किताब उत्सव में कवि आशुतोष दुबे और बेटी अनुप्रिया देवताले ने साझा किए संस्मरण
इंदौर, 6 सितंबर। एक बड़ा कवि जब आपके आसपास होता है तो वह केवल कवि या व्यक्ति नहीं होता, बल्कि अपने आप में एक पूरा वातावरण होता है। उसके संपर्क में आने वाले लोग जाने-अनजाने उस वातावरण से बहुत कुछ ग्रहण करते हैं। चंद्रकांत देवताले के व्यक्तित्व को याद करते हुए प्रसिद्ध कवि और पत्रकार डॉ. आशुतोष दुबे ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि देवताले देश के बड़े कवियों में शुमार थे, लेकिन अपने व्यवहार में कभी ‘बड़े कवि’ होने का अहसास नहीं कराते थे। उनकी आत्मीयता ऐसी थी कि जो भी उनके संपर्क में आता, वह उनका अपना हो जाता।
इंदौर में चल रहे राजकमल प्रकाशन के किताब उत्सव के तीसरे दिन, 6 सितंबर को हमारा शहर, हमारे गौरव चंद्रकांत देवताले पर केंद्रित विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। डॉ. आशुतोष दुबे और देवताले की छोटी बेटी, प्रसिद्ध वायलिन वादिका अनुप्रिया देवताले ने उनके कवि व्यक्तित्व, रचनात्मकता और निजी जीवन से जुड़े संस्मरण साझा किए। कार्यक्रम में देवताले की कविताओं और उनके जीवन-दर्शन को याद करते हुए उनके साहित्य की उन विशेषताओं पर भी बात हुई, जिनमें आम आदमी, श्रमिक, स्त्री, बच्चे और सामाजिक रूप से हाशिये पर मौजूद जीवन लगातार उपस्थित दिखाई देता है। कार्यक्रम में अनेक प्रबुद्धजन और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने अनुप्रिया और आशुतोष दुबे का स्मृति चिन्ह प्रदान किये।
बड़े कवि होकर भी बड़े होने का अहसास नहीं कराया

डॉ. आशुतोष दुबे ने अपने संस्मरण साझा करते हुए कहा कि 1993 के आसपास जब वे एक कॉलेज में स्थानांतरित होकर पहुंचे, उसी समय देवताले भी वहां हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में आए थे। लिखने की शुरुआत कर रहे दुबे के लिए यह किसी बड़े कवि के निकट आने का अवसर था। उन्होंने कहा कि देवताले देशभर में जाने-पहचाने कवि थे, उनकी पुस्तकें प्रकाशित थीं और साहित्य की दुनिया में उनका बड़ा नाम था, लेकिन व्यक्तिगत व्यवहार में वे कभी उस तरह के ‘बड़े कवि’ नजर नहीं आते थे।
उनके अनुसार देवताले युवा कवियों के साथ बेहद स्नेह और आत्मीयता से पेश आते थे। वे बिना जताए उनकी ‘ग्रूमिंग’ और ‘मेंटोरिंग’ करते रहते थे। यदि कोई युवा कवि सजग होकर उनके आसपास रहता तो उसके लिए साहित्य की एक बड़ी दुनिया खुलती जाती थी। उनके घर आने-जाने वाले लोगों में बड़े साहित्यकार, आलोचक, प्रकाशक और लघु पत्रिकाओं से जुड़े लोग शामिल रहते थे। इस तरह उनके संपर्क में आना हिंदी साहित्य और कविता की उस दुनिया में प्रवेश करने जैसा था, जिससे युवा लेखक बहुत कुछ सीख सकते थे।
दुबे ने कहा कि देवताले साहित्य के अलग-अलग खेमों और शिविरों से ऊपर उठकर स्वीकार किए जाते थे। अशोक वाजपेयी ने उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘हड्डियों में छिपा ज्वर’ प्रकाशित किया था और उन्हें ‘पहल सम्मान’ भी मिला। साहित्यिक दुनिया में अलग-अलग विचारधारात्मक खेमों के बावजूद देवताले का सम्मान व्यापक था।
बेबाकी के साथ कड़वाहट से दूर रहने का गुण
