विशाखापत्तनम। प्रख्यात पर्यावरणविद् और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. राजेंद्र सिंह ने विशाखापत्तनम की पहाड़ियों, जंगलों, जलाशयों और जलग्रहण क्षेत्रों पर मंडरा रहे पर्यावरणीय संकट को लेकर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विकास के नाम पर शहर की प्राकृतिक जल व्यवस्था से समझौता नहीं किया जा सकता। मुदासरलोवा और गंभीरम गेड्डा जलाशयों के पानी की एक बूंद भी स्थानीय लोगों और पर्यावरण की कीमत पर डेटा सेंटरों के लिए उपलब्ध नहीं कराई जानी चाहिए।
डॉ. राजेंद्र सिंह की विशाखापत्तनम यात्रा का उद्देश्य सिंहाचलम स्थित श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी देवस्थानम की पवित्र भूमि, मुदासरलोवा और गंभीरम गेड्डा जलाशयों तथा शहर की पहाड़ियों, वनों और जल प्रणालियों को संभावित पर्यावरणीय क्षति से बचाने के लिए आवाज उठाना था।
इस दौरान जल बिरादरी के राष्ट्रीय संयोजक और पर्यावरण कार्यकर्ता बोलिसेट्टी सत्यनारायण भी उनके साथ रहे। दोनों सिंहाचलम पहुंचे, जहां डॉ. राजेंद्र सिंह ने श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी के दर्शन कर विशेष पूजा-अर्चना की। इसके बाद उन्होंने पवित्र पहाड़ी की तलहटी में मीडिया से बातचीत की।
‘सरकार को प्रकृति की रक्षा करने की सद्बुद्धि दें’
मंदिर में प्रार्थना करते हुए डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा, “हे प्रभु श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी! विशाखापत्तनम में स्थित आपका पवित्र धाम, यहां के पर्वत, समुद्र, जंगल, जल और धरती सब आपकी सृष्टि हैं। प्रकृति ने हमें जो दिया है, उसे नष्ट करने वाले हम कौन होते हैं?”
उन्होंने कहा कि भगवान के नाम से जुड़ी पवित्र भूमि को डेटा सेंटर परियोजना के लिए निजी कंपनियों को आवंटित किया गया है। उन्होंने प्रार्थना की कि सत्ता में बैठे लोगों को यह समझने की सद्बुद्धि मिले कि उनकी जिम्मेदारी केवल विकास को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि पवित्र भूमि की रक्षा करना, पहाड़ियों की हरियाली बचाना, जल की शुद्धता बनाए रखना और जल संरचनाओं तथा जलग्रहण क्षेत्रों को सुरक्षित रखना भी है।
डॉ. सिंह ने कहा कि एक बार पहाड़ियां काट दी गईं, जंगल उजड़ गए और जलाशयों की प्राकृतिक व्यवस्था नष्ट हो गई, तो धन और आधुनिक तकनीक के सहारे भी उन्हें पुराने स्वरूप में लौटाना आसान नहीं होगा। जिस विकास से जीवन के आधारभूत प्राकृतिक संसाधन ही समाप्त हो जाएं, उसे सतत विकास नहीं कहा जा सकता।
मुदासरलोवा जलाशय विशाखापत्तनम की जीवनरेखा
मीडिया से बातचीत में डॉ. राजेंद्र सिंह ने मुदासरलोवा जलाशय के संरक्षण के लिए वर्षों पहले किए गए प्रयासों को याद किया। उन्होंने बताया कि करीब पांच-छह वर्ष पहले सरकार से बातचीत और स्थानीय समाज के सहयोग से इस जल संरचना को पानीदार बनाए रखने की दिशा में काम किया गया था।
उन्होंने कहा, “मुदासरलोवा विशाखापत्तनम की जीवनरेखा के समान है। इसे जीवित, स्वच्छ और पानीदार बनाए रखना बहुत जरूरी है।”
डॉ. सिंह ने आशंका जताई कि जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण, जंगलों की कटाई और पहाड़ियों को काटने की गतिविधियां प्राकृतिक जल व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।
उन्होंने बताया कि पहाड़ियों और वनस्पति के नष्ट होने से मिट्टी का कटाव बढ़ता है। बारिश के दौरान यह मिट्टी बहकर जलाशयों में पहुंचती है और गाद के रूप में जमा होने लगती है। इससे जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है। यदि यह प्रक्रिया जारी रही, तो भविष्य में इन महत्वपूर्ण जल संरचनाओं की पानी संचित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने चेताया कि प्रकृति अपनी व्यवस्था के ध्वस्त होने से पहले कोई चेतावनी-पत्र नहीं भेजती। जब तक पहाड़ी अपनी हरियाली खो देती है, जलग्रहण क्षेत्र नष्ट हो जाता है या जलाशय की भंडारण क्षमता घटने लगती है, तब तक नुकसान की भरपाई बेहद कठिन हो सकती है।
‘एक बूंद पानी भी डेटा सेंटरों के लिए नहीं’
डॉ. राजेंद्र सिंह ने जोर देकर कहा कि विशाखापत्तनम के लोगों और पर्यावरण की कीमत पर मुदासरलोवा या गंभीरम गेड्डा जलाशयों का पानी डेटा सेंटरों के लिए नहीं मोड़ा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शहर के जल संसाधनों पर पहला अधिकार स्थानीय लोगों, प्राकृतिक पारिस्थितिकी और आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों का है। किसी औद्योगिक या तकनीकी परियोजना को शहर की दीर्घकालिक जल सुरक्षा संकट में डालने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
