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पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल करना और वंचितों की आवाज बनना है

पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल करना और वंचितों की आवाज बनना है

कुलदीप नैय्यर स्मृति सम्मान से पत्रकार हृदयेश जोशी एवं श्याम मीरा सिंह सम्‍मानित

नई दिल्ली, 24 अक्टूबर। गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा स्थापित सातवां कुलदीप नैय्यर पत्रकारिता सम्मान देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी (वर्ष 2024) और युवा पत्रकार श्याम मीरा सिंह (वर्ष 2025) को एक गरिमामय समारोह में प्रदान किया गया। सम्मान स्वरूप प्रत्येक को एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया गया। इस अवसर वरिष्ठ पत्रकार आशीष नंदी, कुमार प्रशांत, संजय सिंह, पत्रकार उर्मिलेश, अजीत अंजुम, प्रसून लंतात सहित अनेक पत्रकार उपस्थित थे।

सम्मान के प्रतिउत्तर में वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस सम्मान को पाकर वे जितना प्रसन्न हैं, उससे कहीं अधिक अनुगृहीत महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुझे इस बात का पूरा एहसास है कि देश में कई पत्रकार मुझसे कहीं अधिक काबिल और साहसी हैं और शायद वे इस सम्मान के मुझसे अधिक हकदार हैं।”

श्री जोशी ने कहा कि अपने करीब तीन दशक के पत्रकारिता सफर में जिन लोगों के सान्निध्य से उन्होंने सीखा, जिन्होंने उन्हें समृद्ध किया और उनकी दृष्टि को विस्तार दिया, उनके प्रति आभार व्यक्त करने का भी यह अवसर है। उन्होंने कहा कि आज अपनी पत्रकारिता के बारे में स्वयं कुछ कहना उन्हें उचित नहीं लगता। वे केवल उस सफर की बात कर सकते हैं, जिसने उन्हें कुछ अच्छा काम करने की प्रेरणा दी।

रिपोर्टिंग के सिलसिले में भारत के अलग-अलग हिस्सों में घूमने के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारों का काम उन तमाम कहानियों को सामने लाना है, जो अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। इन कहानियों को शब्द देना और कैमरे में दर्ज करना पत्रकारिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। लेकिन कई बार इन कहानियों के सामने आने के बावजूद सरकारें उन लोगों के लिए कुछ नहीं करतीं, जिनकी मदद करना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। उलटे, समाज के सबसे कमजोर और वंचित लोगों के हिस्से के संसाधन धीरे-धीरे अति-संपन्न और ताकतवर लोगों के पास पहुंचते जा रहे हैं। यह सवाल केवल पत्रकारिता का नहीं, बल्कि उस समाज का भी है, जिसका निर्माण हम कर रहे हैं।

विकास के नाम पर जंगलों और नदियों की अनदेखी

पत्रकारिता के आदर्शों और मानदंडों पर बात करने से पहले श्री जोशी ने देश की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन्हीं परिस्थितियों ने उनके लेखन और पत्रकारिता को आकार दिया है।

उन्होंने कहा कि हमारे विकास का मॉडल कुछ ऐसा बन गया है कि दूर-दराज के इलाकों में लोगों को बुनियादी सड़कें तक उपलब्ध नहीं होतीं। दूसरी ओर, बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े-बड़े राजमार्ग और रेल लाइनें बिछाने के लिए जंगलों और नदी के कछारों को बेरहमी से काटा जाता है, आर्द्रभूमियों को सुखाया जाता है और नदियों की धाराएं मोड़ दी जाती हैं। विकास परियोजनाओं के नाम पर लोगों को बार-बार विस्थापन का सामना करना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया को प्रख्यात चिंतक और पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने अपने विशिष्ट अंदाज में समझाया, चेताया और सोचने की प्रेरणा दी। श्री जोशी ने कहा कि उनके लिए यह अवसर अनुपम मिश्र को याद करने का भी है।

आज के दौर की बड़ी इमरजेंसी हेल्थ इमरजेंसी है

श्री जोशी ने कहा कि पत्रकार कुलदीप नैय्यर को अक्सर 1970 के दशक में आपातकाल के विरोध में की गई उनकी निर्भीक पत्रकारिता के लिए याद किया जाता है। उनका जीवन और काम यह समझने की प्रेरणा देता है कि पत्रकारिता का महत्व केवल घटनाओं की सूचना देने में नहीं, बल्कि सत्ता के सामने सच रखने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने में भी है।

