुमार के मुताबिक, बिहार और पंजाब जैसे राज्यों में शहरों और गांवों के प्रदूषण स्तर का अंतर क्रमशः करीब 5 और 4 फीसदी है।
तमिलनाडु और कर्नाटक में यह अंतर महज 1 से 2 फीसदी के आसपास है।
इसका अर्थ है कि इन राज्यों में ग्रामीण आबादी भी लगभग उसी स्तर के PM2.5 प्रदूषण का सामना कर रही है, जैसा शहरों में रहने वाले लोग करते हैं। यानी गांवों की हवा अब शहरों की तुलना में बहुत ज्यादा साफ नहीं रह गई है।
कई राज्यों के गांवों में PM2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानकों से ऊपर

ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण की गंभीरता केवल शहरों से तुलना करने तक सीमित नहीं है। कई राज्यों में गांवों का PM2.5 स्तर भारत के अपने राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से भी अधिक है।
भारत में राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (National Ambient Air Quality Standards—NAAQS) वर्ष 2009 में तय किए गए थे। इनके मुताबिक PM2.5 की औसत वार्षिक सीमा 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसके मुकाबले विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वार्षिक गाइडलाइन 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। यानी भारत का निर्धारित मानक WHO की गाइडलाइन से आठ गुना अधिक है।
इसके बावजूद कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में PM2.5 का औसत स्तर भारतीय मानक से भी ऊपर दर्ज किया गया।
मसलन, हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में औसत PM2.5 स्तर 63.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और उत्तर प्रदेश में 60.7 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। छत्तीसगढ़, झारखंड और त्रिपुरा के गांवों में भी प्रदूषण का स्तर निर्धारित राष्ट्रीय मानकों से काफी अधिक है।
ये आंकड़े बताते हैं कि गांवों की हवा केवल शहरों के मुकाबले थोड़ी कम खराब नहीं है, बल्कि कई जगह यह अपने आप में स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है।
बढ़ती आबादी और औद्योगिक गतिविधियां प्रदूषण के बड़े कारण
ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण बढ़ने के पीछे कई वजहें हैं। मनोज कुमार के मुताबिक, पिछले दो दशकों में जनसंख्या का दबाव और औद्योगिक गतिविधियां बढ़ी हैं। इसके साथ ही भारत के वायु गुणवत्ता मानक WHO के दिशानिर्देशों के मुकाबले काफी कमजोर हैं।
वे कहते हैं, “लगभग दो दशक हो चुके हैं और हमने अब तक अपने मानकों को रिवाइज नहीं किया है। हमें WHO के अंतरिम लक्ष्यों के हिसाब से अपने टार्गेट रिवाइज करने चाहिए और उत्सर्जन का स्तर घटाना चाहिए। हमें पता है कि कौन से उद्योग कितना प्रदूषण कर रहे हैं। हमें उनके लिए उत्सर्जन की सीमाएं तय करनी चाहिए और उनसे प्रदूषण नियंत्रण की तकनीक लगाने को कहना चाहिए।”
उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी नियमों और उनके सख्त क्रियान्वयन की जरूरत है। लेकिन सवाल यह है कि जब तक सरकारें कंपनियों और फैक्ट्रियों पर प्रभावी निगरानी नहीं रखेंगी और सभी क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के नियमों को ठीक से लागू नहीं करेंगी, तब तक उत्सर्जन में कमी कैसे आएगी?
एक दशक में ग्रामीण प्रदूषण में मामूली गिरावट, महाराष्ट्र अपवाद

CREA के अध्ययन में 2014 से 2023 के बीच के आंकड़ों की तुलना भी की गई है। इसमें ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में PM2.5 के स्तर में मामूली गिरावट का रुझान सामने आया है।
करीब 22 राज्यों में ग्रामीण इलाकों के PM2.5 स्तर में औसतन 7 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। शहरी इलाकों में यह गिरावट 6.4 प्रतिशत रही। यानी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण कम होने की दर शहरों के लगभग बराबर थी।
हालांकि, महाराष्ट्र इस रुझान से अलग रहा। राज्य के शहरी इलाकों में प्रदूषण का स्तर घटा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में PM2.5 का स्तर 4.1 प्रतिशत बढ़ गया।
यह स्थिति बताती है कि प्रदूषण पर नियंत्रण की चुनौती केवल शहरों तक सीमित नहीं रखी जा सकती। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती औद्योगिक और अन्य गतिविधियों के साथ वहां के प्रदूषण स्रोतों की निगरानी भी जरूरी है।
शहर-केंद्रित नीतियां और ग्रामीण इलाकों की अनदेखी
ग्रामीण वायु प्रदूषण की समस्या का एक बड़ा कारण नीतिगत स्तर पर भी दिखाई देता है। भारत सरकार का प्रमुख वायु प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम—नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP)—मुख्य रूप से चिह्नित शहरों और नॉन-अटेनमेंट सिटीज पर केंद्रित है। नॉन-अटेनमेंट सिटीज वे शहर हैं जो निर्धारित राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को हासिल नहीं कर पाए हैं।
लेकिन शहरों के आसपास के गांव भी अक्सर उसी वायु क्षेत्र (Airshed) का हिस्सा होते हैं। हवा किसी प्रशासनिक सीमा पर रुकती नहीं है। वह शहरों से गांवों की ओर और गांवों से शहरों की ओर बहती है। उसके साथ प्रदूषक कण भी एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचते हैं।
मनोज कुमार के मुताबिक, देश के शहरों में भी पर्याप्त वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र (Monitoring Stations) नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में तो इनकी संख्या शहरों के मुकाबले 10 प्रतिशत भी नहीं है।
वे कहते हैं, “मॉनिटरिंग न होने के कारण हमारे पास पर्याप्त आंकड़े ही नहीं हैं। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम में यह वादा था कि ग्रामीण इलाकों में मॉनिटरिंग नेटवर्क लगाया जाएगा। लेकिन आज भी वहां इसकी कमी है। यह इस स्थिति का एक बड़ा कारण है।”
जब ग्रामीण इलाकों में हवा की नियमित निगरानी ही नहीं होगी, तो वहां प्रदूषण के वास्तविक स्तर, उसके स्रोतों और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करना भी मुश्किल होगा। इससे नीति निर्माण और प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास प्रभावित हो सकते हैं।
साफ हवा के लिए शहरों से आगे देखना होगा
CREA का अध्ययन एक महत्वपूर्ण नीतिगत चुनौती की ओर इशारा करता है। भारत में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केवल शहरों में प्रदूषण कम करने के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। गांवों में भी औद्योगिक उत्सर्जन, प्रदूषण के अन्य स्रोतों और हवा की गुणवत्ता पर नियमित निगरानी जरूरी है।
इसके लिए शहर-केंद्रित नीतियों से आगे बढ़कर पूरे एयरशेड या क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण की योजना बनानी होगी। इसमें ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को शामिल करना, निगरानी नेटवर्क का विस्तार करना और उद्योगों सहित सभी प्रमुख प्रदूषण स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।
आखिरकार, प्रदूषण न तो शहर की सीमा पर रुकता है और न ही गांवों की सीमाओं का लिहाज करता है। हवा के साथ प्रदूषक कण भी एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते हैं।
साफ हवा का अधिकार शहरों तक सीमित नहीं हो सकता। जब तक ग्रामीण भारत को भी वायु प्रदूषण नियंत्रण की नीतियों, निगरानी और संसाधनों में बराबर महत्व नहीं मिलेगा, तब तक देश में स्वच्छ हवा का लक्ष्य अधूरा रहेगा।