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मध्यप्रदेश में पर्यावरणीय संकट पर एडीबी और विश्व बैंक से हस्तक्षेप की मांग, प्रभावित परियोजनाओं का वित्त रोकने की अपील

मध्यप्रदेश में पर्यावरणीय संकट पर एडीबी और विश्व बैंक से हस्तक्षेप की मांग, प्रभावित परियोजनाओं का वित्त रोकने की अपील

पर्यावरण जानकार डॉ. ओ.पी. जोशी ने 21 प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों को उठाते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की

इंदौर, 14 अक्‍टूबर। मध्यप्रदेश में विकास परियोजनाओं के कारण पेड़ों की कटाई, वन क्षेत्रों पर प्रभाव, नदियों और जलाशयों का प्रदूषण, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को नुकसान, पेयजल सुरक्षा तथा जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों को लेकर पर्यावरण जानकार डॉ. ओ.पी. जोशी ने एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और विश्व बैंक समूह के अध्यक्षों को जनहित में विस्तृत अभ्यावेदन भेजा है। 12 अक्टूबर 2026 के इस अभ्यावेदन में मांग की गई है कि राज्य में इन संस्थाओं से वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली संबंधित परियोजनाओं की स्वतंत्र पर्यावरणीय एवं सामाजिक जांच कराई जाए तथा जहां गंभीर उल्लंघन या अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति का वास्तविक खतरा सामने आए, वहां जांच पूरी होने और कमियों को दूर किए जाने तक आगे की वित्तीय किस्तों को रोकने पर विचार किया जाए।

अभ्यावेदन में स्पष्ट किया गया है कि सड़क, मेट्रो, पुल, सिंचाई, नगरीय विकास और अन्य आधारभूत संरचनाओं का निर्माण आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन विकास के नाम पर पर्यावरणीय संतुलन, नागरिकों के स्वास्थ्य, प्राकृतिक संसाधनों और प्रभावित समुदायों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। यह मांग सभी विकास योजनाओं का वित्त बंद करने की नहीं, बल्कि गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक अनियमितताओं से प्रभावित परियोजनाओं की समीक्षा तथा आवश्यक सुधार सुनिश्चित करने की है।

O P Joshi

उल्‍लेखनीय है कि डॉ. ओ पी जोशी जाने-माने पर्यावरणविद्, स्वतंत्र लेखक और शिक्षाविद् हैं। संप्रति इंदौर के गुजराती विज्ञान महाविद्यालय के प्राचार्य रहे है। वे मध्‍यप्रदेश व इंदौर शहर में पेड़ों की कटाई और पर्यावरणीय नुकसान का लगातार हिसाब रखते हैं तथा विभिन्न सामाजिक एवं पर्यावरण संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। वे पर्यावरण के मुद्दों पर नियमित लेखन करते हैं। अपने अध्ययन और अध्यापन काल से ही पेड़ों और पर्यावरण के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहे हैं और आज भी उतनी ऊर्जा से पर्यावरण संरक्षण के कार्य में लगे हैं। उनकी अब तक 8 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो सभी पर्यावरण और पेड़-पौधों पर हैं। पेड़ों के विभिन्न आयामों पर उनकी पुस्तक ‘बहु आयामी पेड़’ काफी चर्चित रही है।

रानी सराय के पेड़ों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास का मुद्दा प्रमुखता से उठाया

अभ्यावेदन में इंदौर मेट्रो रेल परियोजना के अंतर्गत रानी सराय क्षेत्र के पेड़ों को हटाए जाने की प्रस्तावित कार्रवाई और वहां रहने वाले तोतों सहित अन्य पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की गई है। इस विषय का उल्लेख मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित डब्ल्यू.पी. (पीआईएल) क्रमांक 954/2026, प्रियांशु जैन विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के संदर्भ में किया गया है।

आवेदन में एडीबी से अनुरोध किया गया है कि वह परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, पेड़ों को बचाने के वैकल्पिक मार्गों और निर्माण योजनाओं, संबंधित अनुमतियों तथा पर्यावरणीय सुरक्षा शर्तों की समीक्षा कराए। साथ ही, विवादित क्षेत्र में ऐसी कार्रवाई, जिससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो सकती है, को स्वतंत्र आकलन तक रोकने या पुनर्विचार करने की मांग की गई है, बशर्ते ऐसा करना लागू कानून और न्यायालय के आदेशों के अनुरूप हो।

अभ्यावेदन में यह भी कहा गया है कि पुराने और बड़े पेड़ों का महत्व केवल उनकी संख्या तक सीमित नहीं है। वे पक्षियों के घोंसलों, जैव विविधता, भूजल पुनर्भरण, कार्बन अवशोषण और स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरी जगह पौधे लगा देने से परिपक्व पेड़ों के पारिस्थितिक योगदान की तत्काल भरपाई नहीं हो सकती।

दूषित पेयजल और नदियों के प्रदूषण पर चिंता

इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल की घटना का उल्लेख करते हुए अभ्यावेदन में पेयजल की गुणवत्ता, सीवेज मिश्रण, पाइपलाइन रखरखाव, जल परीक्षण और नगर निकायों की जवाबदेही की समीक्षा की मांग की गई है। इसमें प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर इस घटना से संबंधित 24 मौतों का उल्लेख किया गया है। हालांकि, मौतों के कारणों और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण आधिकारिक जांच और न्यायिक अभिलेखों के आधार पर किए जाने की आवश्यकता बताई गई है।

अभ्यावेदन में खान नदी और क्षिप्रा नदी में प्रदूषण का मुद्दा भी उठाया गया है। इसमें अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और अन्य प्रदूषकों के नदी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच कराने की मांग की गई है। उज्जैन में वर्ष 2028 में प्रस्तावित सिंहस्थ को देखते हुए क्षिप्रा नदी की स्वच्छता, सीवेज उपचार, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण और नदी सफाई योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने पर विशेष जोर दिया गया है।

सिंहस्थ 2028 की परियोजनाओं में पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग

उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत सड़क, पुल, परिवहन मार्ग, घाट, सीवेज व्यवस्था और शहरी विकास से जुड़े विभिन्न कार्य किए जा रहे हैं। अभ्यावेदन में उज्जैन-जावरा ग्रीनफील्ड मार्ग, सिंहस्थ बायपास, हरिफाटक पुल तथा संबंधित आधारभूत संरचना परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जहां एडीबी या विश्व बैंक की वित्तीय सहायता का संबंध स्थापित हो, वहां इन परियोजनाओं की पर्यावरणीय और सामाजिक सुरक्षा शर्तों की समीक्षा की जानी चाहिए।

इस समीक्षा में पेड़ों की कटाई, भूमि अधिग्रहण, प्रभावित लोगों को मुआवजा, ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण, निर्माण मलबे का निपटान, ध्वनि प्रदूषण, जल निकासी और जनसुनवाई जैसे विषय शामिल करने का अनुरोध किया गया है। अभ्यावेदन में कहा गया है कि सिंहस्थ की तैयारियों की समयसीमा को पर्यावरणीय नियमों और नागरिकों के वैधानिक अधिकारों की अनदेखी का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

वन क्षेत्रों, सिंचाई परियोजनाओं और वन्यजीव संरक्षण पर भी सवाल

मध्यप्रदेश में वन भूमि के उपयोग, बांधों, जलाशयों, सिंचाई योजनाओं और खनन गतिविधियों से होने वाले संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की जांच की मांग की गई है। इसमें मोरंड-गंजाल सिंचाई परियोजना और केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का विशेष उल्लेख है।

अभ्यावेदन में वन स्वीकृतियों, जैव विविधता आकलन, वन्यजीव गलियारों, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे और जहां लागू हो वहां ग्रामसभा की प्रक्रियाओं के अनुपालन का सत्यापन करने का अनुरोध किया गया है। पन्ना क्षेत्र सहित महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों पर परियोजनाओं के संभावित प्रभावों का भी स्वतंत्र आकलन कराने की मांग की गई है।

इसके अतिरिक्त, सतपुड़ा और मध्य भारत के अन्य वन क्षेत्रों में सड़क, बांध, खनन तथा औद्योगिक परियोजनाओं के कारण वन्यजीवों के आवागमन और प्राकृतिक आवासों के बीच संपर्क प्रभावित होने की आशंका पर ध्यान देने को कहा गया है।

भोपाल और इंदौर की झीलों तथा प्राकृतिक जल निकासी तंत्र के संरक्षण की मांग

अभ्यावेदन में भोपाल की भोज वेटलैंड, बड़ा तालाब और छोटा तालाब, शाहपुरा झील तथा इंदौर की बिलावली झील और उसके जलग्रहण क्षेत्र का उल्लेख किया गया है। इन जलस्रोतों के आसपास अतिक्रमण, सीवेज प्रवाह, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था से संबंधित शिकायतों की समीक्षा करने का अनुरोध किया गया है।

अभ्यावेदन के अनुसार, तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण प्राकृतिक जल निकासी मार्गों, हरित क्षेत्रों और कृषि भूमि पर दबाव बढ़ सकता है। इससे जलभराव, बाढ़, भूजल स्तर में गिरावट और स्थानीय पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होने का खतरा रहता है। इसलिए संबंधित वित्तपोषित परियोजनाओं में पर्यावरणीय स्वीकृतियों और जल संरक्षण संबंधी शर्तों के पालन का सत्यापन आवश्यक बताया गया है।

कटनी में एस्बेस्टस अपशिष्ट और रीवा में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र का मुद्दा

कटनी जिले के कैमोर और कलहरा क्षेत्रों में एस्बेस्टस अपशिष्ट तथा संभावित मिट्टी और भूजल प्रदूषण से जुड़ी वर्ष 2026 की प्रकाशित रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। अभ्यावेदन में अपशिष्ट के सुरक्षित भंडारण, स्थानीय निवासियों और श्रमिकों के संभावित संपर्क, सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी जोखिम तथा आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की समीक्षा का अनुरोध है।

इसी प्रकार, रीवा जिले के रोजहौही गांव में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए प्रारंभिक स्थल जांच के विरोध से संबंधित रिपोर्टों का उल्लेख किया गया है। मांग की गई है कि संबंधित परियोजना को किसी प्रकार की विकास वित्तीय सहायता प्राप्त होने की स्थिति में भूगर्भीय परिस्थितियों, जल उपलब्धता, पर्यावरणीय प्रभावों, आपातकालीन तैयारी, भूमि संबंधी आवश्यकताओं और स्थानीय नागरिकों की चिंताओं का उचित आकलन किया जाए।

खनन, औद्योगिक प्रदूषण और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की समीक्षा

अभ्यावेदन में खनन, पत्थर क्रशर, रेत उत्खनन, औद्योगिक उत्सर्जन और निर्माण गतिविधियों से उत्पन्न धूल तथा शोर को भी महत्वपूर्ण पर्यावरणीय समस्याओं के रूप में रेखांकित किया गया है। इंदौर, भोपाल, सिंगरौली और कटनी सहित विभिन्न क्षेत्रों में संबंधित परियोजनाओं की प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था, वायु गुणवत्ता, जल प्रदूषण, अपशिष्ट निस्तारण और पर्यावरणीय निगरानी की जांच कराने की मांग की गई है।

नगरपालिका ठोस कचरे, औद्योगिक अपशिष्ट और खतरनाक पदार्थों के अनुचित निस्तारण से मिट्टी तथा भूजल के दूषित होने की आशंका पर भी ध्यान दिलाया गया है। अभ्यावेदन में लैंडफिल की संरचना, दूषित तरल अपशिष्ट के उपचार, भूजल परीक्षण, खतरनाक अपशिष्ट के सुरक्षित निपटान और प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास संबंधी उपायों की समीक्षा करने का अनुरोध है।

जलवायु परिवर्तन, किसानों और जल सुरक्षा को लेकर विस्तृत मांग

अभ्यावेदन में मई 2018 में प्रकाशित रिपोर्टों में मध्यप्रदेश के तापमान और वर्षा संबंधी जलवायु अनुमानों का भी उल्लेख किया गया है। इन ऐतिहासिक अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2030 तक राज्य के औसत तापमान में लगभग 1.8 से 2 डिग्री सेल्सियस तथा वर्ष 2080 तक लगभग 3.4 से 4.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की संभावना बताई गई थी। अभ्यावेदन में स्पष्ट किया गया है कि इन अनुमानों का वर्तमान वैज्ञानिक आकलन और अद्यतन जलवायु मॉडल के आधार पर सत्यापन किया जाना आवश्यक है।

इस विषय में विशेष रूप से मालवा क्षेत्र में शीतकालीन वर्षा में संभावित बदलाव, मानसून के वितरण, कृषि उत्पादन, सिंचाई की जरूरतों, भूजल उपलब्धता और किसानों की आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों की समीक्षा करने का अनुरोध किया गया है।

एडीबी और विश्व बैंक से मांग की गई है कि उनकी सहायता से संचालित संबंधित परियोजनाओं में जलवायु जोखिम का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। इसमें वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र का विकास, जलाशयों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जल-कुशल सिंचाई, उपयुक्त फसल विविधीकरण और जलवायु अनुकूल कृषि उपायों को शामिल किया जाए। साथ ही, परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन केवल अलग-अलग निर्माण स्थलों तक सीमित न रखकर पूरे क्षेत्र और जलग्रहण तंत्र के स्तर पर भी किया जाए।

भूमि अधिग्रहण, मुआवजा और जनसुनवाई पर जोर

अभ्यावेदन में कहा गया है कि बड़ी विकास परियोजनाओं से किसान, आदिवासी समुदाय, वन आधारित आजीविका पर निर्भर परिवार, छोटे व्यापारी और शहरी निवासी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए संबंधित परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण, मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन संबंधी लागू कानूनी प्रावधानों के अनुपालन का सत्यापन किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की रिपोर्टों को सार्वजनिक करने, प्रभावित नागरिकों को सार्थक जनसुनवाई का अवसर देने, उनकी आपत्तियों पर विचार करने और शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की गई है। स्कूलों, अस्पतालों, आवासीय क्षेत्रों और धार्मिक स्थलों के निकट निर्माण कार्यों में ध्वनि, धूल और कंपन को नियंत्रित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।

एडीबी और विश्व बैंक के समक्ष प्रमुख मांगें

श्री ओ.पी. जोशी के अभ्यावेदन में कुल 21 प्रमुख विषयों के आधार पर निम्नलिखित कार्रवाई का अनुरोध किया गया है:

1. मध्यप्रदेश में दोनों संस्थाओं से वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली संबंधित परियोजनाओं की स्वतंत्र और जोखिम आधारित पर्यावरणीय एवं सामाजिक जांच कराई जाए।

2. जिन परियोजनाओं में गंभीर सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के विश्वसनीय साक्ष्य हों अथवा अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति का पर्याप्त खतरा बना हो, वहां लागू वित्तपोषण समझौतों और संस्थागत नीतियों के अनुसार आगे की वित्तीय किस्तें रोकी जाएं।

3. प्रभावित परियोजनाओं के नए वित्तीय अनुमोदनों पर, जहां नियमों के अंतर्गत उचित हो, जांच पूरी होने तक रोक लगाने पर विचार किया जाए।

4. संबंधित एजेंसियों से पर्यावरणीय स्वीकृतियों, वित्तीय सहायता, परियोजना की स्थिति, निगरानी रिपोर्टों और सुधारात्मक कार्ययोजनाओं का विवरण सार्वजनिक करने का अनुरोध किया जाए।

5. रानी सराय के पक्षी आवास, नदियों, झीलों, वनों, पेड़ों और अन्य संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों का स्वतंत्र वैज्ञानिक आकलन कराया जाए।

6. जलवायु परिवर्तन, जल सुरक्षा, कृषि की संवेदनशीलता, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक जल निकासी से जुड़े जोखिमों की अद्यतन समीक्षा की जाए।

7. जहां अनियमितताएं प्रमाणित हों, वहां समयबद्ध सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए तथा पात्र शिकायतों को संबंधित स्वतंत्र जवाबदेही तंत्र के समक्ष रखा जाए।

8. अभ्यावेदन की प्राप्ति की पुष्टि, शिकायत संदर्भ संख्या, जिम्मेदार कार्यालय और प्रस्तावित कार्रवाई सहित लिखित उत्तर उपलब्ध कराया जाए।

विकास के विरोध में नहीं, पर्यावरणीय जवाबदेही के पक्ष में अभ्यावेदन

अभ्यावेदन के अंतिम भाग में डॉ; जोशी ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य मध्यप्रदेश में विकास कार्यों या राज्य को मिलने वाली समस्त वित्तीय सहायता को बंद कराना नहीं है। उनका आग्रह केवल उन परियोजनाओं की समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई से संबंधित है, जिनमें गंभीर पर्यावरणीय अथवा सामाजिक सुरक्षा संबंधी समस्याएं अनसुलझी हों।

उन्होंने कहा है कि मध्यप्रदेश को आधारभूत संरचना, आर्थिक प्रगति और सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ सुरक्षित पेयजल, स्वच्छ नदियां, संरक्षित वन, परिपक्व वृक्ष, स्वस्थ वायु, वन्यजीव संरक्षण और प्रभावित नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

अभ्यावेदन के साथ उच्च न्यायालय में लंबित मामले से संबंधित दस्तावेज, मेट्रो परियोजना के अभिलेख एवं पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, वन और पर्यावरणीय स्वीकृतियों से जुड़े दस्तावेज, पेयजल प्रदूषण और नदी प्रदूषण संबंधी रिपोर्टें, सिंहस्थ 2028 की परियोजनाओं के अभिलेख तथा जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रकाशित सामग्री संलग्न किए जाने का उल्लेख है।

अब इस अभ्यावेदन पर एडीबी और विश्व बैंक की ओर से क्या कार्रवाई की जाती है, यह उनके अधिकार क्षेत्र, संबंधित परियोजनाओं के वित्तपोषण संबंधी अभिलेखों, लागू सुरक्षा नीतियों और स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा। फिलहाल, इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय सुरक्षा, वैज्ञानिक मूल्यांकन, पारदर्शिता और जनहित को उचित महत्व मिले।

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