उन्होंने कहा कि आज के दौर में एक बड़ी इमरजेंसी का सामना करना पड़ रहा है और वह है ‘हेल्थ इमरजेंसी’। इसकी सबसे गंभीर चोट समाज के गरीब और कमजोर लोगों पर पड़ती है। सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। पिछले कुछ दशकों में बीमा आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था के विस्तार पर जोर दिया गया है, लेकिन लोगों को उन इलाकों में भी स्वास्थ्य बीमा कार्ड दिए जा रहे हैं, जहां डॉक्टर, नर्सें और दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। केवल बीमा कार्ड उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है, जब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं ही मौजूद न हों।

उन्होंने पानी और हवा की गुणवत्ता, मिट्टी में खतरनाक रसायनों के जमाव, कीटनाशकों के इस्तेमाल और उनके नियमन से जुड़े सवालों को गंभीर चुनौती बताया।  श्री जोशी ने कहा कि इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई जरूरी है। साफ हवा के नाम पर स्मॉग टावर जैसे उपाय या क्लाउड सीडिंग जैसी तकनीकों का प्रचार करने से मूल सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

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वैज्ञानिक चेतना को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर रहा है मीडिया का एक हिस्सा

मीडिया की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए श्री जोशी ने कहा कि बड़े मीडिया संस्थानों का एक हिस्सा अपना ज्यादातर समय नफरत और सांप्रदायिक उन्माद बढ़ाने वाली सुर्खियों और बहसों में बिताता है। स्क्रीन पर वैज्ञानिक तथ्यों और तर्क की जगह कई बार अंधविश्वास, चमत्कार और रूढ़ियां ले लेती हैं। वैज्ञानिक चेतना को मजबूत करने के बजाय मीडिया का एक हिस्सा उसे कमजोर करने में योगदान देता है।

उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से उन्होंने पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और वैज्ञानिक चेतना से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग और लेखन को केंद्र में रखा है। कुछ लोगों ने उन्हें समझाया कि डिजिटल मीडिया में इन विषयों पर काम करने से शायद ज्यादा व्यूज या वॉच टाइम न मिले। लेकिन उनके लिए इन सवालों की गंभीरता को जानते हुए भी उन पर काम न करना अपने पेशे और समाज के प्रति जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा है। अपनी सेहत और भविष्य से जुड़े सवालों पर जानते-बूझते बात न करना उनके लिए गंभीर अनदेखी होगी।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता और गरिमा पर गर्व करना जरूरी

श्री जोशी ने उन पत्रकारों का विशेष उल्लेख किया, जो दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में नहीं, बल्कि बस्तर, बुंदेलखंड, पूर्वोत्तर के कस्बों और हिमालयी राज्यों के गांवों में रहकर महत्वपूर्ण रिपोर्टें भेजते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार इन पत्रकारों की खबरें उनके नाम के बिना प्रकाशित होती हैं। उन्हें न पुरस्कार मिलता है, न नियमित आमदनी और न सामाजिक सुरक्षा। मीडिया पहचान-पत्र, नियुक्ति-पत्र, बीमा और भविष्य निधि जैसी बुनियादी सुविधाएं भी अनेक पत्रकारों को हासिल नहीं हैं। कानूनी मुकदमे में फंसने पर उनके पास मदद के लिए वकील तक नहीं होता।

उन्होंने महिला पत्रकारों को भी याद किया, जो हमलों, मुकदमों और अश्लील ऑनलाइन ट्रोलिंग के बावजूद निर्भीकता से काम कर रही हैं। इनमें से अनेक पर्यावरण, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों पर बेबाकी से लिखती हैं। जोशी के मुताबिक, जब पत्रकारिता की गिरती साख को लेकर चिंता होती है, तब इन महिला पत्रकारों का काम याद दिलाता है कि साहस और प्रतिबद्धता अभी बाकी है।

उन्होंने कहा कि सरकारों का दुस्साहस बढ़ने और महत्वपूर्ण सवालों की अनदेखी होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि मीडिया के एक हिस्से ने अपने पेशे की स्वतंत्रता और गरिमा पर गर्व करना छोड़ दिया है और सत्ता से सवाल पूछने के अपने दायित्व से समझौता कर लिया है। इसके बावजूद स्वतंत्र पत्रकारों और पारंपरिक मीडिया के अनेक पत्रकारों ने अपनी रिपोर्टिंग से उम्मीद और भरोसा कायम रखा है।

