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नदी की गाद नहीं, उसके संतुलन को समझिए

नदी की गाद नहीं, उसके संतुलन को समझिए
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बिहार की नई गाद प्रबंधन नीति ने नदियों से गाद निकालने की बहस को फिर सामने ला दिया है। सवाल यह नहीं कि नदी में कितनी गाद है, बल्कि यह है कि वह आई कहां से, जमा क्यों हुई और उसे हटाने का नदी के प्रवाह व पारिस्थितिकी पर क्या असर होगा। वैज्ञानिक समझ के बिना ड्रेजिंग समाधान के बजाय नई समस्या बन सकती है।


22 से 26 सितम्बर : 9वां अंतर्राष्ट्रीय जल सप्ताह

नदी में गाद है तो क्या नदी गंदी है? अगर गाद नदी की बीमारी है तो हर साल उसे निकाल देने के बाद बीमारी लौट क्यों आती है? और अगर गाद नदी की स्वाभाविक यात्रा का हिस्सा है तो उसे हटाने से पहले यह कौन तय करेगा कि कहां से कितनी गाद निकले और कहां उसे बहने दिया जाए?

बिहार सरकार ने हाल में ‘बिहार जलस्रोत पुनर्स्थापन एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026’ को मंजूरी दी है। नदियों, बराजों और जलाशयों से गाद हटाकर उनकी जलधारण और प्रवाह क्षमता बहाल करने तथा निकाली गई गाद का इस्तेमाल सड़क, रेल, सिंचाई, बाढ़ सुरक्षा और निर्माण कार्यों में भराव के रूप में करने की बात नीति में है। बिहार जैसे बाढ़ग्रस्त राज्य में ऐसी नीति की जरूरत समझ में आती है। लेकिन नदी से गाद निकालना केवल मशीन, मजदूर और ट्रक का हिसाब नहीं है। यह नदी की प्रकृति, उसके प्रवाह, भूगोल और पारिस्थितिकी को समझने का सवाल है। नदी को नाले की तरह साफ नहीं किया जा सकता।

यहीं 2017 की माधव चितले समिति की रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो जाती है। केंद्र सरकार ने गंगा में भीमगौड़ा से फरक्का तक गाद प्रबंधन और ड्रेजिंग के सवाल पर यह समिति बनाई थी। समिति ने स्पष्ट किया था कि गाद का क्षरण, परिवहन और जमाव अत्यंत जटिल प्रक्रियाएं हैं और क्षेत्र-विशेष के अनुसार बदलती हैं। इसलिए पूरे नदी तंत्र के लिए एक ही तरह का समाधान नहीं हो सकता।

इसका सीधा अर्थ है—नदी में जहां गाद दिखाई दे रही है, समस्या जरूरी नहीं कि वहीं पैदा हुई हो। गाद पहाड़ों से आ सकती है, जलग्रहण क्षेत्र से आ सकती है। जंगलों की कटाई, खेती के तौर-तरीकों, खनन, तटों के इस्तेमाल, बांधों और जलाशयों से उसका रास्ता और मात्रा बदल सकती है। नदी पानी के साथ मिट्टी लेकर चलती है और जहां प्रवाह की गति या दिशा बदलती है, वहां उसे छोड़ देती है। इसलिए गाद को देखने से पहले उसकी यात्रा देखनी होगी। गाद कहां से आई? कहां रुकी? क्यों रुकी? कितना हिस्सा आगे जाएगा? और अगर उसे यहां से निकाल दिया गया तो अगली बरसात में वह कहां जमा होगी?

