किताब उत्सव में वानखेड़े की पुस्तक ‘सत्यापन’ का लोकार्पण
इंदौर, 6 सितंबर। ‘’हमारे सामाजिक परिवेश में जो दिखाई देता है, वही पूरी सामाजिक हकीकत नहीं है। सड़क पर दौड़ती कारें और मोटरसाइकिलें दिखाई देती हैं, लेकिन पैदल चलने वाला आदमी अक्सर दिखाई नहीं देता। घर बनाने वाला मजदूर, घर के भीतर काम करने वाली स्त्री, बस्तियों में रहने वाले लोग और रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने वाले समुदाय हमारे आसपास मौजूद होने के बावजूद सामाजिक दृश्य से गायब कर दिए जाते हैं। साहित्य का काम इस अदृश्य संसार को दृश्य बनाना और उसके जीवन-संघर्षों को सामने लाना भी है।‘’ यह बात भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत, लेखक, साहित्यकार कैलाश वानखेड़े ने इंदौर में राजकमल प्रकाशन के किताब उत्सव में आयोजित विमर्श के दौरान कहीं।

इस मौके पर किताब उत्सव में वानखेड़े की पुस्तक ‘सत्यापन’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक का विमोचन पुष्पेश पंत, कैलाश वानखेड़े और उनके पिता ने किया। इसके बाद ‘दलित चेतना का सत्यापन : मानवीय गरिमा का उजला अंधेरा’ विषय पर विमर्श हुआ। वानखेड़े ने अपनी तीन पुस्तकों ‘सत्यापन’, ‘सुलगन’ और ‘उजला अंधेरा’ में मौजूद कथा-संसार और उसके सामाजिक सरोकारों पर विस्तार से बातचीत की।
अदृश्य लोगों की अपनी दुनिया है
विमर्श के दौरान पत्रकार प्रियंका दुबे व शशिभूषण ने वानखेड़े के कथा-संसार में मौजूद ‘अदृश्यता’ के सवाल को केंद्र में रखा। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाएं उस संसार से रूबरू कराती हैं, जो हमारे आसपास होते हुए भी दिखाई नहीं देता। बस्तियां, उनमें रहने वाले लोग, उनके रोजमर्रा के संघर्ष और उनकी मौजूदगी अक्सर समाज की मुख्यधारा की नजर से बाहर रहती है।
इस पर वानखेड़े ने कहा कि भारतीय समाज की संरचना में जो दिखाई देता है, वह पूरे समाज की वास्तविकता नहीं है। उन्होंने सड़क का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां सबसे ज्यादा कारें और मोटरसाइकिलें दिखाई देती हैं, जबकि पैदल चलने वाला व्यक्ति बड़ी संख्या में होने के बावजूद नजर नहीं आता। इसी तरह घर बनाने वाला या घर के भीतर काम करने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत से समाज की जरूरतें पूरी करता है, लेकिन उसकी सामाजिक उपस्थिति दिखाई नहीं देती।
उनके अनुसार समस्या केवल यह नहीं है कि पैदल चलने वाले के लिए सड़क पर जगह नहीं है। असली सवाल यह है कि विकास की पूरी कल्पना में उस व्यक्ति को शामिल ही क्यों नहीं किया जाता। साइकिल चलाने वालों के लिए सड़कें असुरक्षित होती जा रही हैं, लेकिन सड़क की योजना बनाते समय उनकी जरूरतों पर पर्याप्त विचार नहीं होता। यही अदृश्यता बस्तियों, पानी, बिजली और रोजमर्रा के जीवन की दूसरी जरूरतों में भी दिखाई देती है।
आत्मकथा नहीं, जीवन-सत्य से निकला कथा संसार
‘उजला अंधेरा’ को आत्मकथात्मक उपन्यास माने जाने के सवाल पर वानखेड़े ने कहा कि यह आत्मकथात्मक उपन्यास की शक्ल में दिखाई जरूर देता है, लेकिन वास्तव में यह आत्मकथा नहीं है। इसके भीतर मौजूद बहुत सारे सच लेखक के अपने जीवन के साथ-साथ पड़ोसी, रिश्तेदार, गली और समाज के जीवन से आते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन को जैसा है, वैसा व्यक्त करने के लिए किसी न किसी शैली और विधा की जरूरत होती है। साहित्य में यह पहले से तय करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है कि किसी बात को किस तरह लिखा जाना चाहिए और किस तरह लिखा गया तो वह कौन-सी विधा या शैली मानी जाएगी। प्रथम पुरुष में लिखे जाने के कारण किसी रचना को आत्मकथात्मक मान लेना जरूरी नहीं है।
