कैंसर से बचाव के लिए जागरुकता की जरुरत                 

हर वर्ष 7 नवंबर को राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है, क्योंकि कैंसर भारत सहित विश्व में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक बन चुका है। राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री के अनुसार भारत में जीवनभर में 11 प्रतिशत लोगों में कैंसर का जोखिम है। खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में इसकी दर अधिक और उपचार व जागरूकता अब भी चुनौती है।

November 7: National Cancer Awareness Day

अरविंद जयतिलक

7 नवबंर को  राष्ट्रीय कैंसर जागरुकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। कैंसर भारत सहित दुनिया भर में गैर-संचारी रोगों की वजह से होने वाली बीमारियों एवं मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। भारत में कैंसर का खतरा लगातार बढ़ रहा है। राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यालय (एनसीआरपी) की हालिया स्टडी के अनुसार भारत में जीवनभर में 11 फीसदी लोगों को कैंसर होने का जोखिम है।

देश की ही बात करें तो मिजोरम की राजधानी आइजोल कैंसर में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है। यहां हर एक लाख पुरुषों में लगभग 256 और एक लाख महिलाओं में 217 लोगों को कैंसर हो रहा है। इसके विपरित सबसे कम दर महाराष्ट्र के उस्मानाबाद और बीड जिलों में दर्ज की गई है, जहां हर एक लाख पुरुषों में मात्र 37 कैंसर के मामले पाए गए हैं। महिलाओं में सबसे कम दर असम के दीमा जिले में है जहां हर एक लाख महिलाओं में मात्र 28 मरीज मिले। क्षेत्रीय तुलना करें तो पूर्वोत्तर भारत के छह जिले शीर्ष पर रहे। राजधानी दिल्ली में हर एक लाख पुरुषों में करीब 147 मामले कैंसर के मिले। यह राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। गत वर्ष पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वैश्विक स्तर पर लगभग 18 मिलियन मामले कैंसर से संबंधित थे जिनमें से 1.5 मिलियन मामले अकेले भारत से थे।

गत वर्ष पहले आईसीएमआर और बंगलूरु स्थित राष्ट्रीय रोग सूचना एवं अनुसंधान केंद्र (एनसीडीआईआर) द्वारा भी खुलासा किया गया था कि देश में कैंसर के मामले में अगले पांच वर्ष में 12 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी हो सकती है। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम रिपोर्ट 2020 के अनुसार भारत में सालाना होने वाली कुल मौतों में से 6 फीसदी मौतें कैंसर की वजह से होती है। गौर करें तो भारत में कैंसर की प्रमुख वजहों में अशिक्षा, कुपोषण, गरीबी, कम उम्र में विवाह, महिलाओं का बार-बार गर्भवती होना और खराब सेहत है। अगर इस दिशा में सुधार के कदम उठाएं जाए तो परिणाम बेहतर हो सकते हैं।

See also  व्‍यारा के सरकारी अस्‍पताल और मेडिकल कॉलेज के निजीकरण के खिलाफ आदिवासियों का विरोध, राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उठी आवाज़

विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के उपचार के विकल्प को मात्र तीन तरीके से पाटा जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले वैश्विक समुदाय को विकासशील देशों में कैंसर की जांच के लिए कार्यक्रम चलाने में मदद देनी चाहिए। इसके तहत रेडियोथेरेपी मशीनें उपलब्ध कराने के साथ ही भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की तरह आम लोगों के लिए बुनियादी स्वास्थ्य बीमा को अपनाने का बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हर साल कैंसर के उपचार में पूरी दुनिया में 320 अरब डॉलर का निवेश किया जाता है तो कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या आधी हो जाएगी। अगर सर्वाइकल व स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाएं समय रहते पपानीकोलाउ (पैप) स्मीयर और मैमोग्राम स्क्रीनिंग टेस्ट कराकर तुरंत इलाज कराएं तो इस भयंकर बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। आईएमआरसी के मुताबिक बेहतर उपचार होने की स्थिति में बचने वाले पांच मरीजों में से चार विकासशील देशों के होंगे।

विडंबना है कि कैंसर पीड़ित मरीजों विशेषकर महिलाओं में इस भयावह बीमारी को लेकर जागरुकता का घोर अभाव है और दूसरा तथ्य यह भी कि उन्हें समय पर इलाज भी नहीं मिल रहा है। भारत की बात करें तो 17.5 लाख कैंसर के नए मामले हर वर्ष सामने आते हैं।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हर आठ मिनट में ग्रीवा के कैंसर से एक महिला की मौत होती है। हर दिन 2500 लोगों की मौत तंबाकू सेवन से उपजे कैंसर के कारण होती है। 19 वर्ष की उम्र तक हर वर्ष 50 हजार बच्चे कैंसर के शिकार होते हैं। 20 हजार बच्चे इलाज के अभाव में और 30 फीसदी बच्चे जांच न हो पाने के कारण दम तोड़ देते हैं।