देवताले के व्यक्तित्व की एक खास विशेषता उनकी बेबाकी थी। दुबे ने बताया कि व्यक्तिगत बातचीत में वे इस बात का ध्यान रखते थे कि मजाक या टिप्पणी से सामने वाले को ठेस न पहुंचे, लेकिन सार्वजनिक मंच पर वे अपनी बात बेहद स्पष्टता से रखते थे। कई बार उनकी स्पष्टवादिता से लोग आहत भी होते थे।
उन्होंने एक साहित्यिक आयोजन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि देवताले ने एक कथाकार की कहानी पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखी। उनकी टिप्पणियां सही थीं, लेकिन कथाकार के मित्र को वे बेहद बुरी लगीं और बाद में एक साहित्यिक पत्रिका में देवताले के खिलाफ कटु लेख भी लिखा गया। इसके बावजूद देवताले ने उस प्रसंग को मन में नहीं रखा। अगले ही कार्यक्रम में वे उसी कथाकार के पास सहजता से गए, उनसे तंबाकू मांगी और पहले की तरह बातचीत करने लगे।
दुबे के अनुसार, कड़वाहट को मन में न रखना देवताले से सीखने वाली बड़ी बात थी। बहस हो सकती थी, मतभेद हो सकते थे, लेकिन संबंधों में मैल जमा कर रखना उनके स्वभाव का हिस्सा नहीं था।
साधारण लोगों की दुनिया कविता के केंद्र में
देवताले के कवि संसार की चर्चा करते हुए दुबे ने कहा कि उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन के उन तमाम पात्रों को कविता में जगह दी, जो हमारे आसपास होते हैं, लेकिन साहित्य में अक्सर उपेक्षित रह जाते हैं। उनके यहां कामगार हैं, सुबह-सुबह बालम ककड़ी बेचने निकलने वाली लड़कियां हैं, घर में आया कारीगर है और रोजमर्रा के जीवन के अनेक छोटे-बड़े प्रसंग हैं।
उन्होंने कहा कि देवताले की कविताओं में मालवी भाषा के शब्द भी विशेष रूप से दिखाई देते हैं। ‘दचकना’ और ‘वास्ते’ जैसे शब्दों का कविता में आना उनके स्थानीय जीवन से गहरे जुड़ाव को दिखाता है। ‘गाँव तो थूक नहीं सकता था मेरी हथेली पर’ जैसी कविता उनके बचपन और गांव से जुड़े अनुभवों की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
‘नींबू मांगने वाले’ जैसी कविता के माध्यम से उन्होंने बदलते सामाजिक रिश्तों और पड़ोस की संस्कृति में आए बदलाव को दर्ज किया। दुबे ने कहा कि जिस समय गली-मोहल्लों में आपसी परिचय और पारस्परिकता अधिक थी, आज कॉलोनियां ऐसे द्वीपों में बदलती जा रही हैं जहां पड़ोसी एक-दूसरे को जानते तक नहीं। देवताले ने इस सामाजिक बदलाव को संवेदनशीलता के साथ पकड़ा।
स्त्रियों और बच्चों पर लिखी उनकी कविताओं को भी दुबे ने विशेष रूप से याद किया। उन्होंने कहा कि स्त्रियों पर देवताले की कविताएं संख्या और मार्मिकता दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। मुक्तिबोध का भी उनके लेखन पर गहरा प्रभाव था। मुक्तिबोध पर शोध करने के कारण उनकी संवेदना के स्तर पर देवताले उनसे विशेष रूप से जुड़े हुए थे।
‘कवि का कारखाना कभी बंद नहीं होता’

कार्यक्रम में अनुप्रिया देवताले ने पिता को याद करते हुए कहा कि बचपन में उन्होंने अपने पिता को लगातार लिखते देखा। वे बगीचे में, कमरे में या धूप के किसी टुकड़े में बैठकर सहज रूप से लिखते रहते थे। उनके जीवन में सादगी और लेखन में सहजता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी थीं।