सच किसी भी विचारधारा से ऊपर होता है

श्री जोशी ने युवा पीढ़ी, खासकर जेन-जी से उम्मीद जताते हुए कहा कि पर्यावरण, लैंगिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर उसकी आवाज बताती है कि समाज को बेहतर बनाने की आकांक्षा खत्म नहीं हुई है। इस ऊर्जा को वैज्ञानिक सोच, संवैधानिक मूल्यों और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता से जोड़ने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी भूमिका केवल सूचना देना नहीं, बल्कि लोगों को सवाल पूछने, सोचने और अपने समय की सच्चाइयों को समझने के लिए प्रेरित करना है। ध्रुवीकृत माहौल में यह आसान नहीं है, लेकिन इतना कठिन भी नहीं कि हम यह भूल जाएं कि सच किसी भी विचारधारा से ऊपर होता है। पत्रकारिता का काम बिना सनसनी के सच और तथ्यों की रिपोर्टिंग करना है।

कुलदीप नैय्यर स्मृति सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाय जिम्मेदारी बताते हुए श्री जोशी ने कहा कि पत्रकारिता का असली मूल्य सत्ता के करीब होने में नहीं, बल्कि समाज के उन लोगों के साथ खड़े होने में है, जिनकी आवाज सुनी नहीं जाती। उन्होंने कहा कि अन्याय को देखकर चुप रहना कोई विकल्प नहीं हो सकता और पत्रकारिता को आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर समाज की संभावना जीवित रखनी चाहिए।

पुरस्कार सम्मान के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ाता है: श्याम मीरा सिंह

युवा पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने सम्मान के प्रतिउत्तर में कहा कि कुलदीप नैय्यर पत्रकारिता पुरस्कार को वे केवल सम्मान के रूप में नहीं देखते। उन्हें लगता है कि पुरस्कार देने वाली समिति ने उनके जैसे युवाओं को देखकर यह उम्मीद भी की होगी कि अब उन्हें अपना काम और गंभीरता से करना है।

उन्होंने कहा कि कुलदीप नैय्यर जैसा बड़ा नाम उनके साथ जुड़ रहा है। वे खुद को उनके योगदान के सामने बहुत छोटा मानते हैं, लेकिन इस नाम के साथ जुड़ने के बाद उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है। अब उनसे अधिक गंभीरता और प्रतिबद्धता की अपेक्षा की जाएगी।

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श्री सिंह ने कहा कि वे आगे भी अधिक धैर्य और साहस के साथ अपना काम करते रहेंगे। जीवन में ऐसे मौके आ सकते हैं, जब पीछे हटने या समझौता करने का अवसर सामने आए। ऐसे समय में वे उन लोगों को याद करेंगे, जिन्होंने उनके नाम पर भरोसा किया और उन्हें इस सम्मान के योग्य समझा। उन्होंने कहा कि उन्हें यह ध्यान रखना है कि सम्मान देने वालों का भरोसा न टूटे। जब भी जीवन में समझौता करने का प्रलोभन होगा, वे याद करेंगे कि उन्हें कुलदीप नैय्यर पत्रकारिता पुरस्कार मिला है और उन्हें अपने काम पर टिके रहना है।

जब पत्रकारिता का रास्ता बंद किया जाने लगे

अपने अनुभव साझा करते हुए श्याम मीरा सिंह ने एक घटना का जिक्र किया, जिसने उनके भीतर पत्रकारिता और नागरिकता के रिश्ते को लेकर कई सवाल पैदा किए। उन्होंने बताया कि रिपोर्टिंग के सिलसिले में वे एक जगह गए थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। उस समय स्थिति ऐसी थी कि उन्हें लगा, जैसे उन्हें भीड़ की हिंसा का शिकार बनाने की कोशिश हो रही हो। हालांकि, ऐसा होने से पहले ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।

उन्होंने बताया कि उस घटना से करीब तीन घंटे पहले उन्होंने एक रील साझा की थी। उसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि आरएसएस और बजरंग दल से जुड़े जिन लोगों पर लिंचिंग जैसी घटनाओं में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं, उन्हें पुलिस हिरासत में नहीं ले रही, जबकि उनके कहने पर कंटेंट क्रिएटर्स और पत्रकारों को हिरासत में लिया जा रहा है। रील साझा करने के तीन घंटे के भीतर ही वे खुद हिरासत में थे।

