समसामयिक स्वास्थ्य

मुनाफे का ऑपरेशन थियेटर और दवाओं की डकैती

मुनाफे का ऑपरेशन थियेटर और दवाओं की डकैती
महेंद्र कुमार कुशवाह

जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में कई गुना अंतर और गैर-जरूरी सर्जरी की बढ़ती शिकायतें स्वास्थ्य सेवाओं के कारोबारी स्वरूप को उजागर करती हैं। सवाल सिर्फ इलाज की महंगाई का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जिसमें मरीज के हितों पर मुनाफा भारी पड़ता दिखाई देता है। दवाओं की कीमतों से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक फैले इस गोरखधंधे की पड़ताल कर रहे हैं महेंद्र कुमार कुशवाह।


हाल ही में ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने आगाह किया है कि दुनियाभर में बेतहाशा गैर-जरूरी सर्जरियां की जा रही हैं, जबकि उनका इलाज दवाओं, फिजियोथैरेपी और सही जीवनशैली से संभव है। ब्रिटेन ने केवल कंधे और रीढ़ के अनावश्यक ऑपरेशनों को रोककर सालाना ₹1,269 करोड़ बचाए हैं। जबकि, भारत में गैर-जरूरी सर्जरियों का मकड़जाल तो फैला ही है, जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में 10 गुना (1000%) तक की मनमानी बढ़ोतरी ने देश की सबसे बड़ी अदालत को भी झकझोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी कि “कैंसर की दवाओं की ऊंची कीमत एक नरसंहार जैसी है,”  इस बात का प्रमाण है कि हमारी स्वास्थ्य सेवा अब सेवा नहीं, बल्कि एक व्यापारिक मशीन बन चुकी है।

सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष दवाओं की दरों, जेनेरिक दवाओं और मेडिकल उपकरणों से जुड़ी याचिकाओं पर खौफनाक सच सामने आया। कैंसर की एक जरूरी दवा, जिसकी थोक लागत महज ₹2,700 है, उस पर ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ (एमआरपी) ₹27,000 छापा जा रहा है। नाराजगी जताते हुए शीर्ष अदालत ने इसे “दिनदहाड़े डकैती” और “नरसंहार” करार दिया। जब जानलेवा बीमारी की दवा इतनी कम कीमत पर बन सकती है, तो लाचार मरीजों को लूटने के लिए इतनी भारी-भरकम ‘एमआरपी’ छापने की छूट किसने और क्यों दी? यह सिर्फ मुनाफाखोरी नहीं, बल्कि मौत के मुहाने पर खड़े इंसान की लाचारी पर किया गया संस्थागत हमला है।

कॉरपोरेट अस्पतालों की गुंडागर्दी और मरीज की मजबूरी

सुनवाई के दौरान दूसरा स्याह सच अस्पतालों की जबरन वसूली का सामने आया। कॉरपोरेट अस्पताल मरीजों को इस बात के लिए मजबूर करते हैं कि वे दवाएं और सर्जिकल सामान केवल अस्पताल की इन-हाउस फार्मेसी से ही खरीदें। अगर कोई बाहरी केमिस्ट वही दवा ₹2,700 में देने को तैयार भी हो, तो अस्पताल प्रशासन उसे स्वीकार नहीं करता। जस्टिस संदीप मेहता ने सही कहा कि इस संस्थागत दबाव से मरीज भ्रमित हो जाते हैं उन्हें लगता है कि बाहर सस्ती मिलने वाली दवा घटिया या नकली होगी। असल में दवा कंपनियां ‘एमआरपी’ बढ़ा-चढ़ाकर छाप ही इसलिए रही हैं, ताकि कॉरपोरेट अस्पतालों को भारी डिस्काउंट का लालच दिया जा सके और अस्पताल मरीज से पूरी मुद्रित कीमत वसूलकर अपनी तिजोरियां भर सकें। यह सीधे तौर पर मरीज की जेब पर डाका और उसके अधिकारों का हनन है।

मध्य भारत में सर्जरियों का कटघरा और कट-प्रैक्टिस

इस वित्तीय लूट का दूसरा सिरा अस्पतालों के ऑपरेशन थियेटर से जुड़ता है, जहां सर्जरी को एक मैकेनिकल टारगेट बना दिया गया है। ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5’ के आंकड़े बताते हैं कि ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के 10-15% के आदर्श मानक के मुकाबले मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के शहरी निजी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी 40 से 50% को पार कर चुकी है। सामान्य प्रसव की संभावना को जानबूझकर डरावना बनाकर गर्भवती महिलाओं को ऑपरेशन थियेटर में धकेल दिया जाता है, क्योंकि सर्जरी का पैकेज ज्यादा भारी होता है। गर्भाशय निकालने के मामलों में भी यही खेल है। मामूली समस्याओं पर भी 30-40 वर्ष की महिलाओं की बच्चादानी निकाल दी जाती है।

