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‘वो सुबह कभी तो आयेगी’: हरियाणा के बहाने हमारे समय का बेचैन दस्तावेज

‘वो सुबह कभी तो आयेगी’: हरियाणा के बहाने हमारे समय का बेचैन दस्तावेज
लेखक की फोटो

लेखक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और संपादक तरुण कान्ति बोस की हाल में आई किताब‘वो सुबह कभी तो आयेगी : हरियाणा—अस्मिता के मुद्दे, जमीनी स्तर के आंदोलन और वैकल्पिक प्रयास’ कृषि, खासकर गेहूं-चावल के उत्पादन में नाम कमाने वाले हरियाणा की पड़ताल के बहाने देश की अनेक समस्याओं को उजागर करती है।


कुछ किताबें किसी प्रदेश का परिचय कराती हैं, कुछ उसके इतिहास को दर्ज करती हैं और कुछ उस समाज के भीतर छिपी दरारों को सामने लाती हैं। तरुण कान्ति बोस की पुस्तक ‘वो सुबह कभी तो आयेगी : हरियाणा—अस्मिता के मुद्दे, जमीनी स्तर के आंदोलन और वैकल्पिक प्रयास’ हरियाणा को एक आईने की तरह इस्तेमाल करते हुए भारतीय समाज, राजनीति, जाति, धर्म, श्रम, स्त्री और लोकतांत्रिक संघर्षों की पड़ताल करती है। इस किताब की खूबी यह है कि लेखक ‘हरियाणा’ को केवल समृद्ध कृषि, खेल प्रतिभाओं, सैनिकों और गुरुग्राम की चमक के जरिए नहीं देखते। वे उस हरियाणा में उतरते हैं जो इस चमक के पीछे छूट गया है—भूमिहीन दलित, मजदूर, महिलाएं, प्रवासी, ग्रामीण गरीब, छोटे दुकानदार और धार्मिक-सामाजिक ध्रुवीकरण से प्रभावित समुदाय। पुस्तक की विषय-सूची ही इसके व्यापक सरोकारों का संकेत देती है—1857 का संघर्ष, दलितों का दमन, दुल्हन तस्करी, नूंह का सांप्रदायिक तनाव, शांति अस्पताल, फरीदाबाद का मजदूर आंदोलन, ईएसआईसी और कुरुक्षेत्र का जन संघर्ष मंच।

इतिहास से वर्तमान को समझने की कोशिश

पुस्तक की शुरुआत हरियाणा की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय पृष्ठभूमि से होती है, लेकिन जल्द ही यह इतिहास और समाज की उन परतों में प्रवेश कर जाती है जिन्हें सामान्य इतिहास अक्सर छोड़ देता है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंबाला और हरियाणा की भूमिका का विवरण इसका अहम हिस्सा है। लेखक दिखाते हैं कि विद्रोह केवल सैनिकों का मामला नहीं था; आम लोगों ने भी विभिन्न स्तरों पर ब्रिटिश सत्ता का प्रतिरोध किया। अंबाला में 10 मई 1857 को हुए विद्रोह और उसके बाद सैनिकों तथा आम जनता पर हुए दमन का विवरण इतिहास को स्थानीय अनुभव से जोड़ता है।

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जाति और जमीन का रिश्ता

दलितों पर केंद्रित अध्याय किताब के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में है। लेखक औपनिवेशिक दौर की भूमि नीतियों और जाति व्यवस्था के संबंधों की पड़ताल करते हैं। पुस्तक बताती है कि 1901 के ‘पंजाब लैंड एलिएनेशन एक्ट’ जैसी व्यवस्थाओं ने भूमि के वितरण में जातिगत असमानता को मजबूत किया और दलितों को भूमि स्वामित्व से दूर रखा। यहां किताब का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है—वह जातिगत उत्पीड़न को केवल सामाजिक पूर्वाग्रह नहीं मानती, बल्कि उसे भूमि, उत्पादन, सत्ता और वर्ग संबंधों से जोड़कर देखती है।

दुल्हन तस्करी से स्त्री की असुरक्षा तक

हरियाणा के असंतुलित लिंगानुपात की चर्चा अक्सर आंकड़ों तक सीमित रह जाती है। बोस इस आंकड़े के सामाजिक परिणामों को तलाशते हैं। दूसरे राज्यों से लड़कियों और महिलाओं को खरीदकर या तस्करी के जरिए हरियाणा लाने और उनके विवाह की घटनाओं का वर्णन पुस्तक को बेहद मार्मिक बना देता है। पुस्तक में ऐसे मामलों का विवरण है जहां बाहर से लाई गई महिलाओं को घरेलू हिंसा, यौन शोषण और संतान पैदा करने के दबाव का सामना करना पड़ा। पुस्तक का यह हिस्सा पाठक को असहज करता है। किसी समस्या को समझने के लिए कभी-कभी आंकड़ों से ज्यादा जरूरी उस समस्या के साथ जी रहे व्यक्ति की कहानी सुनना होता है।

नूंह: इतिहास बनाम बनाई गई धारणाएँ

नूंह और मेवात पर पुस्तक विशेष रूप से आज के समय में प्रासंगिक हो जाती है। लेखक 1857 में ‘मेव’ समुदाय की भूमिका से लेकर आधुनिक सांप्रदायिक तनाव तक की यात्रा करते हैं। वे ‘मेव’ समाज के बारे में बनी रूढ़ धारणाओं को चुनौती देते हुए उसके साझा सांस्कृतिक इतिहास और हिंदू-मुस्लिम सामाजिक संबंधों की ओर ध्यान खींचते हैं। 2023 की हिंसा के संदर्भ में भी पुस्तक यह बताने की कोशिश करती है कि सांप्रदायिक तनाव के बीच स्थानीय स्तर पर सद्भाव और पारस्परिक मदद की परंपराएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