अच्छी बात यह है कि 2016-18 के दौरान ‘वी कैन, आई कैन’ की थीम निर्धारित किया गया उसे लेकर जागरुकता बढ़ी है। इसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के सामूहिक व व्यक्तिगत स्तर पर वैश्विक रुप से कैंसर की रोकथाम की दिशा में प्रयास करना है। देखा भी जा रहा है कि इस थीम के तहत लोगबाग अपनी जीवनशैली को स्वस्थ रखकर तथा परिवार एवं समुदाय को इसके प्रति जागरुक रखकर कैंसर की रोकथाम और उससे बचाव की दिशा में अहम योगदान कर रहे हैं। यह इसलिए भी आवश्यक है कि गत वर्ष अमेरिकन कैंसर सोसायटी और प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट ने दावा किया था कि 2030 तक कैंसर से होने वाली मौतों में 60 प्रतिशत का इजाफा होगा। उसने यह भी कहा था कि कैंसर से सालाना 55 लाख महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है।

See also  भोपाल गैस कांड : महिलाएँ अब भी झेल रही हैं अदृश्य ज़हर का असर

दरअसल विशेषज्ञों ने शोध में पाया है कि वर्तमान समय में दुनिया की प्रत्येक 7 महिलाओं की मौतों में एक की मौत कैंसर से हो रही है। एक अन्य शोध से उद्घाटित हुआ है कि 2030 तक सर्वाइकल (बच्चेदानी का मुंह) कैंसर से पीडित महिलाओं की संख्या में 25 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। उल्लेखनीय है कि मौजूदा समय में सर्वाइकल कैंसर की चपेट में आकर हर साल दुनिया में तकरीबन 2 लाख 75 हजार महिलाओं की मौत हो रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो सर्वाइकल कैंसर के कारण दम तोड़ने वाली महिलाओं की 85 फीसदी आबादी केवल विकासशील देशों से है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि 2012 में कैंसर के लगभग एक करोड़ 40 लाख मामले उजागर हुए जिसमें 82 लाख लोगों की मौत हुई। इनमें एक करोड़ चालीस लाख मामलों में 60 प्रतिशत से अधिक लोग अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के रहने वाले थे। कैंसर के कारण मरने वाले 70 फीसदी से अधिक लोग इन्हीं तीन महाद्वीपों के होते हैं। चिंता की बात यह भी कि कैंसर से पीड़ित महिलाओं के सर्वाधिक मामले भी गरीब देशों में ही देखे जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक विगत वर्षों में महिलाओं के कैसर के मामलों में 56 फीसदी और 64 फीसदी मौतें गरीब देशों में हुई।

उल्लेखनीय तथ्य यह कि गरीब देशों में कैंसर से होने वाली कुल मौतों में दो तिहाई स्तन कैंसर और 10 में से 9 सर्वाइकल कैंसर से होती है। शोधकर्ताओं की मानें तो तेजी से होते आर्थिक बदलाव से बढ़ती शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित खुराक, मोटापा और प्रजनन कारकों के चलते गरीब देशों में कैंसर पीड़ित महिलाओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। अगर नियमित शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा दिया जाए तो इससे शरीर संतुलित रहेगा और एक तिहाई कैंसर के मामले रोके जा सकते हैं।

See also  अनिद्रा से बिगड़ता स्वास्थ्य

‘इंडस हेल्थ प्लस’ की रिपोर्ट की मानें तो शहरों में बढ़ते हुए मोटापे के कारण 10 से 12 फीसदी जनसंख्या पेट के कैंसर के जोखिम के दायरे में आ गयी है। 25 से 30 वर्ष के आयु वर्ग की 17 फीसदी जनसंख्या में धुम्रपान एवं तंबाकू के सेवन के कारण मुख एवं फेफड़े के कैंसर का उच्च स्तरीय खतरा बन गया है। चिकित्सकों का कहना है कि एक तिहाई से ज्यादा कैंसर तंबाकू या उससे बने उत्पादों के सेवन की देन है जबकि एक तिहाई खान-पान व रहन-सहन या दूसरे कारणों हो होते हैं। जहां तक महिलाओं द्वारा तंबाकू का सेवन का सवाल है तो इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। लेकिन महिलाओं को तंबाकू के सेवन से बचना चाहिए। क्योंकि उनका शरीर तंबाकू के प्रति उच्च संवेदनशील होता है। तंबाकू के सेवन से उनमें सर्वाइकल कैंसर का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। तंबाकू के सेवन के अलावा घर व बाहर का वायु प्रदूषण भी कैंसर के बढ़ते खतरे का शबब बनता जा रहा है।

विश्व कैंसर दिवस के संस्थापक ‘यूनियन फॉर इंटरनेशनल कैंसर कंट्रोल का दावा है कि विकासशील देश में फैली कैंसर की बीमारी उपचार के विकल्प की कमियों का नमूना भर है। यूनियन का कहना है कि अगर ‘एचपीवी टीका’ को कैंसर के मरीजों के बीच अच्छी तरह वितरित किया जाए और जागरुकता प्रसारित किया जाए तो सर्वाइकल कैंसर को समाप्त किया जा सकता है। लेकिन विकासशील देशों की इस टीके तक पहुंच ही नहीं है जिसके कारण कैंसर पीड़ितों की मौत का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है।   

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »