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प्रकृति की रक्षा में ही रामत्व, प्रकृति का विनाश ही रावणत्व

प्रकृति की रक्षा में ही रामत्व, प्रकृति का विनाश ही रावणत्व
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राम और रावण का संघर्ष केवल अच्छाई और बुराई का नहीं, प्रकृति के संरक्षण और उसके विनाश की दो विचारधाराओं का भी प्रतीक है। रावण ज्ञान-विज्ञान और तकनीक में निपुण था, लेकिन उसका वैभव प्रकृति के दोहन और दूसरों के अधिकारों पर कब्जे का प्रतीक बन गया। राम का वनवास, वन्य जीवों और वनवासी समुदायों से उनका जुड़ाव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देता है।


विजयादशमी पर विशेष

भारतीय समाज में राम और रावण की कथा सदियों से अच्छाई और बुराई के संघर्ष का प्रतीक रही है। लेकिन इस कथा को प्रकृति और मनुष्य के संबंधों के संदर्भ में भी समझने की जरूरत है। राम मर्यादा, करुणा और लोककल्याण के प्रतीक हैं, जबकि रावण का चरित्र ज्ञान, शक्ति और वैभव के बावजूद अहंकार तथा अधिकार की असीमित आकांक्षा को सामने लाता है। आज जब विकास के नाम पर जंगल उजाड़े जा रहे हैं, नदियों को प्रदूषित किया जा रहा है और पहाड़ों का सीना चीरकर खनिज निकाले जा रहे हैं, तब राम और रावण के बीच का यह संघर्ष नए अर्थ ग्रहण करता है।

रावण विद्वान था। उसके पास विज्ञान, तकनीक और असाधारण क्षमताएं थीं। सोने की लंका उसके वैभव का प्रतीक थी। लेकिन प्रश्न यह है कि किसी सभ्यता की महानता का निर्धारण उसके महलों की चमक से होगा या उस प्रकृति की समृद्धि से, जिसके संसाधनों पर उसका वैभव खड़ा है? यदि समृद्धि की नींव प्रकृति के असीमित दोहन और दूसरों के अधिकारों के हनन पर रखी गई हो, तो उसका अंत विनाश में ही होना है। सोने की लंका का रूपक हमें यही सोचने के लिए प्रेरित करता है कि प्रकृति की कीमत पर हासिल की गई समृद्धि अंततः समाज के लिए कितनी टिकाऊ हो सकती है।

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रावण के दस सिर और बीस हाथ को उस मानसिकता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है, जो अपनी शक्ति और बुद्धि के सहारे प्रकृति की हर सीमा को लांघ देना चाहती है। ज्ञान जब विवेक से अलग हो जाता है और तकनीक लोककल्याण के बजाय प्रभुत्व का साधन बन जाती है, तब वही ज्ञान विनाश का कारण बन सकता है। इसका अर्थ विज्ञान या तकनीक का विरोध करना नहीं है। असली प्रश्न यह है कि विज्ञान किसके लिए है और तकनीक किसकी सेवा कर रही है? क्या वह समाज की जरूरतों को पूरा कर रही है या बाजार की असीमित भूख को बढ़ा रही है?

मोह, क्रोध और लालच से मुक्त, सभी का सुख चाहने वाले श्रीराम को रावण से लड़ते हुए भी क्रोध नहीं आया। धोखा, झूठ और फरेब तो उनके आसपास भी नहीं आते थे। सभी के कल्याण की मूर्ति श्रीराम ने शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमणकारी रावण की नाभि में ही स्थित राक्षसी शक्ति को अपने तीर से नष्ट किया।

याने राक्षसी संस्कृति का विनाश करना ही क्रांतिकारी संस्कृति का पुनर्जागरण या पुनर्जन्म है। अब तो रावण जैसी शिक्षा ने डेटा सेंटर जैसे खतरनाक रावणों को जन्म देना भारत में भी शुरू कर दिया है। रावणी शक्तियों का पुनर्जन्म हो रहा है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा सेंटर जैसी तकनीकी व्यवस्थाओं के विस्तार के साथ इन सवालों पर विचार करना जरूरी है। इनकी ऊर्जा और पानी की जरूरतों तथा इनके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन होना चाहिए। हर तकनीकी परियोजना को विनाशकारी मानना उचित नहीं, लेकिन किसी भी परियोजना को केवल आधुनिकता के नाम पर पर्यावरणीय जवाबदेही से मुक्त नहीं किया जा सकता।