इन सवालों के बिना ड्रेजिंग नदी-विज्ञान नहीं, नदी पर किया गया एक प्रयोग बन सकती है। चितले समिति ने बिना वैज्ञानिक आधार के बड़े पैमाने पर गाद निकालने के प्रति सावधान किया था। नदी तल को अचानक गहरा करने से प्रवाह, जलस्तर और तटों पर असर पड़ सकता है। कहीं कटाव बढ़ सकता है, कहीं नदी तल नीचे जा सकता है और कहीं नदी की धारा का व्यवहार बदल सकता है।

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इसलिए जहां वास्तव में गाद का जमाव बाढ़ या प्रवाह की समस्या पैदा कर रहा हो, वहीं वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ड्रेजिंग की जरूरत तय होनी चाहिए। पहले यह साबित हो कि समस्या का कारण क्या है और क्या उसका कोई दूसरा समाधान संभव है। नदी को गाद से मुक्त करना और नदी को गाद के साथ जीने देना—दो अलग बातें हैं।

प्रगतिशील कृषि मंच के राष्ट्रीय संयोजक किशोर जायसवाल का सवाल भी इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका कहना है कि किसानों के हित में पूरी नदी से अंधाधुंध गाद निकालना समाधान नहीं है। पहले उन हिस्सों की पहचान हो जहां वास्तव में गाद निकालना जरूरी है। फिर सुरक्षित मात्रा, प्रवाह में संभावित बदलाव, दूसरे स्थानों पर कटाव का खतरा और ड्रेजिंग की अवधि तय की जाए। संवेदनशील हिस्सों में जलवैज्ञानिक और जलगतिकीय मॉडल से यह जांच होनी चाहिए कि प्रस्तावित ड्रेजिंग से बाढ़ का पानी सचमुच बेहतर ढंग से बह पाएगा या कहीं दूसरी जगह जलजमाव और कटाव का खतरा बढ़ जाएगा।

जायसवाल की चिंता केवल गाद निकालने तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि गंगा की विभिन्न सहायक नदियों के जलमार्ग में बाधा डालने वाली अवसंरचना परियोजनाओं की भी जांच जरूरी है। नदी प्रणाली की पारिस्थितिकी को बहाल करने के लिए जहां जरूरी हो, वहां क्षतिपूरक उपाय भी अनिवार्य होने चाहिए।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि बिहार की बाढ़ को केवल नदी के तल में जमा गाद से समझना आसान रास्ता है, सही रास्ता नहीं। तटबंध हैं, जलनिकासी की समस्या है, निचले इलाकों में निर्माण है, बाढ़ के मैदान सिकुड़ रहे हैं, छोटी नदियों और पुराने जलमार्गों पर अतिक्रमण है। बराज और दूसरी संरचनाएं नदी की स्वाभाविक गति को बदलती हैं और जलाशयों की क्षमता भी घटती है। इन सबके बीच केवल नदी के तल में मशीन उतार देना बाढ़ का पूरा इलाज कैसे हो सकता है?

गंगा में गाद के सवाल को समझने के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ समितियों और संस्थाओं के काम को एक साथ देखना भी जरूरी है। केंद्रीय जल आयोग के अध्ययन हों या गंगा में गाद जमाव की समस्या की जांच के लिए जून 2017 में गठित ए.बी. पांड्या समिति, सवाल यह है कि नदी में तलछट के व्यवहार को केवल एक जगह देखकर कैसे समझा जा सकता है?

नदी की आकृति और प्रवाह को समझने वाले विशेषज्ञों की भूमिका इसलिए जरूरी है। एनआईटी पटना के नदी-विज्ञान विशेषज्ञ प्रो. रामाकर झा जैसे विशेषज्ञों की भागीदारी से नदी की आकृति, प्रवाह और तलछट के परस्पर संबंध को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। नदी का नक्शा कागज पर स्थिर होता है। नदी खुद स्थिर नहीं होती।

इसी बहस के बीच सुल्तानगंज के कवि सुधीर प्रोग्रामर का सुझाव अपने सहज व्यंग्य के कारण ध्यान खींचता है—‘एक पंथ, दो काज।’ उनका कहना है कि क्षेत्रीय गंगा से गाद निकालकर सुल्तानगंज में बनने वाले हवाई अड्डा क्षेत्र में सात-आठ मीटर तक भराव किया जाए। गंगा से गाद भी निकले और हवाई अड्डे के लिए जमीन का भराव भी हो जाए।

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सुनने में बात सीधी है। नदी सीधी नहीं है। गाद कहां से निकलेगी? कितनी निकलेगी? उसकी प्रकृति क्या है? उसमें प्रदूषक कितने हैं? सात-आठ मीटर भराव का भू-तकनीकी असर क्या होगा? आसपास के जलतंत्र और भूजल पर क्या प्रभाव पड़ेगा? भराव के बाद बरसाती पानी का रास्ता क्या होगा? इन सवालों के जवाब वैज्ञानिक अध्ययन के बिना नहीं मिल सकते। गाद को केवल भराव की सामग्री मान लेना उतना ही अधूरा है, जितना उसे हर जगह बाढ़ का कारण मान लेना।

सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब गाद प्रबंधन धीरे-धीरे गाद निकासी का कारोबार बन जाए। एक बार यह मान लिया गया कि नदी की गाद सड़क, रेल और निर्माण के काम आ सकती है तो उसमें बाजार दिखाई देने लगेगा। फिर नदी से अधिक से अधिक गाद निकालने का आर्थिक आकर्षण पैदा होगा। नदी-विज्ञान पीछे और निर्माण सामग्री की मांग आगे हो जाएगी।

इसलिए गाद की उपयोगिता तय करने से पहले उसकी मात्रा, गुणवत्ता, प्रदूषण की स्थिति, भू-तकनीकी प्रकृति और परिवहन लागत का आकलन जरूरी है। निकाली गई गाद कहीं दूसरी जगह नई पर्यावरणीय समस्या न पैदा करे, यह भी देखना होगा।

गंगा में यह सावधानी और जरूरी है। भागलपुर के आसपास गांगेय डॉल्फिन का संवेदनशील आवास है। यहां किसी भी बड़े पैमाने की ड्रेजिंग को केवल नौवहन या जलनिकासी के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। नदी की गहराई, धारा, तलछट, मछलियों और डॉल्फिन के आवास के बीच संबंध को समझना होगा।

नदी की धारा बदलेगी तो तलछट का व्यवहार बदलेगा। तलछट बदलेगी तो जलीय जीवों के आवास पर भी असर पड़ सकता है। फरक्का का सवाल भी इसी तरह देखने की जरूरत है। ऊपर से गाद निकालकर नीचे की समस्या खत्म नहीं होती। नदी में गाद पानी के साथ चलती है। कहीं कम होती है, कहीं ज्यादा जमा होती है। इसलिए फरक्का से लेकर भागलपुर और उससे ऊपर तक नदी की तलछट-यात्रा को एक पूरे तंत्र की तरह देखना होगा।

बिहार की नई नीति इसलिए सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, नदी को देखने का एक अवसर भी है। अगर इसका अर्थ सिर्फ ‘गाद निकालो’ हुआ तो हम उसी पुरानी इंजीनियरिंग सोच को दोहराएंगे जिसमें नदी को नियंत्रित करने की कोशिश होती रही है। लेकिन अगर ‘गाद प्रबंधन’ का अर्थ सचमुच प्रबंधन हुआ तो शुरुआत गाद निकालने से नहीं, गाद को समझने से होगी।

हर प्रमुख नदी और संवेदनशील हिस्से का नियमित तलछट बजट तैयार होना चाहिए। नदी का तल कितना बदला? कहां कटाव बढ़ा? कहां जमाव हुआ? पिछले साल की ड्रेजिंग का क्या असर पड़ा? अगली बरसात में नदी का व्यवहार कैसा रहा? इन सबका सार्वजनिक रिकॉर्ड होना चाहिए।

नदी के आंकड़े भी नदी की तरह बदलते रहते हैं। इसलिए पुराने नक्शों और फाइलों के भरोसे नदी का भविष्य नहीं लिखा जा सकता। अभियंताओं और अधिकारियों को आधुनिक नदी-विज्ञान, तलछट प्रबंधन और जलविज्ञान का प्रशिक्षण देना होगा। निर्णय लगातार मिल रहे आंकड़ों और मैदानी अनुभव के आधार पर होने चाहिए।

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और सबसे जरूरी बात—नदी को केवल पानी की धारा समझना बंद करना होगा। नदी पानी के साथ मिट्टी, बालू, मछली, वनस्पति और जीवन लेकर चलती है। गाद भी उसी जीवन-यात्रा का हिस्सा है। वह हमेशा दुश्मन नहीं होती। कई जगह वही उपजाऊ मिट्टी बनाती है। समस्या तब पैदा होती है जब उसका संतुलन बिगड़ता है या उसका जमाव किसी खास स्थान पर बाढ़, जलजमाव अथवा प्रवाह में बाधा पैदा करता है।

नदी को बचाने की बहस इसलिए केवल गाद तक सीमित नहीं हो सकती। नदियां अपने साथ केवल पानी नहीं बहातीं, वे अपने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को साथ लेकर चलती हैं। जंगल, मिट्टी, वनस्पति, मछलियां, जलीय जीव और नदी का प्रवाह—सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। तटों से जंगल खत्म होंगे, मिट्टी का क्षरण बढ़ेगा और जलग्रहण क्षेत्र कमजोर होगा तो उसका असर नदी पर भी पड़ेगा।

इसी व्यापक संबंध को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2026 के विश्व नदी दिवस का संदेश है—“वन नहीं, तो नदियां नहीं; नदियां नहीं, तो जल नहीं; और जल नहीं, तो जीवन नहीं।”

सुमन साहा के अनुसार नदियों को अविरल और निर्मल बनाए रखने के लिए उनके तटों के जंगलों, मिट्टी, वनस्पतियों, जैव-विविधता और जीव-जंतुओं का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। नदियों को प्रदूषण और अवरोध से बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। प्लास्टिक, विषैले रसायनों, औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू कचरे से नदी को बचाना भी नदी संरक्षण का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितना गाद का वैज्ञानिक प्रबंधन।

नदियां हमारी पृथ्वी की धमनियों की तरह हैं। उनमें पानी का प्रवाह रुकना केवल किसी एक नदी की समस्या नहीं, पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए संकट है। इसलिए हमें नदी को केवल इंजीनियरिंग की परियोजना या पानी की पाइपलाइन की तरह देखने से बाहर निकलना होगा। नदी को उसके जंगल, जलग्रहण क्षेत्र, तट, मिट्टी, तलछट और जलीय जीवन के साथ देखना होगा।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि नदी में कितनी गाद है। असली सवाल यह है कि गाद का संतुलन कैसा है। वह आई कहां से, जमा क्यों हुई, नदी के प्रवाह को कितना प्रभावित कर रही है और उसे हटाने के बाद उसका अगला ठिकाना क्या होगा? इन सवालों के जवाब के बिना ड्रेजिंग केवल एक गतिविधि होगी, नदी प्रबंधन नहीं।

गाद निकालना आसान है, नदी को समझना कठिन। बिहार की नई गाद प्रबंधन नीति की असली परीक्षा इसी कठिन काम में होगी। यदि नीति नदी के स्वभाव को समझकर, वैज्ञानिक आंकड़ों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से लागू होती है तो यह बाढ़ और नदी प्रबंधन की दिशा में उपयोगी कदम बन सकती है। लेकिन यदि गाद को केवल निर्माण सामग्री और नदी को केवल निकालने योग्य तलछट समझ लिया गया तो समाधान के नाम पर नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

गाद नदी की गंदगी नहीं है। वह नदी की कहानी का एक हिस्सा है। नदी को बचाना है तो उसकी कहानी मिटाकर नहीं, उसकी भाषा समझकर रास्ता बनाना होगा। वन बचाइए, नदी बचाइए, जल बचाइए—क्योंकि अंततः यही जीवन बचाने का रास्ता है।

लेखक का परिचय

कुमार कृष्णन

कुमार कृष्णन स्‍वतंत्र पत्रकार है।

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