वानखेड़े ने बताया कि ‘उजला अंधेरा’ लिखने की शुरुआत लगभग 2012 के आसपास हुई और यह 2025 के आसपास पूरा हुआ। नौकरी की अपनी मर्यादाओं और सीमाओं के कारण लेखन के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया, इसलिए इसे पूरा होने में लंबा समय लगा। उनके अनुसार रचना में शामिल घटनाएं वास्तविक घटनाओं से प्रेरित हैं। लिखते समय उन्होंने यह तय नहीं किया था कि कथा कितनी लंबी होगी। धीरे-धीरे घटनाएं और पात्र अपने आप कथा संसार का हिस्सा बनते गए।
उन्होंने यह भी बताया कि उपन्यास में लोकगायक प्रशांत का हिस्सा इतना बढ़ गया था कि बाद में उसे कम करना पड़ा। उनके शब्दों में, स्थिति यह बनने लगी थी कि ‘प्रशांत ही प्रशांत’ दिखाई देने लगा था।
जातिवाद पहले, पूंजीवाद बाद में
विमर्श में जातिवाद, पूंजीवाद और आरक्षण के सवाल पर भी विस्तार से चर्चा हुई। यह पूछे जाने पर कि दोनों में अधिक खतरनाक क्या है, वानखेड़े ने स्पष्ट कहा कि दोनों खतरनाक हैं, लेकिन यदि प्राथमिकता तय करनी हो तो जातिवाद पहले और पूंजीवाद उसके बाद आता है।
उन्होंने कहा कि जब तक समाज अपने सभी सदस्यों को समानता के आधार पर एक सूत्र में नहीं बांधता, तब तक अगली लड़ाई प्रभावी ढंग से नहीं लड़ी जा सकती। किसी समाज में यदि भीतर ही भीतर कोई ऊंचा और कोई नीचा माना जाता रहेगा तो सामाजिक सौहार्द और सामुदायिक भावना विकसित नहीं हो सकती।
उनके अनुसार एक ऐसा समाज जरूरी है जिसमें भेदभाव की कोई गुंजाइश न हो। यदि जातिमुक्त समाज बनता है तो पूंजीवाद सहित दूसरी समस्याओं से लड़ना अपेक्षाकृत आसान होगा। सामाजिक बराबरी को वे किसी एक समुदाय का मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन की बुनियादी शर्त के रूप में देखते हैं।
आरक्षण गरीबी उन्मूलन नहीं, प्रतिनिधित्व का सवाल
आरक्षण पर वानखेड़े ने कहा कि दलितों के लिए आरक्षण जरूरी है, लेकिन यह सब कुछ नहीं है। आरक्षण को गरीबी उन्मूलन अभियान मानना भी सही नहीं है। इसका मूल प्रश्न प्रतिनिधित्व से जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि किसी कार्यालय, गली या कॉलोनी में विभिन्न जातियों और वर्गों के लोग साथ मौजूद होंगे तो एक-दूसरे को समझने और जानने की संभावना बढ़ेगी। किसी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह तब कमजोर हो सकता है, जब उस समुदाय का व्यक्ति सामने मौजूद हो और उसकी आवाज सुनी जाए।
उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आरक्षण को लेकर समाज में जिस तरह का विरोध और आक्रोश दिखाई देता है, वैसा आक्रोश दलितों के रोजमर्रा के उत्पीड़न की घटनाओं पर अक्सर दिखाई नहीं देता। किसी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोकना या उसके साथ होने वाले दूसरे भेदभाव को समाज कई बार सहज मानकर स्वीकार कर लेता है। यही सामाजिक स्वीकृति जातिगत भेदभाव को बनाए रखने वाली मानसिकता का हिस्सा है।
‘उजला अंधेरा’ में रोशनी की तलाश
वानखेड़े के कथा-संसार में ‘अंधेरा’ और ‘उजाला’ केवल प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ के अनुभव हैं। ‘उजला अंधेरा’ में पिता का चरित्र भी किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। लेखक के अनुसार यह कई लोगों के अनुभवों को मिलाकर निर्मित चरित्र है और वह एक व्यक्ति के बजाय पूरे समाज, जाति और मोहल्ले का प्रतिनिधित्व करता है।
उन्होंने 1980 और 1990 के दशक की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए बताया कि उस समय बिजली का कनेक्शन हासिल करना भी संघर्ष था। किसी घर के पास बिजली का खंभा न होना आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की बाधा बन जाता था। ऐसे में अंधेरे से बाहर आने और रोशनी पाने की इच्छा केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समुदाय की आकांक्षा बन जाती है।
उन्होंने कहा कि सड़क पर रोशनी होने का मतलब यह नहीं है कि सड़क के दोनों ओर रहने वाला पूरा समाज भी रोशनी में है। कई बस्तियां सड़क के उस पार मौजूद हैं, लेकिन मुख्य सड़क से गुजरने वाले व्यक्ति को उनके भीतर का जीवन दिखाई ही नहीं देता। वह मान लेता है कि सड़क, वाहन और रोशनी ही पूरा समाज है। साहित्य इसी भ्रम को तोड़ने का काम करता है।
पानी की प्यास से लेकर सामाजिक प्यास तक
विमर्श में उनकी कहानी ‘जिंदगी और प्यास’ का भी उल्लेख हुआ। कहानी में एक बूढ़ा व्यक्ति पानी के लिए संघर्ष करता है और जी भरकर नहाने तथा पानी पीने की इच्छा रखता है। इस प्रसंग के जरिए यह सवाल सामने आता है कि एक ओर पानी की कमी से जूझते लोग हैं और दूसरी ओर उसी शहर में पानी दूसरी जरूरतों पर खर्च होता दिखाई देता है।
वानखेड़े के अनुसार साहित्य केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाने का जरिया भी है जिन्हें समाज सामान्य मानकर अनदेखा कर देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि साहित्य की बात हमेशा तत्काल असर नहीं दिखाती। पाठक अपने सामाजिक और साहित्यिक परिवेश, अपनी पसंद और अपने बनाए हुए सांचों से प्रभावित होता है। इसके बावजूद कहानियां धीरे-धीरे अपना रास्ता बनाती हैं। उन्होंने ‘सत्यापन’ कहानी का उदाहरण देते हुए बताया कि जिस दौर में पात्र को अपने दस्तावेजों के सत्यापन के लिए राजपत्रित अधिकारी की तलाश करनी पड़ती है, उसके बाद सरकारी व्यवस्था में बदलाव हुआ और अभिलेखों के सत्यापन की जरूरत कम हुई। इससे उन्हें यह विश्वास मिलता है कि साहित्य में उठाया गया कोई सवाल देर से ही सही, व्यवस्था तक पहुंच सकता है।
हमारी नजर भी सामाजिक रूप से तैयार होती है
वानखेड़े ने कहा कि उन्हें अपने पात्र हर शहर, हर गली और हर प्रदेश में दिखाई देते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम क्या देखना चाहते हैं, हमारी नजर किस पर जाती है और किस चीज को हम अनदेखा कर देते हैं—यह सब हमारी सामाजिक संरचना और व्यक्तित्व के निर्माण से तय होता है।
उनके अनुसार किसी व्यक्ति के प्रति संवेदनशील होना या उसे नजरअंदाज कर देना भी सामाजिक conditioning का हिस्सा है। कई बार हम पहले ही तय कर लेते हैं कि कौन सच बोल सकता है और कौन नहीं। किसी झोपड़पट्टी में रहने वाले व्यक्ति को चोरी की घटना के साथ जोड़ देना भी इसी मानसिकता का उदाहरण है। उसकी सामाजिक पहचान ही हमारे लिए उसके बारे में निर्णय का आधार बन जाती है।
यही कारण है कि वानखेड़े का साहित्य उन लोगों और अनुभवों को केंद्र में लाता है जिन्हें मुख्यधारा अक्सर देखना नहीं चाहती। उनके लिए साहित्य का सवाल केवल यह नहीं है कि कहानी कितनी अच्छी कही गई, बल्कि यह भी है कि कहानी में किसका जीवन दिखाई दे रहा है और किसका जीवन अब तक अदृश्य बना हुआ है। ‘उजला अंधेरा’ से ‘सत्यापन’ तक उनका कथा संसार इसी अदृश्य जीवन को सामने लाने, उसके सवालों को दर्ज करने और सामाजिक बराबरी की जरूरत को रेखांकित करने का प्रयास करता है।