उन्होंने पिता की एक पंक्ति याद की—यदि मेरी कविता साधारण है तो साधारण लोगों के लिए भी इसमें बुरा क्या, मैं कौन खास? उनके अनुसार देवताले की यही सोच उन्हें विशिष्ट बनाती थी। वे बेहद जागरूक और चैतन्य व्यक्ति थे तथा उनकी नजर समाज को बहुत गहराई से देखती थी।
अनुप्रिया ने कहा कि देवताले ने उन्हें भयमुक्त होना, बेबाक रहना और अपनी बात साफ तौर पर कहना सिखाया। वे सोशल मीडिया की प्रचार संस्कृति और लेखकों द्वारा एक-दूसरे की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा किए जाने से दूर रहते थे। साहित्य और कला को बाजार में बदलते दौर में भी उन्होंने शोषित, पीड़ित, दलित, पिछड़े, आदिवासी और स्त्री जीवन के पक्ष में ईमानदारी और निस्वार्थ भाव से लिखा।
250 रुपये के वायलिन से बेटी की संगीत यात्रा
अनुप्रिया ने पिता से जुड़े निजी संस्मरण भी साझा किए। उन्होंने बताया कि बचपन में उन्हें वायलिन सीखने की इच्छा हुई तो पिता ने उनकी इस इच्छा को गंभीरता से लिया। एक दिन रतलाम से इंदौर आए देवताले ने राजबाड़ा की सब्जी मंडी के पास से 250 रुपये का वायलिन खरीदकर उन्हें दिया। इसी वायलिन से उनकी संगीत यात्रा शुरू हुई। बाद में पिता उन्हें दिल्ली में उस्ताद अमजद अली खान के पास संगीत सीखने ले गए।
उन्होंने पिता की संवेदनशीलता का एक और प्रसंग सुनाया। देवताले सुबह टहलने निकलते समय जेब में 15-20 रुपये रखते थे। पूछने पर बताते कि रास्ते में कोई जरूरतमंद या सफाईकर्मी मिल जाए तो उसे पैसे दे सकें। अनुप्रिया के अनुसार ऐसी छोटी-छोटी बातें उनके व्यक्तित्व की असली पहचान थीं।
कविता उनके लिए जीवन से अलग कोई चीज नहीं थी
अनुप्रिया ने कहा कि पिता से उनकी रोजाना बातचीत होती थी। मौसम, सब्जियों से लेकर राजनीति तक पर चर्चा होती। वे कम और सार्थक बोलने की सीख देते थे तथा गौतम बुद्ध का वाक्य ‘अप्प दीपो भव’ दोहराते थे।
उन्होंने पिता की कविता ‘बेटी के घर से लौटना’ का भी उल्लेख किया, जो दिल्ली में बेटी से मिलकर लौटने के प्रसंग से जुड़ी थी। कविता में बेटी का पिता से एक दिन और रुकने का आग्रह और पिता का लौटने की विवशता के बीच छिपा भावनात्मक संसार सामने आता है। अनुप्रिया ने कहा कि वे जब पिता की कविताओं को वायलिन के साथ प्रस्तुत करती हैं तो किसी एक कविता का चुनाव करना कठिन होता है, क्योंकि उन्हें उनकी हर कविता प्रिय है।
चंद्रकांत देवताले को याद करते हुए कार्यक्रम में यह बात बार-बार उभरकर सामने आई कि उनका महत्व केवल उनके लिखे हुए शब्दों में नहीं था। वे अपने समय, समाज और आसपास के मनुष्यों को देखने की एक दृष्टि भी थे। उनकी कविता में साधारण आदमी, श्रमिक, स्त्री, बच्चे और हाशिये के लोग केवल पात्र नहीं, बल्कि समाज को समझने की केंद्रीय कड़ी बनकर सामने आते हैं।
यही कारण है कि देवताले को याद करना केवल एक बड़े कवि को याद करना नहीं, बल्कि उस संवेदना को याद करना भी है जो साहित्य को मनुष्य के जीवन के करीब ले जाती है। उनकी सादगी, बेबाकी, आत्मीयता और सामाजिक सरोकार उनके काव्य के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व की भी पहचान रहे। इंदौर के किताब उत्सव में उनके जीवन और कविता पर हुआ विमर्श इसी जीवंत विरासत को नए सिरे से सामने लाने वाला अवसर बना।