श्री सिंह ने कहा कि उस समय उन्हें लगा कि अब पत्रकारिता का काम भी नहीं करने दिया जा रहा है। वे अजीत अंजुम से भी बात करते थे और उन्हें बताते थे कि माहौल तनावपूर्ण है, वहां बहुत से गुंडे मौजूद हैं और पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि जिन संस्थानों ने उन्हें कम उम्र में ही, महज सात महीने के भीतर, सम्मानित किया था, उन्हीं परिस्थितियों में एक प्रधानमंत्री पर किए गए ट्वीट के कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। आज स्थिति यह है कि टीवी चैनलों में सत्ता से असहमत आवाजों के लिए जगह लगातार मुश्किल होती जा रही है। जो लोग सत्ता के आलोचनात्मक पक्ष पर रिपोर्टिंग करते हैं, उनके लिए नौकरी पाना आसान नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर ऐसे पत्रकार सड़क पर जाते हैं, तो उन्हें गुंडे घेर लेते हैं। उन लोगों के कहने पर पुलिस उन्हें हिरासत में ले लेती है। घर पहुंचने पर पता चलता है कि सोशल मीडिया अकाउंट बंद हो गया है। अगली सुबह खबर मिलती है कि उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो गई है।

श्री सिंह ने कहा कि जब पत्रकारों को पत्रकारिता का काम ही नहीं करने दिया जा रहा हो, तब सवाल उठता है कि वे क्या करें? खासकर उनके मामले में, जब माइक छीन लिया गया, तो उन्हें लगा कि अब नागरिक के रूप में अपनी बात कहने का समय है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के दौरान बनाए गए वीडियो में उन्होंने कभी अमित शाह या नरेंद्र मोदी का नाम लेकर नारे नहीं लगाए। लेकिन जब उनका माइक छीन लिया गया, तो मामला पत्रकारिता की भूमिका से आगे बढ़कर नागरिकता का हो गया। उन्होंने वे नारे एक पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि भारत के एक नागरिक के रूप में लगाए। उन्हें भारतीय नागरिक होने पर गर्व है और वे अपनी इसी नागरिक पहचान के आधार पर अपनी बात रखना चाहते थे।

सवाल पूछने और विरोध करने का साहस

श्याम मीरा सिंह ने बताया कि पहली बार हिरासत में लिए जाने के बाद जब वे दोबारा रिपोर्टिंग के लिए गए, तब तिरंगा यात्रा वाले दिन आरएसएस से जुड़े लोगों ने उन्हें फिर घेर लिया। उनसे सवाल किए गए कि वे ऐसा क्यों करते हैं, क्या करते हैं और उनकी विचारधारा क्या है। उन पर उमर खालिद का समर्थक होने के आरोप भी लगाए गए।

उन्होंने कहा कि उस समय भी उन्होंने वही बात कही। अगर वे केवल पत्रकार की भूमिका में होते, तो शायद अपना प्रेस पहचान-पत्र दिखाते और नियमानुसार अपनी बात रखते। लेकिन उन्होंने उनसे कहा कि वे उनसे लड़ेंगे और यहीं लड़ेंगे। वे बार-बार वहां आएंगे। उन्हें कल रोका गया था, फिर भी वे आज आए हैं। आज रोकेंगे, तो परसों भी आएंगे।

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श्री सिंह ने कहा कि उनके भीतर यह जिद घर, गांव और देहात के जीवन से आई है। वे मानते हैं कि इस पुरस्कार ने उस जिद को और मजबूत करने में मदद की है। उन्होंने खुद को इस सम्मान के योग्य मानने का कोई बड़ा दावा नहीं किया, बल्कि इसे भरोसे की जिम्मेदारी बताया।

उन लोगों के प्रति आभार, जिन्होंने रास्ता बनाया

श्याम मीरा सिंह ने उन सभी लोगों को याद किया, जिन्होंने उनकी मदद की और उनके काम को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। उन्होंने सबसे पहले अजीत अंजुम का नाम लिया। उन्होंने बताया कि भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से निकलने के बाद कोविड के दौरान उन्होंने अजीत अंजुम के साथ वीडियो बनाने का काम शुरू किया। वहीं से उनके काम की शुरुआत हुई।