उन्होंने नागरिकों से मुदासरलोवा सहित शहर की महत्वपूर्ण जल संरचनाओं के संरक्षण के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।
पर्यावरण संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी
डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा कि विशाखापत्तनम और आंध्र प्रदेश में पर्यावरण के प्रति चेतना जगाना किसी एक व्यक्ति या संगठन की जिम्मेदारी नहीं है। स्थानीय समाज, मीडिया, नागरिक संगठनों और प्रत्येक नागरिक को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।
उन्होंने कहा, “स्वस्थ जीवन के लिए स्वस्थ पर्यावरण हमारी पहली आवश्यकता है। यहां की पहाड़ियों को हरा-भरा रखना, जंगलों को बचाना, जलग्रहण क्षेत्रों को सुरक्षित रखना और जल संरचनाओं को स्वच्छ एवं पानीदार बनाए रखना हमारा सामूहिक संकल्प होना चाहिए।”
उन्होंने मीडिया से भी आग्रह किया कि वह विशाखापत्तनम की प्राकृतिक विरासत के सजग प्रहरी की भूमिका निभाए और पर्यावरणीय क्षति से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से सामने लाए।
पर्यावरण कानूनों और न्यायालय के निर्देशों का पालन हो
डॉ. राजेंद्र सिंह ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानूनों और उच्च न्यायालय के निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे कानून के अनुरूप पर्यावरण की रक्षा करें और यह सुनिश्चित करें कि डेटा सेंटर परियोजना से जुड़ी गतिविधियों के कारण प्रकृति को नुकसान न पहुंचे।
उन्होंने कहा कि यदि किसी कंपनी की गतिविधियों से पर्यावरणीय नुकसान होता है और कानून के तहत उसकी जिम्मेदारी निर्धारित होती है, तो उस नुकसान के परिणामों की जिम्मेदारी भी संबंधित कंपनी को उठानी होगी।
डॉ. सिंह ने निर्माण कार्यों से जुड़े पर्यावरणीय सवालों की सक्षम अधिकारियों से निष्पक्ष जांच कराने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि यदि जांच में पर्यावरणीय कानूनों या सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो तत्काल कानून के अनुरूप कार्रवाई की जानी चाहिए।
उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण को पत्र, तत्काल हस्तक्षेप की मांग
डॉ. राजेंद्र सिंह ने जल बिरादरी के राष्ट्रीय संयोजक बोलिसेट्टी सत्यनारायण को अपना पत्र आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं पर्यावरण और वन विभाग के प्रभारी मंत्री पवन कल्याण तथा वन विभाग के प्रमुख सचिव कांतिलाल दांडे तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी है।
बोलिसेट्टी सत्यनारायण अमरावती जाकर यह पत्र सौंपेंगे। इसके माध्यम से संबंधित अधिकारियों को डेटा सेंटर परियोजना के कारण सिंहाचलम की पवित्र भूमि, पहाड़ियों, जलग्रहण क्षेत्रों, जलाशयों और विशाखापत्तनम की दीर्घकालिक जल सुरक्षा को लेकर उठ रही चिंताओं से अवगत कराया जाएगा।
पत्र के जरिए सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की जाएगी, ताकि संभावित पर्यावरणीय नुकसान को रोका जा सके, लागू पर्यावरणीय कानूनों और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो तथा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को अपूरणीय क्षति से बचाया जा सके।
‘विशाखापत्तनम को जीवित रहने दें’
डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा कि उनकी यह यात्रा केवल किसी एक परियोजना के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि विकास के नाम पर प्रकृति और जीवनदायी संसाधनों को नष्ट करने के खतरों के प्रति चेतावनी है।
उन्होंने कहा कि विशाखापत्तनम की पहाड़ियां निर्माण के लिए खाली पड़ी जमीन नहीं हैं, इसके जलाशय उद्योगों के लिए पानी के असीमित स्रोत नहीं हैं और जंगल कंक्रीट की इमारतों के रास्ते में आने वाली बाधाएं नहीं हैं। इसी तरह, इसकी पवित्र भूमि को केवल व्यावसायिक संपत्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता।
उन्होंने कहा कि जल जीवन है, वन जीवन हैं और पहाड़ियां तथा जलग्रहण क्षेत्र हमारे अस्तित्व की प्राकृतिक नींव हैं।
डॉ. राजेंद्र सिंह ने आह्वान किया, “तकनीक आगे बढ़े, लेकिन प्रकृति भी जीवित रहे। विकास आगे बढ़े, लेकिन हमारे जलाशय भरे रहें, हमारी पहाड़ियां हरी-भरी रहें और हमारी पवित्र भूमि सुरक्षित रहे।”