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किताब की सबसे बड़ी ताकत : आंदोलन जमीन पर दिखाई देते हैं

इस पुस्तक को महज वैचारिक किताब मानना अन्याय होगा। इसकी असली ताकत इसकी केस स्टडीज हैं। ‘मनरेगा’ के अधिकार के लिए हरियाणा के गांवों में चलाए गए संघर्ष का उदाहरण बताता है कि कानून बन जाना और नागरिक को उसका अधिकार मिल जाना दो अलग चीजें हैं। नरवाना में लगातार दो वर्षों के संघर्ष के बाद अनेक गांवों में ‘मनरेगा’ योजनाओं का विस्तार, जॉब कार्ड बनवाना और मजदूरों को अपने ‘मेट’ चुनने के लिए सक्षम करना पुस्तक में दर्ज है।

इसी तरह फरीदाबाद के मजदूर आंदोलन का प्रसंग दिखाता है कि सामाजिक न्याय के प्रश्न किस तरह श्रम अधिकारों से जुड़ते हैं। 2022 की एक दलित बच्ची के साथ हुई भयावह घटना के बाद शुरू हुआ आंदोलन आगे चलकर ‘क्रांतिकारी मजदूर मोर्चे’ के गठन का कारण बना।

‘शांति अस्पताल’ और ‘ईएसआईसी’ : वैकल्पिक मॉडल की तलाश

पुस्तक का उम्मीद जगाने वाला हिस्सा ‘शांति अस्पताल’ और ‘ईएसआईसी’ से जुड़े अध्याय हैं। गोहाना का ‘शांति अस्पताल’ ‘नो लॉस, नो प्रॉफिट’ अवधारणा पर चलने का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां चिकित्सा को मुनाफे से अलग देखने की कोशिश की गई है। पुस्तक के अनुसार इसकी ‘ओपीडी’ फीस लंबे समय तक केवल 10 रुपये रही और बाद में बढ़कर 50 रुपये हुई। ‘ईएसआईसी’ अस्पताल का उदाहरण तो और दिलचस्प है। पुस्तक में बताया गया है कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और तकनीक को श्रमिकों तक पहुंचाने की कोशिश में संस्थान ने किडनी ट्रांसप्लांट, न्यूरोसर्जरी और रोबोटिक सर्जरी जैसी सुविधाएँ विकसित कीं हैं।

आज के समय में इसकी जरूरत क्यों है?

आज की राजनीति में बेरोजगारी, महंगाई, किसान-मजदूर संकट, जातिगत तनाव, स्त्री सुरक्षा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे अक्सर अलग-अलग दिखाई देते हैं। ‘वो सुबह कभी तो आयेगी’ इन सबको एक-दूसरे से जोड़कर देखने का आग्रह करती है। पुस्तक का तर्क है कि सामाजिक अन्याय को समझने के लिए सत्ता, अर्थव्यवस्था, जाति, धर्म और पितृसत्ता के परस्पर संबंधों को समझना होगा।

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इसका दूसरा महत्व यह है कि यह उन लोगों को केंद्र में लाती है जो आमतौर पर खबरों की सुर्खियों में केवल ‘पीड़ित’ बनकर आते हैं। यहां वे संघर्ष करने वाले नागरिक भी हैं। ‘मनरेगा’ का अधिकार मांगता मजदूर, हिंसा के खिलाफ खड़ी महिला, सांप्रदायिक तनाव के बीच दूसरे समुदाय की मदद करता नागरिक या अपने अधिकार के लिए संगठन बनाता श्रमिक—ये सब इस किताब में बदलाव की संभावनाओं के वाहक हैं। पुस्तक का अंतिम हिस्सा भी इन्हीं संघर्षों को ‘उम्मीद की एक चिंगारी’ के रूप में देखता है। तरुण कान्ति बोस की ‘वो सुबह कभी तो आयेगी’ आरामदेह किताब नहीं है। यह पाठक को कई असुविधाजनक सवालों के सामने खड़ा करती है। इसकी वैचारिक जमीन स्पष्ट रूप से वामपंथी और मार्क्सवादी है, इसलिए इससे असहमति की गुंजाइश भी है और होनी चाहिए। लेकिन किसी किताब की उपयोगिता केवल इस बात से तय नहीं होती कि हम उसके हर निष्कर्ष से सहमत हैं या नहीं। इसकी असली उपयोगिता इस बात में है कि वह हमें उन सवालों से भिड़ाती है जिन्हें अक्सर सत्ता, मीडिया और समाज की सुविधाजनक चुप्पियां ढंक देती हैं। (सप्रेस)

किताब : वो सबु‍ह तो कभी आएगी प्रकाशक : कामगार प्रकाशन

लेखक का परिचय

अमन नम्र

दस वर्षों तक चरखा फीचर सेवा के सम्पादक रह चुके अमन नम्र आजकल दैनिक भास्‍कर में अपनी सेवाएं दे रहे है। वे ब्‍लागर है, लगातार लिखते रहते है। उनकी भाषा, पकड़ और सरोकार आकर्षक हैं।

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