श्री सिंह ने बताया कि जब उन्हें आज तक से निकाला गया, तब कुलदीप नैय्यर पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित हो चुके वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का फोन आया। उन्होंने कहा, “श्याम, तुम्हें नौकरी-वौकरी मिलेगी नहीं।” इस पर सिंह ने कहा कि वे अभी नौकरी तलाश ही रहे हैं। इसके बाद उर्मिलेश ने उनका इंटरव्यू करवाने में मदद की। इस तरह उन्हें नौकरी मिली और उसके बाद उन्होंने यूट्यूब पर भी काम किया।

उन्होंने कहा कि पीछे मुड़कर देखने पर समझ में आता है कि किसी व्यक्ति की यात्रा केवल उसकी अपनी मेहनत से नहीं बनती। उसमें बहुत से लोगों का योगदान होता है। उन्होंने अपने माता-पिता, भाई, दोस्तों और उन तमाम लोगों को याद किया, जिनके साथ वे कभी रिक्शे में बैठकर कहीं गए, जिनसे मिले और जिन्होंने उन्हें देखकर मुस्कान दी।

श्री सिंह ने भरोसा दिलाया कि यह सम्मान उन्हें अपने काम के प्रति और जिम्मेदार बनाएगा। वे अधिक धैर्य और साहस के साथ अपना काम करते रहेंगे और जिन लोगों ने उन पर भरोसा किया है, उस भरोसे को बनाए रखने की कोशिश करेंगे।

पत्रकारिता की ताकत सच को सामने लाने और लोकतंत्र के पक्ष में खड़े होने में है: कुमार प्रशांत

गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने समारोह में पत्रकारिता की भूमिका और मौजूदा परिस्थितियों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज जब पत्रकारों का सम्मान किया जा रहा है, तब यह सवाल भी सामने है कि पत्रकारों के साथ क्या हो रहा है। वे सड़कों पर पीटे जा रहे हैं, प्रताड़ित किए जा रहे हैं और हिरासत में लिए जा रहे हैं। ऐसे समय में यह सोचना जरूरी है कि पत्रकारों के सम्मान में आयोजित समारोह कितना प्रासंगिक है, खासकर तब, जब यह सम्मान पत्रकारों की ओर से दिया जा रहा हो।

उन्होंने कहा कि आज के विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करते हुए कुछ पत्रकार जिस तल्लीनता, ताकत और प्रतिबद्धता के साथ सामने आए हैं, वह ध्यान देने योग्य है। कई बार किसी घटना की रिपोर्टिंग में पत्रकारों की सक्रियता इतनी अधिक होती है कि वे स्वयं भी उस घटनाक्रम का हिस्सा बन जाते हैं। यह हमें सोचने का अवसर देता है कि पत्रकारिता की भूमिका और उसकी जिम्मेदारी क्या है।

कुमार प्रशांत ने कहा कि पत्रकारिता की ताकत को देखना हो, तो हाल के विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के उदाहरण सामने हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में अगर वास्तविक पत्रकारिता है, तो उसमें सच को सामने लाने और लोगों के बीच सवाल खड़े करने की ताकत होनी चाहिए। अगर यह ताकत नहीं है, तो कलम केवल एक मामूली वस्तु बनकर रह जाएगी।

उन्होंने कहा कि कलम आकार में छोटी और वजन में हल्की होती है। पता नहीं उसका वजन कितने ग्राम होगा, लेकिन उसके चलने में जो ताकत छिपी है, वह बहुत बड़ी है। हालांकि, यह ताकत तभी तक कायम रहती है, जब तक कलम सच के साथ चलती है। उसके बाद उसके मूल्यों की दृढ़ता भी सवालों के घेरे में आ जाती है। इसलिए पत्रकारिता को केवल एक पेशे के रूप में नहीं, बल्कि उसके मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी के संदर्भ में भी समझना चाहिए।

कुमार प्रशांत ने कहा कि लोकतंत्र पत्रकारों के बिना नहीं चल सकता और पत्रकार लोकतंत्र के बिना नहीं जी सकते। दोनों के बीच इतना निकट का रिश्ता है कि एक की स्वतंत्रता और मजबूती दूसरे के लिए भी जरूरी है।

इस मौके पर बड़ी संख्‍या में प्रबुद्धजन, गांधी संस्‍थाओं के प्रतिनिधि, पत्रकार और युवा साथी उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में गांधी शांति प्रतिष्‍ठान के सचिव अशोक कुमार ने आभार माना।  

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