मध्‍यप्रदेश के इंदौर, भोपाल और जबलपुर के निजी अस्पतालों में रीढ़ की हड्डी और घुटने के प्रत्यारोपण की बाढ़-सी आ गई है। मुंबई के एक ‘सेकेंड-ओपिनियन’ संगठन का अध्ययन उजागर करता है कि 44% सर्जरियां और करीब 55% कार्डिएक (हार्ट) सर्जिकल सिफारिशें पूरी तरह से टाली जा सकती थीं। बुजुर्गों को फिजियोथैरेपी और दवाओं से ठीक करने के बजाय सीधे लाखों के प्रत्यारोपण पैकेज बेचे जा रहे हैं, क्योंकि डॉक्टरों पर प्रबंधन का ‘कन्वर्जन रेट’ का कॉरपोरेट दबाव है।

सरकारी खजाने पर डाका और मौतों का इतिहास

मुनाफे की यह हवस सिर्फ निजी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, यह सरकारी सिस्टम की नसों में भी जहर बनकर फैल चुकी है। 2014 में छत्तीसगढ़ के पंडरी (बिलासपुर) में नसबंदी शिविर के दौरान ‘टारगेट पूरा करने’ के प्रशासनिक दबाव में 13 गरीब महिलाओं की जान चली गई थी। यही नहीं, ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना’ के दौर में कई निजी अस्पतालों ने सरकारी क्लेम हड़पने के लिए गरीब आदिवासी महिलाओं के बेवजह गर्भाशय तक निकाल दिए थे।

सुप्रीमकोर्ट ने इस आर्थिक डकैती के दूसरे पहलू पर भी सवाल उठाया है। अगर मरीज ‘आयुष्मान भारत’ जैसी सरकारी योजना के तहत इलाज करा रहा है, तो इस 10 गुना बढ़ी कीमत का भुगतान कौन करता है? जवाब स्पष्ट है – देश का सरकारी खजाना और टैक्सपेयर्स का पैसा।

फार्मास्यूटिकल्स विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कैंसर-रोधी दवाओं का कारोबार तीन साल में 56% बढ़कर ₹3,382 करोड़ (2021-22) से ₹5,281 करोड़ (2024-25) हो गया। जब सरकार निजी अस्पतालों के इन फूले हुए क्लेम्स को पास करती है, तो जनता के टैक्स का पैसा सीधे कॉरपोरेट घरानों की तिजोरियों में चला जाता है।

कर्ज के दलदल में डूबता मध्यमवर्ग

भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला 60% से अधिक खर्च मरीजों को अपनी जेब से उठाना पड़ता है। किसी मध्यमवर्गीय या ग्रामीण परिवार के लिए कैंसर की बीमारी या एक गैर-जरूरी बड़ा ऑपरेशन जीवनभर की जमापूंजी को एक झटके में लील जाता है। अपनों को बचाने के लिए लोग जमीन, मकान और गहने बेचने या सूदखोरों के चंगुल में फंसने को मजबूर हैं। एक अनावश्यक पर्चा या फर्जी सर्जरी हंसते-खेलते परिवार को सीधे गरीबी रेखा के नीचे धकेल देती है।

नियामक तंत्र की विफलता और जरूरी हंटर

‘राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण’ का ‘ड्रग्स प्राइस ऑर्डर-2013’ पूरी तरह से पंगु साबित हो रहा है। मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था केवल ‘नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स’ की अनुसूचित दवाओं पर लागू होती है, जिनकी बाजार हिस्सेदारी 20% से भी कम है। शेष 80% गैर-अनुसूचित दवाएं नियंत्रण से बाहर हैं, जहां कंपनियां और अस्पताल मनमानी कीमतें तय करने के लिए आजाद हैं।

इस चिकित्सा अराजकता पर अब तुरंत हंटर चलाने की जरूरत है :

‘क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ का सख्ती से पालन: मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित सभी राज्यों को इस कानून को मुस्तैदी से जमीन पर उतारना होगा, ताकि अस्पतालों के चार्ज और कार्यप्रणाली को नियंत्रित किया जा सके।

पारदर्शी सर्जिकल और प्राइस ऑडिट: हर अस्पताल में स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य हो, जो यह जांचे कि की गई सर्जरी कितनी जरूरी थी। सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के अनुसार रिटेलर मार्जिन की अधिकतम सीमा (16%) तय की जाए।

इन-हाउस फार्मेसी की अनिवार्यता पर रोक: मरीजों को बाहर से दवा खरीदने की पूरी आजादी हो। मजबूरी का फायदा उठाकर इन-हाउस फार्मेसी से दवा थोपने वाले अस्पतालों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।

सख्त जेनेरिक दवा नीति: डॉक्टरों के लिए ब्रांडेड के बजाय सादे साल्ट नाम लिखना अनिवार्य किया जाए। कट-प्रैक्टिस और कमीशनखोरी में लिप्त डॉक्टरों व सर्जनों के लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाएं।

यदि डॉक्टरों की कलम सस्ती जेनेरिक दवाएं लिखने के बजाय 10 गुना महंगी ब्रांडेड दवाएं थोपने और शरीर पर बेवजह चीरा लगाने के लिए ही चलती रही, तो यह समाज का नैतिक पतन होगा। अब वक्त आ गया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था को इस व्यापारिक तंत्र से उखाड़कर वापस मानवीय सेवा के मार्ग पर लाया जाए, वरना इलाज का यह संगठित गिरोह इंसानी जिंदगियों का सौदा यूं ही करता रहेगा। (सप्रेस)

लेखक का परिचय

महेंद्र कुमार कुशवाह

वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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