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इसके विपरीत श्रीराम प्रकृति के नायक थे, जबकि रावण प्रकृति-विनाशक नायक था। आज श्रीराम जैसे नायक ही चाहिए, जो आर्थिक ढाँचे को ध्वस्त करके प्राकृतिक ढाँचा खड़ा करें। वनवास के दौरान उनका संबंध वन, वन्य जीवों और वनवासी समुदायों से बनता है। राम की कथा में वानर और भालू उनके सहयोगी बनते हैं। इसे प्रकृति और समाज के बीच सहयोग के रूपक के रूप में भी समझा जा सकता है।

सीता के अपहरण का प्रसंग भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह स्त्री की स्वतंत्रता और गरिमा पर आक्रमण है। व्यापक अर्थ में इसे किसी की स्वतंत्र सत्ता पर जबरन अधिकार जमाने की प्रवृत्ति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु मानकर उसके संसाधनों पर एकाधिकार स्थापित करना भी इसी मानसिकता को दर्शाता है। नदी, जंगल, पहाड़ और जमीन किसी एक पीढ़ी या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं हैं। वे समूचे जीवन के आधार हैं और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी सबकी है।

भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान की गहरी परंपरा रही है। नदियों को माता, पृथ्वी को धारण करने वाली शक्ति और वृक्षों को जीवन का आधार मानने की चेतना इसी संबंध की अभिव्यक्ति है। लेकिन संस्कृति की सार्थकता केवल प्रतीकों और अनुष्ठानों में नहीं, हमारे व्यवहार में दिखाई देती है। नदी को माता कहने वाला समाज यदि उसी नदी में कचरा और औद्योगिक अपशिष्ट बहाता है, तो उसके शब्द और कर्म में विरोधाभास है।

रावण का अंत आज के संदर्भ में संघर्ष लालच, असीमित उपभोग और प्रभुत्व की उन प्रवृत्तियों से है, जो प्रकृति को बाजार की वस्तु और विकास को केवल आर्थिक वृद्धि मानती हैं। ये प्रवृत्तियां केवल सत्ता या उद्योग में नहीं, हमारे अपने जीवन में भी मौजूद हैं। पानी की बर्बादी, अनावश्यक उपभोग और प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली आदतों को सामान्य मानना भी उसी सोच को मजबूत करता है।

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इसलिए रामत्व का अर्थ प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी, संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग और सभी जीवों के प्रति संवेदनशीलता को जीवन में उतारना है। रावणत्व का अंत किसी एक युद्ध से नहीं होगा। इसके लिए विकास की दिशा, उपभोग की आदतों और प्रकृति के प्रति हमारे नजरिये में बदलाव लाना होगा।

राम की विजय तभी सार्थक होगी, जब भारतीय संस्कृति का संवर्धन प्रकृति से अलग होकर संभव नहीं है। प्रकृति सुरक्षित होगी, तभी संस्कृति जीवित और समृद्ध रहेगी। आज के समय में राम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शक्ति का उपयोग संरक्षण के लिए, ज्ञान का उपयोग लोककल्याण के लिए और विकास का उद्देश्य जीवन को बचाने के लिए होना चाहिए। प्रकृति की रक्षा ही सच्चा सांस्कृतिक संवर्धन है। वह दिन अवश्य आएगा, जब हमारी प्रकृति का संरक्षण होगा और हमारी संस्कृति समृद्ध बनेगी।

लेखक का परिचय

राजेन्द्र सिंह

राजेंद्र सिंह को वॉटरमैन ऑफ इंडिया के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने तरुण भारत संघ की स्थापना की। 2001 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए रमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो कि एशिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। राजेंद्र सिंह को स्टाकहोम में पानी का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाले स्टॉकहोम वाटर प्राइज से नवाजा जा चुका है।

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